सिफ़र

एक 

जब तक मरहम के अन्दर का जख्म तजा हो, 
बस इतना ही मेरे शान--ख़म का तकाज़ा हो ||
जब भी मरूँ बे रिवाज बे दस्तूर फ़ना हो जाऊं,
यारों की मुहोब्बत से ये दस्तूर लिहाजा हो||
के रखें हों फूल महफूज सीने में सलीके से,
मिले कफ़न, हो कब्र कोई जनाजा हो||

दो 

यूँ गुनगुनाहट बरसे के हम तर बतर हो जाये,
जिंदगी सिजदे पे हो और मौत बेअसर हो जाये||
हर शिकस्त हर मजबूरी को मजबूर करदें हम,
इतने संगीन जुर्म में कैद ये जिगर हो जाये||
इतनी शिद्दत से बुने किश्ती का ताना बना,
के कुछ लूटे लम्हों  में उम्र बसर हो जाये||
हो बस इतनी सी गुंजाईश इस नादाँ दुनिया में,
के वो पलकें मूँद ले तो सिफ़र हो जाये...
और वो आँखें खोल दे तो ये सफ़र हो जाए||
  
तीन 

हो तो हो किसी की भी ये कायनात,
अब हमसे किसी का अहेतराम होगा||
हो कोई कंजर्फ़ हो, हातिम या  रसूख--खां,
अब किसी से कोई दुआ सलाम होगा||
मै तो सफ़र में हूँ सिफ़र से सिफ़र तक,
कोई सूब--मुल्क से मेरा नाम होगा||
हो फ़ना ये मजहब, काएदे ये अह्दो-रवाज,  
मेरे फैसलों  में अब तेरा फरमान होगा ||
जब जायेंगे दिल--जां से हंस के जायेंगे ,
इल्म्दारों को भी हमसा यूँ इत्मिनान होगा||

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