Skip to main content

Posts

Showing posts from August, 2015

"फिर कबीर"

माँ, नाना, राणा और कबीर ने मन में अलख लगा दी.… मैंने उस व्हाटशाप्प ग्रुप का नाम रक्खा "फिर कबीर"! 
"ये व्हॉटशॉप बड़ा बेदर्द है। बचपन में अगर कभी सोडा, मंजन लेने के लिए माँ चौराहे को भेजती थी तो उस वक़्त के बड़े भैय्या लोग पान बीड़ी की दूकान पे एक दुसरे को गरियाते और ठहाका लगाते हुए मिलते थे। वो लोग कभी अख़बार में कुछ पढ़ के उस पर चर्चा भी करते थे। चर्चा हमेशा किसी न किसी को गरियाने या किसी के मजाक उड़ाने पर ही जा के खत्म होती थी। बारवीं पास कर के मैं जब इंदौर आ गया तो देखा के यहाँ के बड़े भैया लोग ऐसा कुछ नहीं करते। पान बीड़ी की दूकान में लोग ज्यादा देर नहीं रुकते हैं.… राजवाड़ा चौराहे की दूकान तो रात भर खुली रहती थी वंहा भी कोई अखबार पे या राजनीती पे या किसी विज्ञानं पे चर्चा नहीं करता था। कुछ दिनों में मैं भी रम गया, मैं भी लड़कियों की, जवानी की, प्रेम की बात करने लगा। फूहड़ता की हदें पार करने लगे। जिस लड़की से कालेज में सलीके से बात करते उसी के बारे में अनाप शनाप बकते और जोर जोर से हँसते। एक दिन यूँ ही किसी दोयम जुमले में हस्ते हस्ते मेरी नज़र शीशे में पड़ी। मैं ही था उस चित्र में.……