तिरंगे के बीच का सबसे बेरंग कपड़ा

औपचारिकताओं की भीड़ में दिल की गहराई से कही गयी बातें घुम जातीं हैं| तकनिकी की इजाद इस आराम देही औपचारिकता के पैरों से कोई जन्मदिन, त्योहार या व्यापक घटना पर मार्मिक संवाद कुचल जाता है! 
और फिर... अपने शब्दों को अपने होंठों में दबाये मैं असामाजिक घोषित हो जाता हूँ! खैर समाजी लबादे से भारी हुए ये तंज़ अब मेरी राह नहीं बदल पायेंगे| आप मुझे मेरे 'मैं ' हो जाने पर स्वीकार करें अन्यथा अलविदा!! 

२६ जनवरी २०१५ को कई ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिनके लिए महज़ वाल पर RIP चिपका देने से या तिरंगा लगा देने से या फिर उन्माद में वाह वाह कराह देने भर से ही सामाजिक दाइत्व खत्म नहीं हो जायेगा। आज वैश्विक तानाशाही के बीचोबीच नकली पौधों की फुलवारी में मामूली ही सही लेकिन अतिव्यापक बीज की रोपाई करने वाले एक 'विचारों का किसान' मर गया है। खासकर तब जब बबूल और धतूरे की खेती का राष्ट्रवादी अभियान राजपथ पर केंचुली बदल रहा था। 
आज तिलस्मी जहाज से उतरे उस लोक के ईश्वर ने अलौकिक छटा बिखेर रक्खी थी। जिसके नविन वलित मैत्री के प्रकाश मुंज में दुश्मन के दुशमनो का भी आपस में दुश्मन हो जाना उस ईश्वर की रणभेरी को बुलंद कर रहा था। नयी सरकार की अगुआई में वर्तमान गणतंत्र दिवस का वार्षिकोत्सव दरअसल तीसरी दुनिया के नेता के रूप में भारत के पतन की तारिख थी। 
यकीन मानिये आप मुझे आतंकवादी की नजर से न देखने की भी कोशिश करें तो आप देखेंगे की आज मेरी वैचारिक अभिव्यक्ति का मुखर होना ही मेरे देशप्रेम का सबसे बड़ा सबूत है। आज मोमबत्ती लेकर राजपथ में बैठ जाना, जंतर मंतर पे देश्बक्ति कवितायें गाने या किसी चौराहे पर रजाई ओढ़ के धरने पर बैठ जाने से भी बड़ी अभिव्यक्ति का दिन था। आज भारत देश के नागरिक होने के नाते आर. के. लक्ष्मण के दिवंगत होने पर और गणराज्य की हत्या के प्रतिरोध में हम पुरुषों को भी भारत माँ की छाती में हाट पीट पीट कर चूड़ियाँ तोड़नी चाहिए थी। यकीन मानिये आज सच में तिरंगे के बीच का सबसे बेरंग कपड़ा फाड़ के तन में लपेटकर विधवा हो जाने का दिन था। जानते हो क्यों? क्यों की आज जिसकी हत्या हुई है, उसका परिचय मै नीचे लिखे देता हूँ, अपनी चींखों का ज्वार उठा देना मेरी सहानभूति के लिए!!! 

मृतक का परिचय 
"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढाने के लिए दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

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