समीक्षा: - “मिनिस्ट्री ऑफ़ अट मोस्र्ट हैप्पीनेस” अरुंधती रॉय

इस किताब से मेरा वो विचार और शक्तिशाली हो जाता है “कि दुनिया भर के नरदेवता सिर्फ सत्तासीन रहने की कवायद में व्यस्त हैं|”


“मिस उदया जबीं, पांच माएं और छ पिताओं की पुत्री हमारी दुनिया की एक मात्र भौतिक उम्मीद है| मिस उदया जबीं, अत्यधिक खुशियों के मंत्रालय का एक मात्र अंतिम फल है|
वो मिस उदया जबीं, जिसका नाम बिना मिस कहे नहीं लिया जा सकता, जिसका सृजन उसकी माँ की कोख में उस वक़्त अंकुरित हुआ जब उसकी माँ का उसके छः पिताओं ने बलात्कार किया था| छः सरकारी पुलिस में से पता नहीं किसकी बेटी है मिस उदया जबीं! जो आज के खौफनाक अत्याचारों की बची ही हुई खंडहर है| उसका नाम, उसकी जिंदगी, उसकी सीख और दुनिया से उसकी पहचान वो पांच औरतें करायिंगी जो उसे माओं की तरह प्यार करती हैं| उनमे से दो मर चुकीं हैं, दो जीना नहीं चाहती और एक जो सबसे बुजुर्ग है, जो न औरत है और न आदमी| कश्मीर, दिल्ली, केरल, बस्तर और इंदौर में पली बढ़ी ये माएं जन्नत गेस्ट हाउस में मिस उदया जबीं का लालन पालन करेंगी|
जन्नत गेस्ट हाउस, दुनिया से परे एक सलतनत है जो हज़ार साल पुरानी दिल्ली के शाहजहानाबाद में कहीं गुमनाम सी जगह में है| ये सल्तानंत उस्ताद सरमद शाह के मकबरे के पास किसी पुराने कब्रिस्तान में स्थित है|
“मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस” नाम की ये किताब दुखों के सुपर बाजार में बिकने वाली सुखों के लेबल से लिपटी एक वस्तु है| जैसे दुनिया में मौत के बाद के मुनाफे को जीवन बिमा बता कर बेचा जाता है, वैसे ही ये किताब भी दुःख और विपदाओं की दास्तान को हैप्पीनेस ( अटमोस्ट हैप्पीनेस) के नाम से बेचती है|
इसमें बहुत से किरदार हैं, जिनमे मुझे अंजुम बेहद पसंद आई! वैसे तो अरुंधती रॉय का प्रशंशक होने के नाते मुझे तिलोत्तामा पसंद आनी चाहिए थी| लेकिन शायद मेरी पसंद इस बात का एक और उदहारण है की हकीकत की दुनिया में चित अक्सर चिंतन पर भरी पड़ जाता है|
अंजुम गुजरात के दंगो में मुस्लमान होने के बावजूद नहीं मरती| क्यूंकि हिजड़े को मारने से अपशगुन होता है| इसलिए दंगा परस्त अपशगुन के डर से उसे जिन्दा छोड़ देते हैं| खैर अपशगुन किसी को मार देने की व्यापक वजह हो न हो पसंद करने की वजह तो नहीं हो सकती... इसलिए मुझे अंजुम क्यों पसंद आई वो सुनिए!
अंजुम ने मुझे सिखाया है कि किन्नरों को भी उसी तरह प्यार, नफरत, पसंद या नापसंद किया जाना चाहिए जिस तरह हम बाकि के दो लिंग के मनुष्यों को करते है| किन्नरों को भी उसी मापदंड में परखा जाना चाहिए जिसमे हम स्त्री या पुरुषों को परखते हैं| इस कहानी में अंजुम का किरदार बिलकुल प्राकृतिक है| उसका किन्नर होना भी मुझे इस कहानी से बांधे रखता है| अंजुम, इस किताब को पढ़ने की मेरी पहली वजह है|
दूसरी वजह है, कहानी सुनाने की कला का अविष्कार| कल्पनाओं का बुरखा ओढ़े हकीकत के किस्से| एक कला जो हर पल ये साबित करती है की ये सब कुछ कोरी कल्पना है लेकिन फिर भी पाठक भाप लेता हकीकत को| जैसे किसी कविता का छंद-छंद घटित जीवन गाथाओं का वर्णन हो| ये किताब हकीकत की दुनिया के चंद किरदारों को नाम लिए बगैर उन्हें उनकी औकात के साथ पुकारती है| जैसे की गुजरात का लल्ला, अटक कर बोलने वाले कवी प्रधानमंत्री, नीली पगड़ी वाला रोबोट, दूध-मुहे बच्चे सा बोलने वाला गांधीवादी और आगरवाल की आत्मा वाला समाजवादी| इस किताब से मेरा वो विचार और शक्तिशाली हो जाता है “कि दुनिया भर के नरदेवता सिर्फ सत्तासीन रहने की कवायद में व्यस्त हैं|”
इस किताब की पढ़ने की मेरी तीसरी वजह हैं अमरीक सिंह, लवलीन सिंह और डीएसपी पिंकी जैसे किरदार| ये किरदार समझाते है की कैसे राष्ट्रवादी नामक पिंजरे में कैद किये गए लोग नरदेवताओं द्वारा लोभ की भट्टीयों में झोंक दिए जाते हैं| किस तरह कश्मीर वैश्विकृत राजनीती का तंदूर बन चूका है| वो तंदूर जिसमे इंसानों को भून के आतंकवादी बनाया जाता है और नमक मिर्च के साथ खाने की टेबल पर सजा दिया जाता है|
पूरी दुनिया में जो कुछ भी घट रहा है... इस सब के हिसाब से दुनिया में दुनिया से उम्मीद बनाए रखना सबसे कठिन काम है| फिर भी, इस किताब के लेखक ने एक ऐसी जगह ढूंढ निकाली है जहाँ खुशियाँ संभव है| एक ऐसी काल्पनिक दुनिया जो हर दो घटनाओ के बीचो-बीच पनप रही है| आज जब कलयुग सारे पाठ सतयुग से सीख रहा है, आज जब सबकुछ सिर्फ काले और सफ़ेद में या अच्छे और बुरे में या देवता और दैत्य या राष्ट्रवादी और आतंकवादी में बाँट दिया गया है... लेखक ने बीचो-बीच की एक नयी दुनिया खोज निकाली है| जैसे नरसिम्हा अवतार ने सतयुग में हिरन्यकश्यप को मारने के लिए बीचो-बीच का रास्ता चुना था, कलयुग में अरुंधती नें खुशियों को जीवंत करने के लिए बीच की एक दुनिया चुनी है| एक किन्नर, एक कब्रिस्तान, शहर के बीच एक खंडहर उस मकबरे के पास जिसे हिन्दू और मुस्लमान दोनों पूजते है| वो उस्ताद सरमद शाह जिसने ईश्वर के अस्तित्व को नकार दिया था और जिसे आज ईश्वर की तरह पूजा जाता है| वो माजर जो किसी मुस्लमान की है लेकिन गेरुए रंग से पुती हुई है...
इस किताब ने कुछ सवाल उठाये हैं! वो सवाल जिन्हें आज पूछना मतलब जान गवाना हैं| जिन सवालों का जवाब आज कोई नहीं दे सकता... अरुंधती ने उन सवालों को उठाया है| वो भी उस वक्त जब सवाल उठाने मात्र से चिचियती भीड़ वाली सरकार आपकी जुबान नोच लेगी, लेखिका ने उन सवालों को तमाचे की तरह जड़ दिया है|
इस किताब को पढ़ने की आखरी और सबसे कीमती वजह ये है की इस किताब ने मेरे बचपन से जवानी तक खड़े रहे एक सवाल का जवाब दे दिया... इस किताब ने मुझे बताया है की “चिड़िया जब बूढी हो जाती हैं तो मरने के लिए कहा जात है?

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