और अगर


कहीं पे हम नहीं मिलते,
कहीं पे तुम नहीं मिलते। 
अगर हम तुम नहीं मिलते, 
तो हमें ये गम नहीं मिलते।।

अगर राहें बदल जाती,
या मंजिल बदल जाती। 
न कारवां ये संग चलता,
तो जली किस्मत बदल जाती।।

काष राहों में हम,
तुम साथ नहीं चलते।
कहीं पे हम नहीं मिलते,
कहीं पे तुम नहीं मिलते।। 

सफ़र में सादगी होती,
न मिलने की चाह भी  होती। 
न होते हम जुदा मिलकर,
न ग़मों की आह सी होती।।

जो दामन तुम कल झिड़क देती, 
तो हम तुम आज नहीं रोते।।

कहीं पे हम नहीं मिलते,
कहीं पे तुम नहीं मिलते।।।

जले दिया ...जले बाती ,
बस उजालों के ये दो साथी।
दुआयें  थीं मेरे घर में, 
जो तुम आती तो क्या पाती।

सफ़र बाकीं अगर रहता ,
तो इरादे और भी होते।
मगर ...
तुम्ही को तुम नहीं मिलते, 
हमी को हम नहीं मिलते।।
और अगर 
हमी हम नहीं मिलते,
तो किसी को ये गम नहीं मिलते।

It's a very old poem of my college days, just it happened that I recalled. A lot of it seems true! Isn't it? 

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