दो टूक

""जैसे गुस्ताखी मैं मैंने उनके मन को छु लिया हो, वो आँखें बंद कर के धीरे से बोली "हम्म्म तुम भी!""




"ऐसा शायराना  मैं कभी नहीं था, हाँ लिखता था बस यूँ हि… कभी किसी कापी के पीछे के पन्नो में या कोई मेल-बॉक्स में ड्राफ्ट बना के छोड़ दिया बस। किसी को कभी सुनाया नहीं, वैसे भी दोस्त अक्सर मेरा मजाक बनाये रहते हैं ऐसे ऊल जलूल अध गुथे शब्द देखेंगे तो टांग खिचाई दरार पैदा कर देगी। और वैसे भी जब से फेसबुक आया है हर कोई लिखता ही रहता है। कई बड़े लाजवाब लिखते है, उनके आगे तो मैं जग हसाई ही समेट पाउँगा बस। और फिर दुनिया को अब और साहित्य की जरुरत नहीं है, खास तौर से प्रेम विषय पर।

प्रेम पर लिखे साहित्यों ने गजब ढा दिया है,  जाने कैसे लिखतें होंगे वो अल्फ़ाज़-ए -हुनर... मानो सुबह की ओस को गजरे में पिरो कर प्रियसी के केशों में लपेट दिया हो। कुछ ऐसे की सुंदरता की उस कसौटी को कभी न छु पाने की टीस भी मेरे अंदर के कवि को दुलत्ती मार दे। क्या पता ये रुबाई, ये गजल.… शायद प्रेम बस साहित्य में ही मिलता है वरना देखा तो नहीं इनता सुन्दर कोई कभी।"

उसकी गोद लेटा उसके दुशाले से उसके मखमली गाल को सहलाते हुए मैं उसीके सवाल का जवाब दे रहा था! अपनी तारीफ में अतिशियोक्ति की शंका लिए उसने हौले धकेलते हुए कहा 
"हट! झूठे!!" 
उनका दुःशला मेरे चेहरे पे आ गिरा और मैंने यूँ ही अनरगल सा उनको इम्प्रेस करने के लिए बोल उठा 

फरेब को भी हिचकीयाँ आ जाए अगर, 
तेरे हुस्न को खुदाया गर वो निहार ले। 
जो रख दो मेरे लबों पे सुर्ख लब अपने, 
तो क़त्ल खुद ही कातिल को पुकार ले॥

जैसे गुस्ताखी मैं मैंने उनके मन को छू लिया हो, वो आँखें बंद कर के धीरे से बोली "हम्म्म तुम भी!"    
बरसो से अवसाद में डूबा मेरा मन अटूट खुशियों भरे इन पलों में भी करवट बदल लेता है। जैसे हर बात उलटी कही गयी हो। मसलन "तुम भी" जैसे प्रेम मैं लिप्त शब्दों का भी कोई दर्दनाक विलोम अर्थ भी होगा? पता नहीं पर दो टूक ऐसे जवाबों से मै आज भी सिहर उठता हूँ।

एक दशक पहले, जब ये और मैं एक ही स्कूल में पढ़ते थे। सवेरे की प्रार्थना में ये अक्सर मंच की खास पंग्ति में रहा करती थी। रेशमी जुल्फें कस के गुथी हुई होती थी, सर्दी में उनके लिबास के ऊपर लाल स्वेटर मेरे अहसाह को रोम रोम तक गर्म कर देता था। लेकिन आठवीं क्लास में भला कोई किसी लड़की से बात तो कर ले! पूरे स्कूल में हंगामा हो जाये। ऊपर से मैं? मैथ्स में अक्सर बेंच के ऊपर खड़े हुए लोगों मेरी जगह पक्की थी। इंग्लिश वाली मैडम ने मेरी बेइज्जती का वारंट ही निकाल रक्खा था। ऊपर से पापा का खौफ, २० मार्क्स के टेस्ट में १५ आ जाएँ तो धुलाई हो जाती थी, किसी लड़की वाला चक्कर उनको पता चला न तो दफन हुए समझो। और दोस्त! वो तो यही कहेंगे की औकात में रह। इसलिए सारी मुहोब्बत मैंने ख्यालों में ही भिगो रखा था या कोई नगमा पिरो लिया कभी बस। 

जो आओ अगली बार मेरे ख्वाबगाह में,  
जरा मेरे अरमानो के सफ्फे पलट लेना। 
हर गजल तेरे नूर की इफ़ाज़त होगी, 
हर नगमा तुझे पाने की इबादत होगी॥

उसकी मासूम खूबसूरती पूरे शहर में मश्हूर थी, हर कोई उसका नाम जान लेने की मियाद भरता था। एक रोज ट्रुथ एंड डेयर के एक खेल में दोस्तों ने मेरा ये राज जान लिया। बड़ी फजीहत हुई, मेरी औकात पे ताने कशे गए, उसकी जवानी के कसीदे पढ़े गए। क्लास में रहना मुहाल हो गया, उसको मेरे नाम से चिढ़ाया जाने लगा और मेरे सामने कुछ एथलेटिक चैंपियंस क्लासमेट उसके बारे में फूहड़ बातें भी करने लगे। मेरे डरे हुए, शर्माए हुए और गुस्से से भरे चेहरे पर उनकी सांस फटने तक वाली हंसी मुझे मार डालती थी। मैंने स्कूल जाना बंद कर दिया था, घर से निकलता पर कहीं और ही जाता था। हा लेकिन उसके बस स्टॉप से होते हुए, उसको देख लेना बस ही मेरी तसल्ली थी जो मेरी औकात बराबर लगती थी मुझको। एक दिन पापा ने घर पहुँचते ही पिटाई कर दी तब पता चला की स्कूल वाले घरवालों से संपर्क में रहते है। अगले दिन स्कूल जाना मजबूरी हो गयी थी, लेकिन ये क्या दोस्त बदल से गए थे, ताने और मजाक गायब.... ये गजब था, पढाई होने लगी एक दिन एक दोस्त ने नसीहत दी की मेरी वाली के पापा सरकारी अफसर है कब ट्रांसफर हो जाये कोई भरोसा नहीं इस लिए इजहार तो कर ही देना चाहिए! ख्याल गजब था लेकिन वो.… औकात? 
"अच्छा लेटर लिख दे!" उसने मेरे डर को ढाक दिया 

खूब रोयी थी उस दिन ये भी जिस दिन लेटर इनको स्कूल के पते पर मिला था.… चेहरा सुर्ख लाल। बेहोश हो गयी थी,  होश तो मुझे भी नहीं था टीचर्स ने इतने थप्पड़ मारे थे। जिसका भी क्लास थी सबने आठ दस रसीद किये। हिंदी की मैडम ने कुछ नया कर दिया, उन्होंने माफ़ी मांगने का फरमान जारी कर दिया.... डाट के कहा "चलो!" 
ये तब भी बस रोये जा रही थी.… खुद पर इतना गुस्सा आ रहा था की जाने क्या बस माफ़ी ही एक निकट सुलह लगी सो पास आया 'सा सा साए सॉरी!" 
बड़ी देर बाद उसने मेरी तरफ देखा और फफकते हुए कहा "तुम भी?" 

ये "तुम भी" शब्द उस वक्त बड़ा दर्दनाक था तब इसका उल्टा मैं नहीं सोंच पाया था! दो टूक तो नहीं था लेकिन इन शब्दों में सार था बहुत। 

आज मैं उनकी गोद में लेता हूँ ये दो टूक सा "तुम भी" अभी भी चुभ रहा है। एक दशक में मैं कोई दूसरा हो गया हूँ, अब मैं कविताएँ नहीं लिखता। अब सामाजिक आंदोलन, राजनीती, गाँव गाँव भटकना, हलफनामे, दलीले ये सब मेरा आज बन चुके हैं। वो तो प्यार वापस आ गया मैंने तो सब उम्मीदें उसी दिन खो दी थी इनके "तुम भी?" वाले रुआंसे सवाल के बाद। फेसबुक ने फिर से जलजला ला दिया। ऊपर से हाय रे किस्मत हम सालों से इसी एक ही शहर में थे! कभी मिले भी नहीं कहीं टकराये भी नहीं बस इस फेसबुक ने.… 

आज ये मेरी दीवानी हैं, मेरी कविताएँ इनको अपनी तस्वीर लगती हैं, एक दिन न मिलो तो खाना पीना सब बंद। और मिलो तो बस या ये हमारी गोद में या हम इनकी और कसम से इतना तो ग़ालिब ने भी नहीं पढ़ी होंगी अपनी लिखी… बस सुनते रहेंगी। हमारा भी अंदाज रवां हो जाता है.… आशिक मिजाजी भी हद्द है। ये बड़ी नौकरी करती हैं, बड़ा घर खरीद लिया है शहर में, एक कार भी क़िस्त है.… 
मैं एक मामूली टीचर हूँ, वकालत भी करता हूँ गरीबों के लिए.… जो गुजर बसर से बचता है व किसी की किताब राशन में लग जाता है.… छोटे भाई ने एक माकन खरीद रक्खा है यहाँ उसी के एक कमरे को गरीब खाना बना रक्खा है। उसमे भी जाने कितने लोग आते जाते रहते है.… 

धीरे धीरे हमारा प्यार दुनिया की गिरफ्त में कस्ने लगा.… शादी का ख्याल भी भुला चूका मैं आज राजी सा हो जाता हूँ। 
"घर पे क्या बोलोगे?" उनका ये सवाल और मेरे शायराना जवाब अब उतने रंगीन न रहे थे! 
"कह देंगे हम भी शहजादे हैं" मैं फिर टाल गया, उनकी और झुक के चूमने के लिए.… 
"हटो न! तुम भी!!  

उसने शादी के बहोत से सपने देख रक्खे हैं। हनीमून के भी, लहंगा ही लाखों में हैं.… "तुम भी!" काश ये शब्द तब से ही हमारी जिंदगी में न होता!! शायद आज मैं किसी मुकाम पे होता उनके लयक… पर इस दो टूक शब्द का उल्टा तो तब से ही नहीं पता था। 

शहर से दूर एक गाँव में नदी पर बाँध बनाने के खिलाफ संघर्ष जोर पकड़ रहा था, मेरा वह जाना जरुरी था.… ये वहां मुझसे मिलने आ जाती थी रोज। कभी चाउमिन, कभी फ्राइड राइस ले कर.… मेरे साथी हमारी दीवानगी पर फ़िदा हो जाते लेकिन उनके भूक हड़ताल और मेरी कागज पत्री के बीच इनका प्रेम-मिलाप एक अनकहे दर्द तो उकेर देता था.… 

"न आया करो!" मैं उनके हाथो से पराठे खा रहा था उनकी कार में बैठ कर.। 
"क्यों?" जिस हख से आज पूछा है काश!!! 
"यूँ हीं!" मैंने टाल दिया 
"तुम भी न!" उन्होंने एक और निवाला रख दिया होठों के बीच 
ये दौर चलता रहा, मेरी डॉक्ट्री की डिग्री भी पूरी हो गयी, उनके जिद पर एक कविता संग्रह भी प्रकाशित हो गयी.… संघर्ष जारी है, न्याय और बराबरी की लड़ाई में जरुरी सिपाही बन चूका हूँ लेकिन उनके परिवार के मुताबिक? 

इस छोटे जीवन काल में,  
इस काल के कपाल में,
क्या दांव चलूँ?
क्या वार करूँ? 
दूर छितिज उस पूरब में,
ये सवाल उगा इस जीवन में, 
इस ठौर रुकूँ?
या उस पार चलूँ?

आज फैसले की घडी आ पहुंची है... और शायद मौन फैसले हो चुके हैं। जीवन के संछिप्त से संछिप्त शरांश में भी शायद कुछ घड़ियों को कभी टला नहीं जा सकता। आज उस मौन फैसले को अलफ़ाज़ देना था!!! आज उस विलोम की बेहद तलाश है.… 

आज भी वो गजब कोहिनूर लग रही है.… बस मौन है.… मैंने रणभेरी के बुलावे से पहले का आलिंगन उसके कंधो में पसार दिया। 
आज रोने की बारी मेरी थी। सिसकती उसी की एक दशक पुरानी आवाज की तरह मैंने उसके कानो में कहा "मैं राजकुमारी को राजमहल न दे पाउँगा! मैं और तुम बस… मैं... तुम्हारे लायक नहीं हूँ।" 

वो सिसकते हुए लिपट गयी.… बहोत देर तक रोती  रही फिर सख्ती से कुछ पीछे हटी और जाना से पहले, पहली बार उसने अपनी युक्ति बदल ली जाते जाते वो बरसो पुराना सवाल ले गयी, वो विलोम!!


चलते हुए पलट कर बस इतना ही कहा "मैं भी!"