उनकी तरफ से

"कुशल बाल मनोविज्ञानी मित्र श्री तपन पंडित जी को सप्रेम् भेंट" - जितेन्द्र राजाराम वर्मा
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आप बच्चे को सिखाओ...
सुई में धागा डालना,
सा रे ग मा को रंगो का रूप देकर...
सरगम की किताब को रंगीन करना।

फूलों में बैठी तितली को ध्यान से देखना,
देखना उस परिवर्तन को...
जिसे प्रजनन कहते हैं।और
जिसके बारे में उससे कोई बात नहीं करता...

उसे बताओ...
की मिटटी में दौड़ना
और फर्श में दौड़ने में
क्या फर्क है।

उसके घुटनों को
छू कर समझाओ
की कौन सी चोट उसे मजबूत बनाएगी
और कौन सी कमज़ोर...

उससे पूछों की
कार के पहिये गोल क्यों होते हैं,
तो फिर रोटी सेंकने का तवा भी गोल क्यों होता है?
और दोनों ही गोलों में फर्क क्या है?
क्यूँ है ये फर्क?
इस फर्क को नापा कैसे जाता है?
गणित सिखाओ उसे
पढ़ाओ नहीं...

दुनिया को मत बताओ
कि आपके बच्चे को अंग्रेजी की
सभी कविताये आतीं हैं
या उसे मोबाइल
में सब कुछ पता है।

नहिं तो मैं आपको डांट दूंगा
फिर आप समझ पाओगे
बेइजज्जति
बच्चे और बड़े
एक सामान महसूस करते हैं...


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