Halli Labs Acquired by Google, too late but too smart too!


"The four month old Indian start-up help technology to march on in its timeless purpose"



Halli Labs belongs to Google now. This is the first acquisition Google has done in India ever. However, After Sundar Pichai’s elevation this news has come way too late but this acquisition indeed has a lot to cherish about. Here is an excerpt from the Halli Labs introduction paragraph “Halli Labs is applying modern ML (Machine Learning) techniques to solve old problems and domains to help technology to march on in its timeless purpose – i.e. giving superhuman powers to all of us humans in letting us do whatever we want to do better.”

Like any other internet giant, Google is also desperate to exploit Indian market. In its bid to play big, Google has arrived very late in India specially when Microsoft has a strong presence in Indian market since three decades. Acquisition of Halli Labs spells Google’s priority of improving its Indian Language translation. 500 Million people use Hindi and there are more than 17 other languages in India that caters to sizable market for an information carrier like Google. Halli Labs has not yet delivered any product in market but they were very promisingly working on Speed Recognition & Natural Language Processing. While the charisma of this acquisition is yet to be revealed, the floodgate has been opened up, let’s see what rolls down in Indian market from now on.

From invention fire, wheel, rice cultivation, paper, gunpowder, electricity, www and hashtags… Artificial Intelligence is set to place humanity to an exponentially new height. Halli Labs has one more thing to impress! The name of this youngest organization! “Halli” in Kannada is called village. We are so fascinated by American names and western verbatim that we seldom heed on how Amazon or almost all Japanese brand like Mitsubishi, Honda, Kodak or Chinese brands like Hawaii have successfully placed their home-grown names into the league of global brands. Strong roots will carry the load of tomorrows giant tree, foundation must be acknowledged. Those brands are all successful because they carry forward their cultural practices along with their names with highest possible ethical standard of business. When Halli Labs describe how modern Machine Learning Technique will solve old problems of human kind it evident that how their culture enrichens their future vision about the organization they have founded.

Well this does not at all a universal criterion of globally performing organization. It never limits the scope for any company to succeed but it considerably proves why some company succeeds and other could… not even when everything they’re doing is right. Simon Sinek in his lecture has described that the most important source of success for any organization is their ability and preference to communicate why they do what they are doing. Halli Labs is just four months old and now joins the Next Billion vision of Google. A lot of us may argue upon this interpretation of success but when we observe the bandwagon of Google Next Billion, organizations like DeepMind and inventions like AlphaGo… it ensures that for complex designs like Artificial Intelligence, Machine Learning and Augmented Reality… collaboration will out use competition and together we all will advance to future when humans will work with superhuman minds.

समीक्षा: - “मिनिस्ट्री ऑफ़ अट मोस्र्ट हैप्पीनेस” अरुंधती रॉय

इस किताब से मेरा वो विचार और शक्तिशाली हो जाता है “कि दुनिया भर के नरदेवता सिर्फ सत्तासीन रहने की कवायद में व्यस्त हैं|”


“मिस उदया जबीं, पांच माएं और छ पिताओं की पुत्री हमारी दुनिया की एक मात्र भौतिक उम्मीद है| मिस उदया जबीं, अत्यधिक खुशियों के मंत्रालय का एक मात्र अंतिम फल है|
वो मिस उदया जबीं, जिसका नाम बिना मिस कहे नहीं लिया जा सकता, जिसका सृजन उसकी माँ की कोख में उस वक़्त अंकुरित हुआ जब उसकी माँ का उसके छः पिताओं ने बलात्कार किया था| छः सरकारी पुलिस में से पता नहीं किसकी बेटी है मिस उदया जबीं! जो आज के खौफनाक अत्याचारों की बची ही हुई खंडहर है| उसका नाम, उसकी जिंदगी, उसकी सीख और दुनिया से उसकी पहचान वो पांच औरतें करायिंगी जो उसे माओं की तरह प्यार करती हैं| उनमे से दो मर चुकीं हैं, दो जीना नहीं चाहती और एक जो सबसे बुजुर्ग है, जो न औरत है और न आदमी| कश्मीर, दिल्ली, केरल, बस्तर और इंदौर में पली बढ़ी ये माएं जन्नत गेस्ट हाउस में मिस उदया जबीं का लालन पालन करेंगी|
जन्नत गेस्ट हाउस, दुनिया से परे एक सलतनत है जो हज़ार साल पुरानी दिल्ली के शाहजहानाबाद में कहीं गुमनाम सी जगह में है| ये सल्तानंत उस्ताद सरमद शाह के मकबरे के पास किसी पुराने कब्रिस्तान में स्थित है|
“मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस” नाम की ये किताब दुखों के सुपर बाजार में बिकने वाली सुखों के लेबल से लिपटी एक वस्तु है| जैसे दुनिया में मौत के बाद के मुनाफे को जीवन बिमा बता कर बेचा जाता है, वैसे ही ये किताब भी दुःख और विपदाओं की दास्तान को हैप्पीनेस ( अटमोस्ट हैप्पीनेस) के नाम से बेचती है|
इसमें बहुत से किरदार हैं, जिनमे मुझे अंजुम बेहद पसंद आई! वैसे तो अरुंधती रॉय का प्रशंशक होने के नाते मुझे तिलोत्तामा पसंद आनी चाहिए थी| लेकिन शायद मेरी पसंद इस बात का एक और उदहारण है की हकीकत की दुनिया में चित अक्सर चिंतन पर भरी पड़ जाता है|
अंजुम गुजरात के दंगो में मुस्लमान होने के बावजूद नहीं मरती| क्यूंकि हिजड़े को मारने से अपशगुन होता है| इसलिए दंगा परस्त अपशगुन के डर से उसे जिन्दा छोड़ देते हैं| खैर अपशगुन किसी को मार देने की व्यापक वजह हो न हो पसंद करने की वजह तो नहीं हो सकती... इसलिए मुझे अंजुम क्यों पसंद आई वो सुनिए!
अंजुम ने मुझे सिखाया है कि किन्नरों को भी उसी तरह प्यार, नफरत, पसंद या नापसंद किया जाना चाहिए जिस तरह हम बाकि के दो लिंग के मनुष्यों को करते है| किन्नरों को भी उसी मापदंड में परखा जाना चाहिए जिसमे हम स्त्री या पुरुषों को परखते हैं| इस कहानी में अंजुम का किरदार बिलकुल प्राकृतिक है| उसका किन्नर होना भी मुझे इस कहानी से बांधे रखता है| अंजुम, इस किताब को पढ़ने की मेरी पहली वजह है|
दूसरी वजह है, कहानी सुनाने की कला का अविष्कार| कल्पनाओं का बुरखा ओढ़े हकीकत के किस्से| एक कला जो हर पल ये साबित करती है की ये सब कुछ कोरी कल्पना है लेकिन फिर भी पाठक भाप लेता हकीकत को| जैसे किसी कविता का छंद-छंद घटित जीवन गाथाओं का वर्णन हो| ये किताब हकीकत की दुनिया के चंद किरदारों को नाम लिए बगैर उन्हें उनकी औकात के साथ पुकारती है| जैसे की गुजरात का लल्ला, अटक कर बोलने वाले कवी प्रधानमंत्री, नीली पगड़ी वाला रोबोट, दूध-मुहे बच्चे सा बोलने वाला गांधीवादी और आगरवाल की आत्मा वाला समाजवादी| इस किताब से मेरा वो विचार और शक्तिशाली हो जाता है “कि दुनिया भर के नरदेवता सिर्फ सत्तासीन रहने की कवायद में व्यस्त हैं|”
इस किताब की पढ़ने की मेरी तीसरी वजह हैं अमरीक सिंह, लवलीन सिंह और डीएसपी पिंकी जैसे किरदार| ये किरदार समझाते है की कैसे राष्ट्रवादी नामक पिंजरे में कैद किये गए लोग नरदेवताओं द्वारा लोभ की भट्टीयों में झोंक दिए जाते हैं| किस तरह कश्मीर वैश्विकृत राजनीती का तंदूर बन चूका है| वो तंदूर जिसमे इंसानों को भून के आतंकवादी बनाया जाता है और नमक मिर्च के साथ खाने की टेबल पर सजा दिया जाता है|
पूरी दुनिया में जो कुछ भी घट रहा है... इस सब के हिसाब से दुनिया में दुनिया से उम्मीद बनाए रखना सबसे कठिन काम है| फिर भी, इस किताब के लेखक ने एक ऐसी जगह ढूंढ निकाली है जहाँ खुशियाँ संभव है| एक ऐसी काल्पनिक दुनिया जो हर दो घटनाओ के बीचो-बीच पनप रही है| आज जब कलयुग सारे पाठ सतयुग से सीख रहा है, आज जब सबकुछ सिर्फ काले और सफ़ेद में या अच्छे और बुरे में या देवता और दैत्य या राष्ट्रवादी और आतंकवादी में बाँट दिया गया है... लेखक ने बीचो-बीच की एक नयी दुनिया खोज निकाली है| जैसे नरसिम्हा अवतार ने सतयुग में हिरन्यकश्यप को मारने के लिए बीचो-बीच का रास्ता चुना था, कलयुग में अरुंधती नें खुशियों को जीवंत करने के लिए बीच की एक दुनिया चुनी है| एक किन्नर, एक कब्रिस्तान, शहर के बीच एक खंडहर उस मकबरे के पास जिसे हिन्दू और मुस्लमान दोनों पूजते है| वो उस्ताद सरमद शाह जिसने ईश्वर के अस्तित्व को नकार दिया था और जिसे आज ईश्वर की तरह पूजा जाता है| वो माजर जो किसी मुस्लमान की है लेकिन गेरुए रंग से पुती हुई है...
इस किताब ने कुछ सवाल उठाये हैं! वो सवाल जिन्हें आज पूछना मतलब जान गवाना हैं| जिन सवालों का जवाब आज कोई नहीं दे सकता... अरुंधती ने उन सवालों को उठाया है| वो भी उस वक्त जब सवाल उठाने मात्र से चिचियती भीड़ वाली सरकार आपकी जुबान नोच लेगी, लेखिका ने उन सवालों को तमाचे की तरह जड़ दिया है|
इस किताब को पढ़ने की आखरी और सबसे कीमती वजह ये है की इस किताब ने मेरे बचपन से जवानी तक खड़े रहे एक सवाल का जवाब दे दिया... इस किताब ने मुझे बताया है की “चिड़िया जब बूढी हो जाती हैं तो मरने के लिए कहा जात है?