मास्टर का प्रेम


यूँ तो मुझे पता है कि आप चुस्की लेने की उम्मीद में इसे पढ़ रहे हैं, और मेरी भी गनीमत इसी बात में  है की मै आपको मायूस न करूँ। हालाँकि कि मास्टर होने की मजबूरी के तहत मै अपनी रायचंदी में कोई कमिपेशी नहीं करूँगा इसलिए आप अगर आ ही गए है तो पूरा पढियेगा। मुगालता ही सही पर ब्रम्ह ज्ञान का दावा तो मै कर ही देता हूँ, अभी से।

प्रेम की परिभाषा के चक्कर में बड़े बड़े प्रेम का शिकार हो गए हैं इसलिए मैं सतर्कता पूर्वक इसकी परिभाषा किये बगैर इसके राहू की भांति मास्टरों के जीवन में आने की और इस विडम्बना कि विवेचना करता हूँ।

मास्टरी एक मजबूरी से लदी कौम है। मसलन, यदि कालेज में कलेजा थिरका देने वाला म्यूजिक चल रहा हो और आपको विद्द्यार्थियों पर निगरानी रखने की नौकरी दी गयी हो तो यातना और पशोपेश के दोहरे दर्द को समझना किसी गैर मास्टर व्यक्तितिव के बस में नहीं है। कुछ ऐसा ही दोहरा योग छेम तब होता है जब मास्टर को अपनी प्रेयसी के साथ किसी प्रेम प्रयुक्त जगह की तलाश करनी हो। इसका विस्ताविक विभेदन तब होता है जब मास्टर की प्रियसी किसी बड़े शहर की रहने वाली हो और उसको मास्टर होने की मजबूरियों का भान न हो। गाडी के पीछे मंद-मंद मुस्काते हुए वो मास्टर जी की अभिमानी अकड़ की भर्त्सना कर रही होती है और मास्टर जी हर उपयुक्त जगह से गाडी घुमाकर वापिस जाने को मजबूर हो जायें तो पीड़ा बयां करने के काबिल कहाँ रह जाती है?

दर्द बयानगी के इस हुनर को इतनी आसानी से कैसे जाने दूँ जबकि एक अहम् पहलु तो मैंने बताया ही नहीं! हांजी,  भारत देश में बंद नाम का एक त्यौहार होता है जिसके मूल करक की विवेचना स्वयं अमर्त्यसेन और चाणक्य भी नहीं कर सकते। इस पर्व के दिन सरकार, व्यापारी और कर्मचारी को छोड़ कर सभी मसरूफ रहते है। छात्र वर्ग के लिए बड़ी ही मुश्किलों का दिन होता है, वो घर में पिता के डर से रह नहीं सकता और प्रियसी से मिलने बहार जा भी नहीं सकता। हाँ छात्रावास में रहने वाले प्रजाति के छात्रों की विशेष चाँदी हो जाती है। इस पर भी अविवाहित मास्टरों को कोई राहत नहीं मिलती।

एक ओर भारत बंद रहता है, दूसरी ओर छात्र चालू रहता है। मोबाइल से बात कराने वाली कंपनियों का खूब भला हो जाता है। खैर, मै मास्टरों की मजबूरी में फोकस करता हूँ। हुआ यूँ की, प्रियसी से मिलने का समय और भारत बंद एक ही दिन ये और दो चार प्रेम की बातें करने के लिए ज़माने की नजर से छुप के बैठने की कोशिश में गाडी को इस पार्क से उस पार्क बस चक्कर ही लगते रहे।

मास्टर जो की कौम से ही शिकायत धर्मी होता है, उसे पहली बार एहसास हुआ की छात्रों के अलावा भी इंदौर शहर की खस्ता हाल सडकों से उगलती धुल भी उसे बेहद परेशान कर सकती है। एक फलसफा ये भी है कि अगर प्रियसी पीछे गाडी में बैठी हो और उस पर आपको रौब जमाना हो तो ज़माने भर की बुराई करते रहो। ऐसा करने से आपकी प्रियसी को आपके विद्वान और शिष्ठाचारी समझेगी।

खैर एक रोमांटिक जगह की तलाश में मास्टर के शरीर से मास्टर मन चलबसा और वो भी बॉलीवुड के अधेड़ उम्र के नायकों की तरह अपनी प्रियसी से टीटीयाने लगा। शगूफा तो ये हुआ कि प्रियसी को अब जा के एहसास हुआ की वो किसी कक्षा में नहीं अपने प्रेमी की गाडी के पीछे बैठीं है। मास्टर को भी अपने हुनरमंद होने का एहसास अभी अभी ही हुआ क्योंकि कभी न हो सकने वाली घटना पल में हो जाये ऐसे ही प्रियसी ने मास्टर के गले में अपनी बाहें पसार दी और एक अदनी सी मोटर साइकिल की आधा गज लम्बी सीट में भी वो दोनों जरा असहज नजदीकी से बैठ गए।

एक नागरिक होने के नाते मास्टर जी ने देश के प्रधान मंत्री को धन्यवाद दिया क्योंकि उन्होंने हालही में डीजल की कीमत बढाई है, पेट्रोल की नहीं। वर्ना गरीब मास्टर जिसकी तनखा सरकारी मुलाजिम के पेंशन जितनी होती है वो मॉल, सिनेमाघर, चिड़ियाघर, उपवन और बायपास रोड में रोमांटिक मन के साथ गाडी कैसे चला पता? अच्छा, इंदौर के रचनात्मक यातायात के नियमों का भी मास्टर को तब एहसास हुआ जब अमूमन प्रियसी ने अपने मुख को दुपट्टे से धक् लिया और मास्टर का चेहरा धूल माटी से पहचानने लायक ही नहीं बचा। आज जा के उसको ज्ञात हुआ की युवतियां चेहरा क्यों ढकती हैं और नगरपालिका रोज रात को सड़क में ट्रकों धूल क्यूँ फेकती है। इतना बड़ा निकाय इतने बड़े शहर में भला कैसे इतने धूल का इंतज़ाम करता होगा? मास्टर भाव विभोर हो गया तभी प्रियसी ने मास्टर जी के उदास होने का सबब पूँछ लिया।

ये एक और वजह है जिसके कारण विशव के प्रकांड पंडित भी स्त्री मन को नहीं समझ पाए! मास्टर जब शहर के प्रति धन्यभाव में चूर थे तो प्रियसी को उनके उदास होने की अनुभूति हो गयी। भला मास्टर जी की कोई औकात की वो अपनी प्रेमिका को समझाने की कोशिश भी करते? उन्होंने भी बॉलीवुड के नालेज का उपयोग किया, कहा 'एक पहर बीत गया, हम प्रेमी युगलों को जालिम ज़माने ने गुफत-गु की जगह तक नहीं बक्शी।'

नारी मन उनके हलके तन से बिलकुल उलट होता है! सो वो बायपास के किनारे किसी भरी ट्रक सी पलट गयी और चुटकी लेते हुए कहा "किसने कहा था मास्टर बन जाओ?" मास्टर का बॉलीवुड तेवर जाता सा लगा  लेकिन प्रेमिका ने बात संभाली "अगर आज आप मास्टर न होते तो आप अपने ही छात्रों से मु चुराते हुए यूँ बायपास में न घूम रहे होते?"

"हाँ सो तो है!" मास्टर जी ने गहरी सांस ली और धीरे से कहा "चलो किसी मंदिर में चल कर पेड़ के नीचे बैठेंगे!" बात पूरी करते ही मास्टर जी आँखे बंद कर के ईश्वर का ध्यान करने लगे और मन ही मन कहा "हे प्रभु! इस नारी मन को माना ले तेरे दर्शन भी कर लूँगा और किसी रसूखदार होटल में जाने का खर्च भी बच जाएगा! आज पक्का नारियल भी चढ़ा दूंगा" देश में रिश्वत की आंधी इस तरह चल निकली है, की आम आदमी भगवन को भी मस्का लगा लेता है। हलाकि मस्का पालिस में हुई गलतियों के दुष्परिणाम अभी मास्टर जी को नहीं पता हैं, सो कुछ यूँ हुआ, शंकर जी के मंदिर की कल्पना करते करते मास्टर जी ने नारियल का लालच डाली थी, भला भोलेनाथ को नारियल क्यों भने लगा? यही अगर दूध का भी प्रस्ताव दिया होता तो कम से कम शंकर जी के नाग ही प्रसन्न हो जाते! फिर भला भांग, धतूरे के सेवक भोले नाथ क्यूँ  प्रसन्न होने लगे? खैर जितने रूपए का मास्टर और उनकी प्रेमिका जूस पी सकते थे उतने का पेट्रोल उनकी गाडी ने पी लिया और वो चोरल के लिए रवाना हो गए। इसी उम्मीद में कि इस मौसम में वहां कोई छात्र युगल नहीं मिलेंगे।

होनी को कौन टाल सकता है। मास्टर भारत में दूसरी ऐसी प्रजाति है जो चुटकुलों और कहानियों में हास्य पैदा करते हैं! पहले के बारे में तो आप santabanta.com में पढ़ ही लेते होंगे? हो भी क्यूँ न मास्टरों की हरकतों में हास्य शुमार ही इतना होता है। आज कल अध्यापक शिक्षा के भाषक कम और पूंजीवादी युग में माँ सरस्वती के फकीरों के प्रतिनीधि ज्यादा हो गए हैं। वो कालेजों में पढ़ाने के बजाये हर वो काम करते है जिसमे दमघोटू परिश्रम और हास्य पैदा होता हो। इसी वजह से उनका नियोजन सर्वथा विफल रहता है, जैसा की अभी हुआ। प्रियसी ने गाडी के बहेकने की सूचना चालक को दी। चालक जो अब मास्टर नहीं था बल्कि कोई आवारा बादल सा बॉलीवुड के सारे गीत गा चूका था वो पेट्रोल में दारू की मिलावट की विवेचना अपनी प्रियसी को देने लगा!

"मास्टर जी हवा निकल गयी है हवा!!!! जरा नीचे देखिये!" प्रियसी ने शहरी हाव-भाव से मास्टर के मजे ले लिए। दर्द की बात तो ये है की मास्टर अपनी क्लास की तरह यहाँ भी कोई तल्ख़ जवाब न दे पाए और सडा सा मुह लिए टायर को निहारते रहे।

धुल में सने मास्टर जी पर सूर्य देव का प्रकोप मानो सभी छात्रों की बद्दुआ के प्रतिफल की तरह चुभ रहा था। प्रियसी को अपने पूर्व जनम के पापों का प्रायश्चित सा भान हुआ और वो अपने प्रियतम मास्टर जी को निहारते हुए प्रेम भाव से मुस्कुरा रही थी, पैदल धुप में चलने का दर्द उसके माथे के पसीने से साफ़ छलक रहा था। मास्टर को पहली बार उस प्रश्न का उत्तर मिला जो उसने कई लोगो से पूछा था "इस देश में डाक्टर, इंजिनियर तो सब बनाना चाहते है लेकिन कोई इनको बनाने वाला टीचर क्यों नहीं बनाना चाहता?"

पंचर गाडी, भरी धुप में खीचते हुए, गोरी चमड़ी की फूल सी नाजुक अपनी प्रियसी को धुल पसीने में तर पैदल चलते हुए देख आज मास्टर जी को अपने मास्टर होने पर वास्तविक ग्लानी हो रही थी। गुस्से में हाफ्ता मास्टर तेजी से गाडी आगे की ओर खीचने लगा ताकि उसकी प्रियसी उसके आंसू और पसीने में भेद न पता लगा सके। वेदना सिर्फ अपनों के मर जाने में नहीं होती है, बल्कि अपनों के सपनो को पूरा न कर पाने में भी होती है। इस देश के भाविय्श्य निर्माता कि इस देश से क्या ममता रह जाएगी अगर इस देश के रखवाले ममता को उपजाने वाले प्रेम की मार्मिकता को नहीं समझेंगे?

ममता सबसे पवित्र है, लेकिन ममता का जन्म दो युगल परिणय से होने वाले निरीह प्रेम से होता है। वास्तव में सरस्वती की ज्ञान वीणा का उपयोग प्रेम के लिए ही होता है, लेकिन लक्ष्मी के कुबेरों ने और माँ काली के असुरों ने सरस्वती के हंस को अहंकारी तलवार से घायल कर दिया है। प्रेम आज विलाप में है। आज अध्यापक मन परास्त है, उसका प्रेम शर्मिंदा है। लज्जित भाव एक ऐसा कलंक है जो मनुष्य को प्रतिशोध तक धकेल देता है।

पर परमात्मा की ममता तभी छलकती है जब प्रार्थी दुःख की पराकाष्ठा पर हो। चोरल से लौटते हुए दो प्रेमी छात्र युगल ने अपने मास्टर को पहचान लिया। वो तुरंत रुके, मास्टर के हाथ से गाडी ली और दूसरी गाडी में मास्टर एवं उसकी प्रियसी को पास के किसी होटल तक जाने को कहा।

शहर से दूर वो होटल एक शांत प्रेम पूर्ण जगह थी जहाँ चिड़ियों की कलरव प्रेम के माधुर्य को प्रछालित कर रही थी। मास्टर मन तरस रहा था इसी मिठास के लिए। अथक प्रयासों के बाद मिला था ये असीम प्रेम का माहोल। थोड़ी देर में वो चारो छात्र भी आ गए और चाय की चिस्कियों के साथ माहोल चुटकुलों और ठहाकों में सराबोर हो गया। मास्टर का छुप के अपनी प्रेयसी को देखना और उसका धीरे से मुस्कुरा देना उन ठहाकों के बीच बड़ा रोमांटिक लग रहा था।

शाम हुई और चिड़ियों की तरह इन प्रेमी युगलों के के भी घर लौटने की बेला आन पड़ी। गाडी मै  बैठते ही उन्होंने मास्टर जी के कानो में कहा "मास्टर जी! क्या पढ़ाते हो जो तुम्हे इतना आदर मिलता है?" गाडी के शीशे में  उनकी शर्मीली मुस्कान देख कर कुछ न कहने को जवाब समझकर फिर आगे कहा "शायद दुनिया के किसी भी इन्सान को आज वो सुख और आदर नहीं मिलता जो आज मुझे आपके साथ मिला है।"

भीनी सी मुस्कान लेते हुए मास्टर जी आसमान की ओर देख अपने मास्टर होने के गर्व से निहारने लगे। उनके होठों में अभिमान भरी वो हंसी देर थक चिपकी रही....

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