जमीन से हैश-टैग


"महानगरों में, टीवी में और हैश-टैग की दुनिया में वो हकीकत की गंध भी नहीं है जो कड़ाके की ठण्ड में चुनावी गर्माहट से उपजे कोहरे ने जमीनी हवा में घोल राखी है| इतना घाना कोहरा है की भविष्य तो दूर वर्तमान को भाप पाना भी किसी सुर्वेक्षण के बस की बात नहीं है| " - जे आर वी

"वोट डालने के क्षण को याद करिए| लाइन में लगे रह कर इंतज़ार करना, अपनी पहचान कुछ कागजी टुकड़ों के दम पर साबित करना और नाखून में स्याही लगवाने वाली प्रक्रिया आदि को नहीं...! सिर्फ उन पलों को जब आप उस वोटिंग मशीन को तन्हाई में निहार रहे होते हैं| मैं आपके राजनीतिक रूप से सजग मन से कोई बैर नहीं रखता और न ही आपकी राजनीती से कोसो दूर रहने की समझदारी पर संदेह कर रहा हूँ| मैं तो सिर्फ उन दस बीस सेकेण्ड में पूरी हो जाने वाली घटना को आपके जहन में उकेरने की कोशिश कर रहा हूँ|

अब आप तवज्जो दीजिये इस बात पर की कुछ दिनों बाद आने वाले उन दस बीस सेकेंडों में आप क्या करेंगे...? इस बात का पूर्वानुमान लगाने वाली इन बड़ी बड़ी सांख्यकी की पद्धतियों को आप कितना कुशल मानेंगे? क्यूंकि आप इस ब्लॉग को पढ़ रहे हैं... आप उन विशेष नागरिक के दर्जे में आते हैं जिन्हें तकनिकी उपलब्ध है| वरना दुनिया के सबसे बड़े लोग तंत्र में आज २१विं सदी में भी ये वोटिंग मशीने गधों में लाद के दूर दराज के गाँवों में ले जाया जाता हैं... सटीक से सटीक वैज्ञानिक पोल सर्वे भी इन लोगो तक नहीं पहुँचते... तो फिर इनके आकडे भविष्य कैसे बाँछ लेते हैं?
दुनिया की सबसे मशहूर सर्वे कंपनी गैलप (Gallup) कहती है की तालब के पानी की जांच करने के लिए पूरे तालब के पानी की आवश्यकता नहीं हैं... कोई दस-बारह गिलास पानी तालाब के अलग-अलग हिस्सों से ले आओ और लेबोरेटरी में जांच कर लो| हलाकी पिछले कुछ चुनावों में तो Gallup जैसी धुरंधर कंपनिया भी फ़ैल हो चुकी हैं लेकिन एग्जिट पोल की उपभोगता में कोई कमी नहीं आयी है... उलट इसकी मांग बढाती ही जा रही है|

वैसे... समय की धारा में आगे क्या हो सकता है... के पूर्वानुमान लगाने का कौशल ही एक मात्र वो कौशल है जो हमें जमीन से जुड़े बांकी जानवरों से अलग करता हैं| भविष्य का ख्याल, भविष्य की चिंता और भविष्य का बंदोबस्त... बैंक से लेकर, स्कूल, कॉलेज और सरकार तक सब खुछ इस भविष्य को ही अलग अलग पैकेज में बेंच रहे हैं| झंडाबरदारी हो, डिग्री नुमा कागज हो, लम्बे चौड़े भाषण हो या फिर बंद किये जा सकने वाले वचन पत्र (रूपए)... सब के सब व्यापारिक उपयोग के लिए बनाया जाता है|

फ्रेंड्स-डे से लेकर वेलेनटाइन-डे तक एक युवक या युवती भविष्य के बारे जो कुछ भी कल्पना कर सकते हैं वो सब कुछ एक नेता चुनावी दौर से लेकर मतगणना तक काल्पन कर लेता है| ऐसे में अगर कोई भविष्य में क्या होगा उसका हिसाब कर के पहले दुकान लगा ले तो मुनाफ़ा क्यूँ नहीं होगा?

Gallup के गिलास वाले उदहारण पर वापिस चलते हैं... एक तालाब के पानी की जांच जंद गिलास पानी से तब तक सटीक हो सकती है जब पूरे तलब की स्थिति लगभग एक जैसी हो... लेकिन तब क्या होगा जब एक-एक मीटर में तलब का पानी रंग, गंध, मिलावट और संक्रमण में अलग-अलग तरह का हो जाए? या तलब और गिलास का रिश्ता भले जायज लगे लेकिन क्या महासागर और बाल्टी के बीच कोई अनुप्पत है? क्या कलकत्ता के तट से लिया गया एक ड्रम या एक बाल्टी पानी पूरे बंगाल की खाड़ी के पानी का सटीक अध्यन करा सकता हैं?

महानगरों में जो गजब की बहेस छिड़ी हुई है, टीवी पर क्या गजब-गजब के तथ्य पेश किये जा रहे हैं| आज पत्रकार हर नयी ब्रेकिंग न्यूज़ के साथ सीटों के आंकड़ों को पलट रहे हैं| 20वीं सदी के ख़त्म होते होते एक ऐसा दौर आया था जब युवा वर्ग नौकरी की उहापोह को जीवन धर्म मानकर सभी चाय-पान की गुमटियों से कोसो दूर चला गया था| पड़ोसी तो दूर खुद अपने बच्चों से भी हफ़्तों-हफ़्तों तक नहीं मिल पाता था तब के दशक में ये तालाब और गिलास वाली थ्योरी बिलकुल सटीक बैठती थी| लेकिन जब से दुनिया टीवी से घटकर मोबाइल स्क्रीन पर आ गयी है; गजब हो गया है| चाय-पान की चर्चाओं में भी एक शालीनता होती थी पर आज WhatsApp में सभी तरह की भड़ास निकली जा रही है| उन गुमटियों में कोई एडमिन नहीं होता था लेकिन इन मोबाइल चैट्स का तो ग्रुप एडमिन और उन ग्रुप एडमिन को खुराख भेजने वाली हैशटैग संस्थाएं तक ऐसी कतार बन गयी है की सबको गेराँव (लगाम) बाँध के हांकना आसान हो गया है| जब तालाब के एक एक इंच में इंजेक्शन से जहर घोला जा सकता है तो चंद गिलास भर पानी के सैंपल से पूरे तलब के पानी का मूल्यांकन कैसे संभव है?  

पिछले ३० दिनों में मैं भारत के बहुत बड़े हिस्से की यात्रा कर चूका हूँ| कोरबा, बिलासपुर, लखनऊ, कानपूर, मैनपुरी, फतेहपुर, ऊंचाहार, इलाहबाद, कटनी, भोपाल, इंदौर, झाँसी, दिल्ली, बडौदा, गोरखपुर, गोंडा, बस्ती, ऊंचाहार, रायबरेली और भी कई दूर दराज के गाँवों में मैंने बहोत से पढ़े-लिखे, व्यापारी, अनपढ़, जवान, बुजुर्ग, पुरुष, महिलाओं, नेताओं, अधिकारीयों और आम जनों से कई मुद्दों पर चर्चा की हैं... यात्रा के दौरान सह-यात्रियों की बातों को ख़ामोशी से सुना है| कई सर्वे और डाटा कलेक्शन के काम कर चूका हूँ| कई पत्रकारों से तर्क वितर्क किये हैं| और जान पाया हूँ की महानगरों में, टीवी में और हैश-टैग की दुनिया में वो हकीकत की गंध भी नहीं है जो कड़ाके की ठण्ड में चुनावी गर्माहट से उपजे कोहरे ने जमीनी हवा में घोल राखी है| इतना घाना कोहरा है की भविष्य तो दूर वर्तमान को भाप पाना भी किसी सुर्वेक्षण के बस की बात नहीं है| दावे से कह रहा हूँ की आगामी 5 राज्यों के चुनाव परिणाम हम सब को चौकाने वाले हैं| देश के इस सुदूर कोने में घुला हुआ मैं जमीन से बोल रहा हूँ... हे असमानों में बसे महानगरों के क्लाउड कंप्यूटिंग वाले हैश-टैग बोट्स मुझे सुन पा रहे हो न?  

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