मास्टर का प्रेम


यूँ तो मुझे पता है कि आप चुस्की लेने की उम्मीद में मेरे इस ब्लॉग में आयें है, और मेरी भी गनीमत इसी बात में  है की मै आप को मायूस न करूँ। हालाँकि कि मास्टर होने की मजबूरी के तहत मै अपनी रायचंदी में कोई कमिपेशी नहीं करूँगा इसलिए आप अगर आ ही गए है तो पूरा पढियेगा। मुगालता ही सही पर ब्रम्ह ज्ञान का दावा तो मै कर ही देता हूँ, अभी से।

प्रेम की परिभाषा के चक्कर में बड़े बड़े प्रेम का शिकार हो गए तो मैं सतर्कता पूर्वक इसकी परिभाषा के बगैर इसके राहू की भांति मास्टरों के जीवन में आने की विडम्बना कि विवेचना करता हूँ।

मास्टरी एक मजबूरी से लदी कौम है। मसलन, यदि कालेज में कलेजा थिरका देने वाला म्यूजिक चल रहा हो और आपको विद्यार्थियों पर निगरानी रखने की नौकरी दी गयी हो तो यातना और पशोपेश के दोहरे दर्द को समझना किसी गैर मास्टर व्यक्तितिव के बस में नहीं है। कुछ ऐसा ही दोहरा योग छेम तब होता है जब मास्टर को अपनी प्रेयसी के साथ किसी प्रेम प्रयुक्त जगह की तलाश करनी हो। इसका विस्ताविक विभेदन तब होता है जब मास्टर की प्रियसी की बड़े शहर की रहने वाली हो और उसको मास्टर होने की विडंबना का भान न हो। गाडी के पीछे मंद-मंद मुस्काते हुए वो आपके अभिमानी अकड़ की भर्त्सना कर रही हो और आप हर उपयुक्त जगह गाडी घुमाकर वापिस जाने को मजबूर हो जायें तो पीड़ा बयां करने के काबिल नहीं रह जाती।

दर्द बयानगी के इस हुनर को इतनी आसानी से कैसे जाने दूँ जबकि एक अहम् पहलु तो मैंने बताया ही नहीं! हांजी,  भारत देश में बंद नाम का एक पर्व होता है जिसके मूल करक की विवेचना स्वयं अमर्त्यसेन और चाणक्य भी नहीं कर सकते। इस पर्व के दिन सरकार, व्यापारी और कर्मचारी को छोड़ कर सभी मसरूफ रहते है। छात्र वर्ग के लिए बड़ी ही मुश्किलों का दिन होता है, वो घर में पिता के डर से रह नहीं सकता और प्रियसी से मिलने जा नहीं सकता। हाँ छात्रावास में रहने वाले प्रजाति के छात्रों की विशेष चाँदी हो जाती है। इस पर भी अविवाहित मास्टर को कोई राहत नहीं मिलती।

एक ओर भारत बंद रहता है दूसरी ओर छात्र चालू रहता है। मोबाइल से बात कराने वाली कंपनियों का खूब भला हो जाता है। खैर, मै मास्टरों की मजबूरी में फोकस करता हूँ। हुआ यूँ की, प्रियसी से मिलने का समय  भारत बंद के समय ही हुआ और  दो चार प्रेम की बातें करने के लिए ज़माने की नजर से छुप के बैठने की कोशिश में गाडी को इस पार्क से उस पार्क बस चक्कर ही लगते रहे।

मास्टर जो की कौम से ही शिकायत धर्मी होता है, उसे पहली बार एहसास हुआ की छात्रों के अलावा भी इंदौर शहर की खस्ता हाल सडकों से उगलती धुल भी उसे बेहद परेशान कर सकती है। एक फलसफा ये भी है कि अगर प्रियसी पीछे गाडी में बैठी हो और उस पर आपको रौब जमाना हो तो ज़माने भर की बुराई करते रहो। ऐसा करने से आपकी प्रियसी आपको विद्वान और शिष्ठाचारी समझेगी।

खैर एक रोमांटिक जगह की तलाश में मास्टर के शरीर से मास्टर मन चलबसा और वो भी बॉलीवुड के अधेड़ उम्र के नायकों की तरह अपनी प्रियसी से टीटीयाने लगा। शगूफा तो ये हुआ कि प्रियसी को अब जा के एहसास हुआ की वो किसी कक्षा में नहीं अपने प्रेमी की गाडी के पीछे बैठीं है। मास्टर को भी अपने हुनरमंद होने का एहसास अभी अभी ही हुआ क्योंकि कभी न हो सकने वाली घटना पल में हो जाये ऐसे ही प्रियसी ने मास्टर के गले में अपनी बाहें पसार दी और एक अदनी सी मोटर साइकिल की दो गज लम्बी सीट में भी वो दोनों जरा असहज नजदीकी से बैठ गए।

एक नागरिक होने के नाते मास्टर जी ने देश के प्रधान मंत्री को धन्यवाद दिया क्योंकि उन्होंने हालही में डीजल की कीमत बढाई है, पेट्रोल की नहीं। वर्ना गरीब मास्टर जिसकी तनखा सरकारी मुलाजिम के पेंशन जितनी होती है वो मॉल, सिनेमाघर, चिड़ियाघर, उपवन और बायपास रोड में रोमांटिक मन के साथ गाडी कैसे चला पता? अच्छा, इंदौर के रचनात्मक यातायात के नियमों का भी मास्टर को तब एहसास हुआ जब अमूमन प्रियसी ने अपने मुख को दुपट्टे से धक् लिया और मास्टर का चेहरा धूल माटी से पहचानने लायक ही नहीं बचा। आज जा के उसको ज्ञात हुआ की युवतियां चेहरा क्यों ढकती हैं और नगरपालिका रोज रात को सड़क में ट्रकों धूल क्यूँ फेकती है। इतना बड़ा निकाय इतने बड़े शहर में भला कैसे इतने धूल का इंतज़ाम करता होगा? मास्टर भाव विभोर हो गया तभी प्रियसी ने मास्टर जी के उदास होने का सबब पूँछ लिया।

ये एक और वजह है जिसके कारण विशव के प्रकांड पंडित भी स्त्री मन को नहीं समझ पाए! मास्टर जब शहर के प्रति धन्यभाव में चूर थे तो प्रियसी को उनके उदास होने की अनुभूति हो गयी। भला मास्टर जी की कोई औकात की वो अपनी प्रेमिका को समझाने की कोशिश भी करते? उन्होंने भी बॉलीवुड के नालेज का उपयोग किया, कहा 'एक पहर बीत गया, हम प्रेमी युगलों को जालिम ज़माने ने गुफत-गु की जगह तक नहीं बक्शी।'

नारी मन उनके हलके तन से बिलकुल उलट होता है! सो वो बायपास के किनारे किसी भरी ट्रक सी पलट गयी और चुटकी लेते हुए कहा "किसने कहा था मास्टर बन जाओ?" मास्टर का बॉलीवुड तेवर जाता सा लगा  लेकिन प्रेमिका ने बात संभाली "अगर आज आप मास्टर न होते तो आप अपने ही छात्रों से मु चुराते हुए यूँ बायपास में न घूम रहे होते?"

"हाँ सो तो है!" मास्टर जी ने गहरी सांस ली और धीरे से कहा "चलो किसी मंदिर में चल कर पेड़ के नीचे बैठेंगे!" बात पूरी करते ही मास्टर जी आँखे बंद कर के ईश्वर का ध्यान करने लगे और मन ही मन कहा "हे प्रभु! इस नारी मन को माना ले तेरे दर्शन भी कर लूँगा और किसी रसूखदार होटल में जाने का खर्च भी बच जाएगा! आज पक्का नारियल भी चढ़ा दूंगा" देश में रिश्वत की आंधी इस तरह चल निकली है, की आम आदमी भगवन को भी मस्का लगा लेता है। हलाकि मस्का पालिस में हुई गलतियों के दुष्परिणाम अभी मास्टर जी को नहीं पता हैं, सो कुछ यूँ हुआ, शंकर जी के मंदिर की कल्पना करते करते मास्टर जी ने नारियल का लालच दी डाला, यही अगर दूध का भी प्रस्ताव दिया होता तो कम से कम शंकर जी के नाग ही प्रसन्न हो जाते! फिर भला भांग, धतूरे के सेवक भोले नाथ क्यूँ का प्रसन्न  लगे? खैर जितने रूपए का मास्टर और उनकी प्रेमिका जूस पी सकते थे उतने का पेट्रोल उनकी गाडी ने पी लिया और वो चोरल के लिए रवाना हो गए। इसी उम्मीद में कि इस मौसम में वहां कोई छात्र युगल नहीं मिलेंगे।

होनी को कौन टाल सकता है। मास्टर भारत में दूसरी ऐसी प्रजाति है जो चुटकुलों और कहानियों में हास्य पैदा करते हैं! पहले के बारे में तो आप santabanta.com में पढ़ ही लेते होंगे? हो भी क्यूँ न मास्टरों की हरकतों में हास्य शुमार ही इतना होता है। आज कल अध्यापक शिक्षा के भाषक कम और पूंजीवादी युग में माँ सरस्वती के फकीरों के प्रतिनीधि ज्यादा हो गए हैं। वो कालेजों में पढ़ने के बजाये हर वो काम करते है जिसमे दमघोटू परिश्रम और हास्य पैदा होता हो। इसी वजह से उनका नियोजन सर्वथा विफल रहता है, जैसा की अभी हुआ। प्रियसी ने गाडी के बहेकने की सूचना चालक को दी। चालक जो अब मास्टर नहीं था बल्कि कोई आवारा बादल सा बॉलीवुड के सारे गीत गा चूका था वो पेट्रोल में दारू की मिलावट की विवेचना अपनी प्रियसी को देने लगा!

"मास्टर जी हवा निकल गयी है हवा!!!! जरा नीचे देखिये!" प्रियसी ने शहरी हाव-भाव से मास्टर के मजे ले लिए। दर्द की बात तो ये है की मास्टर अपनी क्लास की तरह यहाँ भी कोई तल्ख़ जवाब न दे पाए और सडा सा मुह लिए टायर को निहारते रहे।

धुल में सने मास्टर जी पर सूर्य देव का प्रकोप मानो सभी छात्रों की बद्दुआ के प्रतिफल की तरह चुभ रही थी। प्रियसी को अपने पूर्व जनम के पापों का प्रायश्चित सा भान हुआ और वो अपने प्रियतम मास्टर जी को निहारते हुए प्रेम भाव से मुस्कुरा रही थी, पैदल धुप में चलने का दर्द उसके माथे के पसीने से साफ़ छलक रहा था। मास्टर को पहली बार उस प्रश्न का उत्तर मिला जो उसने कई लोगो से पूछा था "इस देश में डाक्टर, इंजिनियर तो सब बनाना चाहते है लेकिन कोई इनको बनाने वाला टीचर क्यों नहीं बनाना चाहता?"

पंचर गाडी, भरी धुप में खीचते हुए, गोरी चमड़ी की फूल सी नाजुक अपनी प्रियसी को धुल पसीने में तर पैदल चलते हुए देख आज मास्टर जी को अपने मास्टर होने पर वास्तविक ग्लानी हो रही थी। गुस्से में हाफ्ता मास्टर तेजी से गाडी आगे की और खीचने लगा ताकि उसकी प्रियसी उसके आंसू और पसीने में भेद न पता लगा सके। वेदना सिर्फ अपनों के मर जाने में नहीं होती है, बल्कि अपनों के सपनो को पूरा न कर पाने में भी होती है। इस देश के भाविय्श्य निर्माता कि इस देश से क्या ममता रह जाएगी अगर इस देश के रखवाले ममता को उपजाने वाले प्रेम की मार्मिकता को नहीं समझेंगे?

ममता सबसे पवित्र है, लेकिन ममता का जन्म दो युगल परिणय से होने वाले निरीह प्रेम से होता है। वास्तव में सरस्वती की ज्ञान वीणा का उपयोग प्रेम के लिए ही होता है, लेकिन लक्ष्मी के कुबेरों ने और काली के असुरों ने सरस्वती के हंस को अहंकारी तलवार से घायल कर दिया है। प्रेम आज विलाप में है। आज अध्यापक मन परास्त है, उसका प्रेम शर्मिंदा है। लज्जित भाव एक ऐसा कलंक है जो मनुष्य को प्रतिशोध तक धकेल आता है।

पर परमात्मा की ममता तभी छलकती है जब प्रार्थी दुःख की पराकाष्ठा पर हो। चोरल से लौटते हुए दो प्रेमी छात्र युगल ने अपने मास्टर को पहचान लिया। वो तुरंत रुके, मास्टर के हाथ से गाडी ली और दूसरी गाडी में मास्टर एवं उसकी प्रियसी को पास के किसी होटल तक जाने को कहा।

शहर से दूर वो होटल एक शांत प्रेम पूर्ण जगह थी जहाँ चिड़ियों की कलरव प्रेम के माधुर्य को प्रछालित कर रही थी। मास्टर मन तरस रहा था इसी मिठास के लिए। अथक प्रयासों के बाद मिला था ये असीम प्रेम का माहोल। थोड़ी देर में वो चारो छात्र भी आ गए और चाय की चिस्कियों के साथ माहोल चुटकुलों और ठहाकों में सराबोर हो गया। मास्टर का छुप के अपनी प्रेयसी को देखना और उसका धीरे से मुस्कुरा देना उन ठहाकों के बीच बड़ा रोमांटिक लग रहा था।

शाम हुई और चिड़ियों की तरह इन प्रेमी युगलों के के भी घर लौटने की बेला आन पड़ी। गाडी मै  बैठते ही उन्होंने मास्टर जी के कानो में कहा "मास्टर जी! क्या पढ़ाते हो जो तुम्हे इतना आदर मिलता है?" गाडी के शीशे में  उनकी शर्मीली मुस्कान देख कर कुछ न कहने को जवाब समझकर फिर आगे कहा "शायद दुनिया के किसी भी इन्सान को आज वो सुख और आदर नहीं मिलता जो आज मुझे आपके साथ मिला है।"

भीनी सी मुस्कान लेते हुए मास्टर जी आसमान की ओर देख अपने मास्टर होने के गर्व से निहारने लगे। उनके होठों में अभिमान भरी वो हंसी देर थक चिपकी रही....

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Please express your views! JV

Reforms & Protests

In capitalizing global economy no one will do charity business, naturally they have profits in mind but if we are opening our doors they are opening theirs too. Stop complaining, grow up! Take the challenge and win! 
: Jitendra Verma 

In Rajeev Gandhi era when Computers arrived to India, opposition parties claimed 'In a country of Lalten and Bullock-cart where even electricity is a far cry, what computers will do?' They further extended their protests by provoking poor civilians that 'A computer can do 1000 clerks job which means one computer will cost the job of thousand Indians'

Today computer is the source of livelihood to the population which otherwise could have fighting for Brown Sugar, Cocaine, Opium.


1991 reforms of government had a criticism of bringing economic slavery but we are the witness that the per-capita income of India has grown from INR8109.00 to INR53300.00 per Annum since 1990s to 2012. In 2012 for the first time India witnessed a history of having middle class population more than poor population by 347Mn and 346Mn respectively. This indicates that the futility of dogma of "rich getting richer and poor getting poorer"


"Slow agricultural growth is a concern for policymakers as some two-thirds of India’s people depend on rural employment for a living. Current agricultural practices are neither economically nor environmentally sustainable and India's yields for many agricultural commodities are low. Poorly maintained irrigation systems and almost universal lack of good extension services are among the factors responsible. Farmers' access to markets is hampered by poor roads, rudimentary market infrastructure, and excessive regulation" - World Bank


However, I want to pin down Indian policy makers for one thing i.e. not taking actions well withing safe time zone. We react emergencies way better than provided time space, had it been a NOT alarming decision, India would have surpassed Chinese developing rate. In 1991 reforms, in Kargil war and now in FDI, actually reacting to the problems not finding ways of growth. This is one thing Indian poly makers should regret upon. 

We have started feeling the heat of discomfort by these subsidies in Indian economy but we are almost burning in the fire of reservation. It only because of one reason i.e. attitude of playing safe. We are not in mood to educate of brothers and sisters that protectionism is not solution. Synergistic spirit is the real benefit. We educate our kids for risk taking by asking them walk on their feet, go school by their own, live away from home by their own than why we are not educating out people that let the market decide on what we have to pay for fuel we are consuming and what profession should we get based upon how much we are prepared.

"It's a crime to teach crutch-walk to those who actually 
can run but are afraid to risk their safety net"

It's a crime to teach crutch-walk to those who actually can run but are afraid to risk their safety net. With reservation and subsidy we are actually providing crutches to those who are able and with legs. This is ballooning the environment! Because of subsidized fuel their are many Indians over consuming it and so are putting pressure in demand-supply mechanism of Fuel Industry. 
Their are many who are having caste based reservations but are actually the sons and daughters of IS, IAS, Doctors or such white color officials. Their are many who are the actual needy of reservation and subsidies but are not able to have it because of the exploitation of the same by their own brothers and sister. This in turn is increasing rage and anger of common Indian which some day will explode only to settle on pile of the ashes of existing canny system of administration.  

For the question of repercussions of unbuttoning Economy and Politics of India from Subsidy and Reservation. I must say, to construct new houses, we have to destruct the older ones. Anything rampaged looks horrible but the feel of being robbed refuels to get rich. Things will rocket up for a very small time period and than will settle only to garner peace and prosperity. Their is term called price elasticity in economics which decides the market value of any commodity. Fuel must have its market value based upon this price elasticity! Nothing will go wrong, it will reduce pollution, black marketing and other social evils. 

We had Rickhawala's before we brought Auto-Rickshaw but no Rickshaw wala's died of starvation. 
We had STD-PCOwala before we had Cyber Cafes but none of STD wala's died of starvation.  
We had bullockcarts before we had Airplanes but none of bullockcart wala's died

Civilians have always been restrained to changes but every change had only elevated their standard of living. These reforms will bring new changes to India, we just have to be hopeful. On the contrary we have to accept it that in globalized sentiments of commerce no one will bring cake in your plate without getting some profit in return. We should not accept charity from Americans and Europeans provided they are the leaders of 21st century. 

STOP BRAGGING, BEGGING AND COMPLAINING. PLEASE GROW UP!

My Code Red

An Official Plan of Action
My Code Red is a chronically planed action towards my mission of designing a system of providing quality education to anyone who has willingness to learn new and contribute towards the betterment of mankind. 
 Declared enemy of my Code Red

I fail to understand why reformists hate active politics. Why do they think that they can help demand anything from the parliament but they cannot walk in to parliament to act. Experts says politics is a passion and so it has nothing to do with reforms or welfare to mankind. I cannot consume this idea.

If at all politics get termed as profession then its USP is that it has no personal life. Entire mankind turns out to be your extended family. When a thought capacity of such kind matures up one transcendent into the profession called politics. This is how great leaders like Ashoka, Akbar and Aurangjeb brought prosperity to India. However they refused to identify blood relations as their personal relations which was the necessary action of their arena not today.

I fail to recognize super heroes and their utility. Whoever in the world claims that he/she can solve the problem of India is actually not understanding the problem of India. I have seen many public orators in my career who often speak as if they are motivating soldier's troop for any war. They think that a public speaking in the topic of people welfare will actually get welfare done. Their are Bollywood drama's where they get to create 'Ram Rajyam' by killing all evils with a single punch. After so much of melodrama I truly believe that Indian residents are now grown mature enough not to get deluded of such fancy and please all claims of super heroes.

Let me put it this way...
People need some doable, reliable, feasibly done by a common man job to eradicate certain ailments of Indian social structure.

Now how do you think this is gonna be a reality?
I thought a lot about this, more I thought, more I immersed into the fantasies of being super-powerful like that of Shaktiman, Captain Veom or Superman. But I knew that such powers like of Spiderman or Hulk is not possible and their is solution for every problem. I just have to figure it out. Then began to examine which profession can effect the lives of masses.
Doctor? No! I can't be the one and there are not many who're ill.
Lawyer? No! Many who are real sufferers can't reach me or afford my services.
Charity-st? No! Many dad and theirs have not done any big buck businesses to help me render this.
Socialist? No! This is sufferer class who exhibits the problem NOT solve it.
Teacher? No! It creates value in society but before it gets some bones it dies in real words.

Than I thought of Being Politician! A leader. An actual value creator for the society. Policies made by him/her are directions a society takes. I recalled my father wanted me to be the politician but he rested on my aspirations and hence never disturbed me for his dreams for me. When I reached him again for trying being the one, he was glad but more than this he asked. 'What will you do?''

Being just a politician is like being just a tailor but having no job of dress designing! Dad's was a genuine question to which I replied 'Eradicate poverty'. He respected my handsome thought but again coined 'How?'

This 'how?' took me long 6 years  
I never wanted to plan some well framed mellow of politics like Roti Kapda or Makan. I had a hatred for the people who bee line and peep in to know what's happening in others home. Sadly Indian politics so far is working on this method of exciting neighbors to heed in others business. It worked out well but will not do any longer. Statistics suggest that youngsters are not participating in voting. They sadly will not until a real candidate with life changing visions is not get listed in the EVM.

How?
Not by developing sense of competition, comparison or race.
Not by lurking deals of providing food, home, wearable.
Not by discrimination of Caste and Class over reservations
Not by committing favoritism for regional origin like Marathi Manus for UPs Bihars.
Not by isolating Dravids from Aryans to disrupt National Identity
Not by gender prejudices
Not by Jihad, Naxalite or Maoisms
Not by cowardliness of Gandhian Non-Violence
Not by Gunman Maoism
Not by beggar Marxists
But by the power of Educating all for they stand entitled to know 'Why they are the way they are...' 
 Providing Education to every class of world's mankind is my mission for which I will join politics. I do not claim that education for all will solve every problem of the sufferers of this world but It'll ensure that they are not going to be the victim of ignorance, victim of mighty blue blood's greed or simple the victim of some extreme ideologies.
My mission to educate all will create awareness that how this middle class and lower class is becoming the scapegoat. It will trigger sleep less nights in royals clan which will help float some money on street to actually deliver all that they had committed since they are on power.

My Code Red 
2017 : Summing up everything I've expanded to i.e. teaching, education (PhD, D Lit, Post Doc etc), Researches, Book Writing and Hunt for like minded people 
2017-2019 : Under cover execution of all that we have planned for politics 
2019 : Fighting election from already decided Parliament Seats. 
2019 onward: Creating India's identity of Takshshila and Nalanda back to life.    

Advice to my fellow enemies 
1. I am small fish as of now so do your course don't wait till I grow up and eat your share of flesh and bone.
2. I am not here for Dog Fight... Get used to of Roars. Sooner is better for you all.
3. My smallest attack will be a lifetime scar in your face at-least (If alive) 

Women & Mankind

A group of young women of USA has demanded the right of roaming topless as does their male counterpart. In another major development Saudi Government is developing a city only for the women so that they can get away from Burkha. India too has noticed scientific rise in the registered surrenders of new born children by unwed mothers in-spite of abandonment, miss-carriage or abortion. 



It becomes vital to comment upon sleeping cell activity of a volcanic class of human society when it is gaining power via uncontrolled consequences of globalizing human civilization.   
Media recently reported that "Indian women are the passive bed partners". In this study, it is also mentioned that this trend is shifting fast. As per a social think tank 'India has been a country where women desires were been compromised since last 5000 years. Microscopically if we observe the social consequences, it is a taboo to any society which is ignorant to the desires of its half of the population plus transgenders (LGBT)'. In a very bold and manly discussion over the gossips of chastity among my most intellectual fraternity, we began to discuss the validity of the claim of a segment of American women on living bare chest as a right of freedom. Like any typical Indian, I foiled their claim out-rightly. My verdict over this claim was partially because of my male dominance too. I defended it with an intention that it will mar the excitement of virginity. Here should be a limit in public ways of appearances which in turn will keep the system less vulnerable to civil crimes against any gender.

This demand may appear vulgar to many. Overtly modernized moron class of society which has gone frustrated from all their materialistically lustrous life are demanding something unfair. However, if anything that prohibits anyone for any act on the basis of social norms  is actually an act of limiting freedom. We as an educated class of society should focus upon the quality of roads and cars rather than limiting the scope of drivers to ensure safety. We should construct an ecosystem where everyone should feel equality and honored rather limiting anyone's freedom to ensure social decency. For example, if a set of women is demanding to have a lifestyle equivalent to their man counterpart or any queer demanding honor and equality in the society than probably this will only end up enhancing the emotional and intellectual maturity of the society. This will in turn elevate the quality if creative contributions to the mankind.
  
A school of thought strongly believes that 'women are strong magnet which has capacity to influence logical values of man' it is so they are liable to be slaved by man and should be ignorant of the social developments lead by man dominated societies. This theory of leadership ethics is called 'veil of ignorance'. Men wants women to be treated as secondary and controlled by their respective man. 'Burkha' for example was proposed in Islam only to hide the beauty of a women so that they cannot woo the men and could not disturb the public life of a man.

This is protectionism! It begins when you fail to compete and still desire to win kicks. Women has always been more efficient than men. Civil system since the origin of human civilization did not allow children and old man to do public work because of lack of physical strength. Bio-logically women were not competent for public works like hunting and collecting food in jungle because of unknown monthly sickness of menses cycle. This is so the old man of a clan was proposed for advisory boards based on their expertise, children to learn the art of predatory and women to take care of clan's domestic setup. It was autonomous and not proposed by anyone specifically but steadily it become assumption. It become complex when such assumptions failed to comply with the desires. Old men of the clan were satisfied because they had a past of glorious achievements. Children were satisfied because they were preparing for glorious future but women had no such past, present of future. The desire of gain glory remain beneath their cleavage. It become volcanic only to erupt in an maturing intervals but only for the desire of glory. Desire of respect and equality of the women got no attention in the man dominated society ever since it began. A survey reveals that women in India had no choice on selecting their male partner. Even in present era of educated middle class women have limited say on the choice of their life partner. A research on household affairs, it is concluded that women often becomes the victim of males dominated will of getting pleasures against their own willingness.  

Civilization is an autonomous system of evolution. It largely had no commander. However Britain successfully controlled the global civilization after the end of dark age and beginning of machine age but the consequences of British's dominion was not in the control of British herself. Globalization is the new term of civilization. Unified education, lifestyle, dressing sense, exchange of information, freedom of Media. Basic Rights of common citizen of globalized union of nations has elevated the living standard of mankind.

A classic example worthy to quote here is today's front page news in the Times of India, Mumbai edition i.e. women registration for education is 72% in middle class society. This is a revolution of empowered women. It will uplift the whole face value of Indian society because educated women are far more committed to build education based society.

Educated women has begun to demand their rights of equality and honor. They got to know that they are sharing the pain of confinement from all the women of the world. They all are equally betrayed in this man dominated society. They began to gain sympathy from larger pool of social thinkers, they begin revolution of a new era. Perhaps present is the only time when women set to rise for equality and honor... This world is squared down from all the corners for fair play. Deprived social class, betrayed caste-ism, gender discrimination not only from women but also from transgenders are rising up for their equality... Time is set to witness one major break through of more leveled field for the game blue bloods are playing since the origin of mankind.

Your views invited..:)