गाली का दर्शन

"विश्व समुदाय के लिए कितना मुश्किल हो जाता है जब वो नेताओं के बारे में कुछ कहना चाहते हों और इस बहुमूल्य शब्दावली से वो महरूम रह जाएँ ! शुक्र है हम इस भाषा से लबरेज़ हैं !"

हुनर तो ऐसा है कि बग्घी हांकते वक्त उपयोग कि गयी शब्दावली से आप किस शहर में हैं ये जान सकतें हैं। और आदत ऐसी कि इस शहर का घोडा उस शहर की बग्घी न खींचेगा जब तक लगाम को ऐंठते हुए टाँगे वाला वहीँ की दो चार न बक दे। चने, घास और लगाम से ज्यादा अपनापन गालियों के स्वाद में होता है। गालियों को व्यर्थ ही बदनाम किया जाता है, ये तो परंपरा के धरोहर के अनुरूप लिख के रखनी चाहिए! इनके उपयोग की श्रेष्ठतम तरीके जानना हो तो किसी भी नुक्कड़ के चौधरियों के साथ दो चार चाय की चुस्की ले लीजिये। इन चौधरियों से अगर तेंदुलकर, आमिर या ओबामा जैसों की सीधी मुलाकात हो जाये तो इन सब को अपनी गलतियां  में पता चल जाए। अगर इनको वाकई अपनी कार्य दक्छाता फिक्र है तो उन्हें एक बार गलियों के  सूरमाओं से मिलना चाहिए। वो भी पूरे जमनी लहजे में, तभी मूल्यांकन की द्रिष्टी से कोई सफलता मिलेगी। फिर चाहे ये लोग अपने कौशल पे सुधार कर पाएं या नहीं, पद में बने रहने की मजबूरी और अक्छमता की शर्मिनादि इनको देर सवेर औकात पर ले आएगी।
हकीकत ये है की गालियों के उपयोग को असभ्य करार देना दरअसल अक्छम लोगो की शाजिस है, ये लोग नाजायज ही अपने अपने पदों पर बने रहना चाहते हैं। वरना गाली के उपयोग से तो वो भी हो सकता है जो परमाणु बम भी नहीं कर सकता। जरा सोचिये रासायनिक हथियार के जिस फरेब के दम पे जार्ज बुश ने इराक़ नष्ट कर डाला, अगर उस जार्ज बुश को इंदौर के राजवाड़ा स्थित किसी पान दुकान के पास इन सूरमा पेलवानों से मिलवा दिया जाता तो? खाड़ी देशों के समस्त नागरिकों को यूँ इतना संघर्ष न पड़ता।
आप हंस के मेरी बात को टाल रहे हैं, देखिये समझने की कोशिश कीजिये, हाल ही में विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के पंचवर्षीय चुनाव में इसी तंत्र को अस्त्र बनाकर उपयोग किया गया था।  अब देखिये न बीते कुछ महीनों में राहुल गांधी को जितनी हिचकियाँ आयीं होंगी, मै सोच रहा था की अगर राहुल जरा भी संगीन हो कर चुनाव लड़ते तो हिचकियों से ही मर जाते। अब भला आपको क्या बताना कि निर्भया के नाम से लाखों मोमबत्तियों को ख़ाक करने वाली भारत की जनता ने प्रियंका गांधी को किस किस भावभंगिमा में सुभाषित किया था। और एक वो मफलर पहन के खांसने वाला नेता! उसको तो गाली के साथ साथ गाली के अधिकतम ब्याज का भुगतान भी करना पड़ा था। ये ब्याज का भुगतान अक्सर तब करना पड़ता है जब गाली मदिरा में मुग्ध हो चुकी हो। आज तो ये आलम है की सारा राष्ट्र मदिरामय हो चूका है! अब पहली जैसी मजबूरियां नहीं रहीं, आज गलियां संसद तक पहुंच गयी है। वो भी ऐसे भेष में कि अगर पहले पहचान लेते तो सब किये कराये पर पानी फिर जाता। धार्मिक किताबों के ज्ञान से लदी गाँव की अछूत महिला जो साध्वी बन चुकी थी उस पर ज्ञानी होने का तमगा देते। रटे जा सकने वाले सभी श्लोकों के ज्ञाता के अगर आप चरण ही धर लेते तो फिर गाली जा पाती। फिर न हो पाता गाली का संसद गमन! आज संसद में रामजादे हैं इस लिए गाली का अस्तित्व है।  वरना इतनी बहुमूल्य धरोहर इतनी सुरक्षित न हो पाती। बड़ा दर्दनाक था बीते चुनाव से पहले का वो दौर, जब गाली के उपयोग में न ल पाने की मजबूरी को एक परिवारवादी सत्ता ने कायम कर रक्खा था। अब तो बहुमत के रामजादों ने (ह) वालों को पाकिस्तान जाने को कह दिया है। गाली का वर्चस्व अब कायम हो के रहेगा, आप सब का कोटि कोटि धन्यवाद! क्या? अच्छा हाँ हाँ दो चार गाली ही बक देता हूँ, शालीनता कहाँ हजम होगी आपको। 
मेरे मन में तो यहाँ तक कुंठा भर जाती है की क्यों नहीं बैलट में भी गाली का यपयोग होना चाहिए? सोचिये! अपने वसुंधरा की ये परिपक्व कला अगर स्कॉटलैंड के विभाजन में उपयोग किये गए बैलट पर भी लिखी जाती तो? परिणाम भले ही सिर्फ पहली धुरी के साथ होते, लेकिन उसमे ये भी पता चल जाता की वो पहली धुरी के साथ क्यों हैं। पूरी भावभंगिमा से लिखा होता सत्ता के दलालों के लिए उपयुक्त सम्बोधन। विश्व समुदाय के लिए कितना मुश्किल हो जाता है न जब वो नेताओं के बारे में कुछ कहना चाहते हैं और ये बहुमूल्य शब्दावली से वो महरूम रहते हैं?
जरा सोचिये, अगर हिंदी साहित्य की पूज्य पटल पर जन्मे अब तक के सबसे धुरंधर साहित्यकार पूज्यनीय श्री कपिल शर्मा के रात्रि कालीन कार्यक्रम में अगर गाली के दर्शन का उपयोग होने लग जाए तो? हज़ारों ठहाकों की गिनती बढ़कर करोड़ों हो जाएगी! वैसे तो वव्यर्थ है, फिर भी करे देता हूँ। तब तो शर्मा जी शायद हिंदी साहित्य को सदी के सफलतम चरण पे पहुंचा देते। पता नहीं बिग बॉस के घर से आमोद-प्रमोद के गलियारों में ये गाली का दर्शन कब आजाद होगा खेल पायेगा। सच है, अगर सिनेमा और धरवाहिकी कला मंडलों में भी लोकतंत्र होता तो आज संसद की तरह 'गाली' जेठालाल गढ़ा के लिए भी उपलब्ध होती। 

1 comment:

vivek chandra kumar said...

Kash...ye aawaz un rajneta ke pas pahuch jaye Jo apne desh ko bechte chale ja the hain

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Draw knowledge & wisdom from history NOT information…

History is being rigged, information has been distorted and facts are tossed in flake. We must know how to draw wisdom from the knowledge...

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