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Showing posts from 2014

गाली का दर्शन

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"विश्व समुदाय के लिए कितना मुश्किल हो जाता है जब वो नेताओं के बारे में कुछ कहना चाहते हों और इस बहुमूल्य शब्दावली से वो महरूम रह जाएँ ! शुक्र है हम इस भाषा से लबरेज़ हैं !"
हुनर तो ऐसा है कि बग्घी हांकते वक्त उपयोग कि गयी शब्दावली से आप किस शहर में हैं ये जान सकतें हैं। और आदत ऐसी कि इस शहर का घोडा उस शहर की बग्घी न खींचेगा जब तक लगाम को ऐंठते हुए टाँगे वाला वहीँ की दो चार न बक दे। चने, घास और लगाम से ज्यादा अपनापन गालियों के स्वाद में होता है। गालियों को व्यर्थ ही बदनाम किया जाता है, ये तो परंपरा के धरोहर के अनुरूप लिख के रखनी चाहिए! इनके उपयोग की श्रेष्ठतम तरीके जानना हो तो किसी भी नुक्कड़ के चौधरियों के साथ दो चार चाय की चुस्की ले लीजिये। इन चौधरियों से अगर तेंदुलकर, आमिर या ओबामा जैसों की सीधी मुलाकात हो जाये तो इन सब को अपनी गलतियां  में पता चल जाए। अगर इनको वाकई अपनी कार्य दक्छाता फिक्र है तो उन्हें एक बार गलियों के  सूरमाओं से मिलना चाहिए। वो भी पूरे जमनी लहजे में, तभी मूल्यांकन की द्रिष्टी से कोई सफलता मिलेगी। फिर चाहे ये लोग अपने कौशल पे सुधार कर पाएं या नहीं, पद में ब…

Legal Crimes

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"If community leaders (etc.) exclaim that they're on the verge of extinction if they don't fight back, it becomes pointless who sponsors those wars. Or by what means money comes. Corruption becomes merely a legal complexity worth nothing" :- Jitendra Rajaram
Law alone cannot behold justice. Lack of evidences or morphed evidences can defer the judgment of any quantum. Often delayed judgement or diplomatic selection of time of pronouncing judgement destroys the hope. Social opinion towards any person shatters every laws and norms of State, the last call of social criminals. 
On what ground Lalu Yadav is out of jail? On what ground will Jayalalitha remain out of Jail? Why judicial systems took two decades to convict these politicians as guilty? Why Amit Shah is acquitted? Why Abu Salem is not pronounced guilty? Why Asharam's verdict is pending? Swami Dayanand Saraswati, Pragya Singh Thakur, Salman Khan are NOT sentenced? Why Anderson of Union Carbide died natural de…

Hamlet to Haider

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"Muslims are not minority in India, They're Second Majority. Azadi is not a solution to Kashmir, just revoke Article 370 & AFSPA at once" 

"No one of the serious cinema goers in India went to watch Haider for its being inspired by Hamlet. Everyone wanted to see the cinema maker's assessment of Kashmir Issue. Specially when the new regime of people's hope has taken over since quite a few months now. Active radical outfits there has left people of India either insulated or granted very little access to the people of Kashmir. All they get to know about them is through some newspaper or some unauthorized medias. Majority of these medias are skewed ill-motives. The complex pacts between J&K and Indian Government (since its accession in Indian Union in 1947AD) has made the matter only worse. Recent change of guard at Sultanate Delhi has raided hopes of resolving these disputes. No wonder why this cinema was most awaited. 
Yes if we go by the commitment of t…

दो टूक

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""जैसे गुस्ताखी मैं मैंने उनके मन को छु लिया हो, वो आँखें बंद कर के धीरे से बोली "हम्म्म तुम भी!""



"ऐसा शायराना  मैं कभी नहीं था, हाँ लिखता था बस यूँ हि… कभी किसी कापी के पीछे के पन्नो में या कोई मेल-बॉक्स में ड्राफ्ट बना के छोड़ दिया बस। किसी को कभी सुनाया नहीं, वैसे भी दोस्त अक्सर मेरा मजाक बनाये रहते हैं ऐसे ऊल जलूल अध गुथे शब्द देखेंगे तो टांग खिचाई दरार पैदा कर देगी। और वैसे भी जब से फेसबुक आया है हर कोई लिखता ही रहता है। कई बड़े लाजवाब लिखते है, उनके आगे तो मैं जग हसाई ही समेट पाउँगा बस। और फिर दुनिया को अब और साहित्य की जरुरत नहीं है, खास तौर से प्रेम विषय पर।

प्रेम पर लिखे साहित्यों ने गजब ढा दिया है,  जाने कैसे लिखतें होंगे वो अल्फ़ाज़-ए -हुनर... मानो सुबह की ओस को गजरे में पिरो कर प्रियसी के केशों में लपेट दिया हो। कुछ ऐसे की सुंदरता की उस कसौटी को कभी न छु पाने की टीस भी मेरे अंदर के कवि को दुलत्ती मार दे। क्या पता ये रुबाई, ये गजल.… शायद प्रेम बस साहित्य में ही मिलता है वरना देखा तो नहीं इनता सुन्दर कोई कभी।"
उसकी गोद लेटा उसके दुशाले से उसके…

Theology & Conflicts

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It is evident from all the books which support God or any kind of theology that Kings and Cox have used the religion theory to persuade commoners in their favor. The more I want to write about why religion is gambit the more I find it complex to explain to those it concerns most. I know hundreds of thousands of people who are not only convinced but are capable to prove that anything like God doesn't exist at all. I also know hundreds of thousands of people who will kill me if given the authority because I endorse atheism. 
Tonight I have gone through a long train of conversation with few victim of God thing. Because of this I am feeling intensely to write this article. I want to keep it simple so that it conveys my message to even those who are unspecialized in philosophy and theology. What is the problem with us is that we pretend smart and refuse to listen. The first quality of a stupidity is not listening. 
A term called 'Fear of Unknown' keeps people glued with this idea…

Faultlines

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Third Option of Third World Nation after exactly 100 years of World Wars


Drawing connections from 1914 to 2014
‘Rule of the people, by the people and for the people’ certainly is the most recent rhythm coined by Abraham Lincoln but the struggle for it is not new. People has been defeated umpteen times in the war to establish Republic. Exactly 100 years ago when world was actually very close to Swaraj (Self Rule), Imperialists knelled it mercilessly… 100 years later, the cry of self-rule is gaining acceleration again! This time in the most sought after Third World Nation i.e. India" : - By Jitendra Rajaram (Author)

"Any government of the world will never accept that ‘hand in glove’ Imperialists and Capitalists have waged war against people. Whenever war happened and wherever it happened every time capitalists have sponsored the it for imperialists. It's a bogie that WW1 triggered by the assassination of Austrian Prince. It was in fact turned out to be an opportunity to keep S…

अवतार

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"पता भी कैसे हो भला आखिर सत्ता के लालच की गाथा का सौर्य गान भर गया जा सकता है न धर्म का क्या गायन होगा? टी आर पि जैसी कोई चीज तो तब भी थी न?"
सोने की लंका जली ये तो सब जानते है, रोज जलती है... नया क्या है? लेकिन राम राज आया था इसके प्रमाण कहीं नहीं मिलते| गजब है विभीषण को लंका मिल गयी, सुग्रीव को किष्किन्धा और हनुमान को? अरे भाई सारे उतापे माफ़ जाओ ऐश करो... सीता मिली कसम खाई, तजि गयीं, फिर मिली लक्ष्मण रेखा में कैद हुईं फिर तजि फिर गयीं, फिर मिलीं मिली अग्नि परीक्षा हुई और फिर तजि गयीं और उत्तराधिकारी की लालच में फिर अश्वमेघ हुए! मगर कब तक... अरे भई, कुल देवी, सावित्री, लक्ष्मी बना तो दिया, नारी होकर अब क्या किरदार भला? भोग विलास के पाश में इन्द्र्पस्त जुवे में हार कर! अपने गुरुओं, परिजनों, पितामहों को छल कपट से मार कर! पांडव जीत गए महाभारत! फिर? वेदव्यास की स्याही खत्म! पता नहीं... कोई प्रमाण नहीं की धर्म स्थापित हुआ भी था की नहीं! पता भी कैसे हो भला आखिर सत्ता के लालच की गाथा का सौर्य गान भर गया जा सकता है न धर्म का क्या गायन होगा? टी आर पि जैसी कोई चीज तो तब भी थी न? प्रह्ल…

सिफ़र

एक 
जबतकमरहमकेअन्दरकाजख्मतजाहो, बसइतनाहीमेरेशान-ए-ख़मकातकाज़ाहो || जबभीमरूँबेरिवाजबेदस्तूरफ़नाहोजाऊं, यारोंकीमुहोब्बतसेयेदस्तूरलिहाजाहो|| केरखेंहोंफूलमहफूजसीनेमेंसलीकेसे, नमिलेकफ़न, नहोकब्रनकोईजनाजाहो||
दो 
यूँगुनगुनाहटबरसेकेहमतरबतरहोजाये, जिंदगीसिजदेपेहोऔरमौतबेअसरहोजाये|| हरशिकस्तहरमजबूरी कोमजबूरकरदें हम, इतनेसंगीनजुर्ममेंकैदयेजिगरहोजाये|| इतनीशिद्दतसेबुनेकिश्तीकातानाबना, केकुछलूटेलम्होंमेंउम्रबसरहोजाये|| होबसइतनीसीगुंजाईशइसनादाँदुनियामें, केवोपलकेंमूँदलेतोसिफ़र होजाये... <
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ज़मीन मेरी भी है

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ज़मीन मेरी भी हैहकीकत ये है की मेरी जान से ज्यादा आज वो लोहा कीमती है जो मेरी जमीन के नीचे मिलता है।जितेंद्र वर्मा"मै न समझ हूँ, गंवार हूँ, या अनपढ़ हूँ इस बात पर हँसा जा सकता है। आपकी हंसी से मेरे आत्मविश्वास पर चोट हो भी सकती है और हो सकता है की मै अपनी बात न भी रख पाऊं। पर आज मामला ये नहीं है, मामला ये है की अब आपको मेरी बात सुननी पड़ेगी। मुझे गलत या सही साबित करने के लिए आपको मुझसे सार्थक तर्क करना पड़ेगा। अब आप मुझे चिढ़ा कर या मुझसे मुह फेर कर नहीं जा सकते। मुझे बेचारा कह देने भर से आप न्यायसंगत नहीं हो जायेंगे… मेरा वाक्चातुर्य अब आपकी पेशानी में सल खींचे या नहीं पर मेरे सवाल आपकी पेशानी का राज तिलक फीका कर सकते है। इस लिए सावधान होकर सुने… 
ये ज़मीन मेरी है। इस लिए की मेरे पास सरकारी दस्तावेज नहीं है आप ये बात नहीं झुठला सकते कि मेरे सात पुस्ते यहीं दफन हैं। आपकी सरकार को जब इस जमीन की गर्भ में लोहा नहीं दिखा था तब से हम यहीं रहते हैं। ये जंगल हमसे टैक्स नहीं मांगते इस लिए कोई ऐसी रसीद नहीं है जो हमारे हक़ को आपके न्यायालय में साबित कर सके! और इस लिए ही हमारे हक़ की लड़ाई आपको बर्…

Religion & Politics

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"Politics has a limitation, it works with people having some resources shared with the society. Religion is the full version of power"

"Let’s start from the scratch! It is better to part ways then becoming the mole in the eye for each other. There is a world for all of us to live if not peacefully together then cautiously apart. 
My earned social media society has wrong expectations from me, For this reason my posts forces them to hate me for one reason when a while ago they loved me for many reasons.
While I am teacher in my much endorsed profession, my heart lies in reading and writing. In this scholarly progress I have constructed mechanism of grasping knowledge. As a scholar of science, I have intense desire of finding the logic from the source of it. I am not sold to bare imaginations! It is one reason I’ve never believed upon God. It all begins from here! In my fraternity a lot of people believes upon God. It naturally associates them with some religion. Right here …

My Version Election Review

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“The new Eye Candy prepared by Harvard & APPCO has demolished the Chocolate Boy of Italian Blood. Majority have chosen least worse among the lot that too as per their capacity of deciphering the worse”
Jitendra Rajaram


“I won’t settle with the mass’s verdict. I am fighting for my ideology. One election’s mandate will not defeat the torchbearer of thousands of years of struggle. I will not surrender to the power just because they marched over the Mainland capital once again. I am not scared of your roar; you better hunt and relinquish on my dead muscle.   
Mandate 2014 was an event management show in which so called arc rivals joined hands to nudge the polarization so that people can continue to believe that democracy exists. I am only counting the NOTA as the individually conscious decision of the people which has defied the tyrannical compulsion of limited choices of force opting one.
In assembly election of Rajasthan however NOTA was fairly more than 7% vote share in some constitue…