बस्ती का बुढ़ापा



छात्र काल में ही विवाहित हुए युवक को नौकरी लुभा ही लेती है। गाँव से हाजारों मील दूर कौन जान पायेगा की गाँव का सबसे पढ़ा लिखा लड़का मजदूरी कर रहा है।  
:- जीतेन्द्र वर्मा

सिगड़ी लहक चुकी थी और शायद ठण्ड भी बढ़ गयी थी। शरीर आगे से तो गर्म था मगर पीठ ठिठुरी जा रही थी। ऐसे मे विज्ञान का पाठ याद कर के पापा जी को सुनाना भला किसी फांसी की सजा से कम क्या होगा। भोर उठ आई थी मगर कोहरे ने धुप को रोक रखा था। भीनी सी ओस ने आसमान को बर्फ की पहाड़ी जैसा श्वेत कर दिया था। लिप्टस के पेड़ हलकी हवा में झूम रहे थे, विज्ञानं की किताब के अलावा सब कुछ हसीं लग रहा था। तभी भीतर से कुछ आहट आई, शायद पिता जी उठ गायें है।

आज भी पिताजी के गुस्से को याद कर के बिजली कौंध जाती है। बहरहाल जाने क्यों आज २० साल बाद उनका ये तल्ख़ अंदाज हु बा हु याद आ गया। ट्रेन की खिड़की से बहार दूर छोटी सी पहाड़ी में एक परिवार फूस का मकान बना रहा है। गाडी बड़ी देर से रुकी हुई है। कोई स्टेशन नहीं है बस बीच में ही कहीं, सहयात्रियों में कई नारद और संजय मिल ही जाते हैं, एक एक कर के अफवाह और खबर आती रहीं और उनको छान के मै ये समझ पाया की आगे कोई रेलगाड़ी पटरी से उतर गयी है और यातायात ठप पड़ गया है। जाने क्या बात है, उस परिवार के मकान बनाने की तल्लीनता को निहारने का मन कर रहा है बस। सहयात्री नारदों ने बताया की यहाँ कोई नया बिजली का कारखाना खुला है, और दूर दराज से आये श्रमिक एक एक कर के घर बना रहे हैं।

किसी ख्याल की तरह, कुछ दिन में ये बस्ती जवान हो जाएगी। और मै उस बस्ती में पला बढ़ा हूँ जो कभी जवान थी। आज वो बूढी हो चली है। मेरी उम्र के सारे लोग उसे छोड़ के शहर आ बसे हैं। श्रमिकों की ये बस्ती पीछे छूट गयी है, कुछ मेरे स्कूल में ही छूट गए दोस्तों के साथ। श्रमिकों के रिटायर होकर मर जाने के बाद आज ये बस्ती अनाथ सी बिलखती है। कोयले की वो खदानें जो कभी बोगी भर भर के कोयेला उगलती थीं आज मर चुकीं हैं। चिमनिया, श्रमिकों की पारी बदलने के लिए जोर चिल्ला उठाने वाला लोहे का वो सायिरेन सब बस धीरे धीरे गल रहे हैं। कंपनी के उस अस्पताल में अब कोई लाजवान कहलाने लायक डाक्टर नहीं बचा। उस क्लब में अब कोई टेनिस नहीं खेलता जिसमे हम श्रमिको की औलादों को जाने तक की अनुमति नहीं थी।

मेरे ही स्कूल से छूट गए साथी आज यहाँ ड्रग्स बेचते हैं, आज कल यहाँ की पुलिस ज्यादा बर्बर हो गयी है। पड़ोस की जवान लड़कियों को प्यार में फांस कर शहर भाग जाना भी एक नया रुआब बन गया है। एक पान की गुमटी में खड़े हो जाओ तो आस पास की साड़ी बस्ती की खबर मिल जाती है। किसका चक्कर किसके साथ है, किसने किसको मारा है, आज सट्टे का भाव क्या है, अफीम कहा मिलेगी बस येही तो सुर्खियाँ हैं यहाँ पे। मिश्र में क्या हो रहा है, दिल्ली के इंडिया गेट में क्या प्रदर्शन हुआ, लोकपाल बिल क्या है.… इनकी बला से।

खैर मन खट्टा हो जाये ऐसी बात क्यों सोचूं, घर से गाडी आ गयी है हमे वापस ले जाने के लिए, साड़ी रेलगाड़ियाँ रद्द हो चुकीं हैं, शहर के कौतूहल को मेरा इंतज़ार कुछ दिन और करना होगा। पहाड़िया, पहाड़ी नदी और ये रिम झिम बारिश, शहर के लोग शायद जन्नत मौत के बाद ही देख पाएंगे। हरियाली और कोहरा मेरे सूती कुर्ते को भिगो रहा है या शायद मेरे मन को भी। अभी का नजारा कोई देखे तो मेरे बताने पर भी यकीन नहीं करेगा की यहाँ कभी दैत्याकारी मशीनें मिनटों में ट्रकों भर कोयला निकाल दिया करती थीं।

जिस बस्ती में मेरा बचपन बीता वो कभी घाना जंगल था। अंग्रेजों ने यहाँ कोयला ढूंढ निकला… फिर क्या था उनकी रेलगाड़ियों को कोयला चाहिए था और उनको जंगल। धीरे धीरे जंगल, जानवर और आदिवासी चल बसे और मशीनों को चलाने के लिए दुसरे प्रान्त से मजदूर बुला लिए गये। मेरे पिताजी यूँ तो अलाहाबाद विश्व विद्यालय के छात्र भी थे छात्र नेता भी लेकिन छात्र काल में ही विवाहित हुए युवक को नौकरी लुभा ही लेती है। गाँव से हाजारों मील दूर कौन जान पायेगा की गाँव का सबसे पढ़ा लिखा लड़का मजदूरी कर रहा है। विदेशी कंपनी थी आजादी के ३० साल बाद अब सरकारी हो चुकी थी। परिवार चलाने के लिए अच्छी वेतन वाली मजदूरी का चयन ही उनको ठीक लगा। ग्रेजुएट होने के बावजूद श्रमिक हो जाना आत्मबल को कमजोर बना देता है लेकिन पापा जी के साथ ऐसा नहीं था, सामाजिक विकास की ललक ज्यों की त्यों बनी रही।

उन्होंने मेरा एडमिशन कंपनी के सबसे बेस्ट स्कूल में कराया, जहाँ जी.एम् और मेनेजर के लड़के पढ़ते हैं। ये इतना आसान नहीं था जितना लिख दिया है। एक एक कागज के लिए दफ्तर दफ्तर भटकना पड़ा था, जिस बाबु को पता चल जाये ये मजदूर अपने बेटे को सेंट्रल स्कूल में पढ़ने की हिम्मत जुटा रहा है वो ही कागज अटका देता था। लेकिन उन बाबुओं को भी क्या पता था की मेरे पापा इलाहबाद यूनिवर्सिटी से छात्र नेता रह चुके थे। नियति श्रमिक को घमंड करने का मौका इतनी आसानी से कहाँ देती है?
साईकल से पापा जब पहले दिन स्कूल छोड़ने जा रहे थे तो उनका रुआब देखने लायक था। उनके चेहरे का अभिमान चमक रहा था। उतावले पन  में मेरे साइकिल से जल्दी उतरने की कोशिश  में हम दोनों साइकिल के साथ गिर गए। ये घटना स्कूल के मेन गेट के सामने हुई। बारिश का महीना था, हम कीचड में ही गिरे थे.… सबके सामने। आज भी पापा का वो सहज चेहरा याद है। अमूमन पेंसिल की नोक टूट जाने में भी खूब फटकारने वाले पापा बड़ी शांत मुस्कान के साथ मुझे एक पेड़ के पास बैठा के बोले "यहीं रुकना मैं घर दूसरी स्कूली ड्रेस ले के आता हूँ"
बचपन की वो आंखें, पापा की आँखों का वो लाड नहीं समझ पायीं थीं। आज उस ललकते चेहरे को याद करके होठों में ख़ुशी बिखर जाती हैं। 

ओह! ख़याल भी कहाँ कहाँ भटक जाते हैं। आज इस बस्ती में शायद ऐसा परिवार नहीं रहता, आस पड़ोस के सारे बुजुर्ग गुजर गए हैं। अलाव के चारो तरफ बैठ कर किस्से कहानी कोई नहीं सुनाता। पहले की तरह मोटे पम्प के वो बोरिंग नहीं चलते जहाँ पूरी बस्ती बाल्टी ले के आ जाती थी। आज इन घरों में टीवी आ गयी है। ठण्ड से बचने के लिए  हीटर आ गए हैं। खाना बनाने के लिए गैस चूल्हे है, अब पड़ोस के लोग एक साथ कम ही बैठते हैं। पहले बस्ती में पुलिस आ जाये तो भीड़ लग जाती थी आज कल उनका रोज का आना जाना है। मेरी उम्र के लगभग सारे लड़के किसी न किसी आरोप में जेल जा चुके हैं।
रोजगार ख़त्म  हो गए हैं,  जंगल फिर से आबाद हो रहा है, इसबार अराजकता में इंसान भी शामिल हैं।

हाँ मगर… 

अँधेरा फिर से हारेगा, उजाले फिर से आयेंगे।  
उधर से फिर उदय होंगे, इधर को डूबने वाले। 

1 comment:

Shivam Shukla said...

"नियति श्रमिक को घमंड करने का मौका इतनी आसानी से कहाँ देती है?"

हिंदी भाषा की सुंदरता ही यही है कि पढ़ते ही दिल के तह तक जाती है। कोई भी बड़ी आसानी से लिखे भावों को जी जाता है। और यही किसी भी लेख की सफलता है। यह लेख भी उन्ही कुछ लिखे भावों की सफलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। लेख हमें हमारे बचपन की और धकेलता है। मेरे जीवन से बहुत मिलता जुलता सा लेख है।