पहले अवलोकन करें, फिर आलोक चुने

“आलोक भाई के 28 वर्षों का संघर्ष मुझे दक्षिण अफ्रीका के 28 वर्षों तक जेल में रहने के बाद राष्ट्रपति बने श्री नेल्सन मंडेला की याद दिलाता है|

जे. राजाराम

“आज से पहले मैंने संघर्ष को बस किताबों में पढ़ा था! जब गाँधी, आंबेडकर, भगत या जय प्रकाश की जीवनी पढता तो ये यकीन कर लेता की आज के दौर में इतना संघर्ष करने वाला कोई है ही नहीं| किसी समाज, देश या गाँव के लिए लड़ने वाले सब इतिहास बन चुके हैं|
संघर्षशील नेताओं की जीवनी मुझे हमेशा ही प्रभावित करती रहीं हैं| खासकर आत्म कथाएं, क्यूंकि आत्मगाथाएँ हमेशा प्राथमिक संस्करण होती हैं| लेकिन हर जीवनी को पढने के बाद बस एक ही मायूसी होती थी, की आज कल ऐसे लोग नहीं होते... आज कल किसी को किसी और का दर्द महसूस नहीं होता| इस बाजार-युग में सब कुछ नफे-नुकसान से तय होता है| आजकल इंसाफ, हक़, बराबरी की बात बेमानी है|
जैसे देखा वैसा सीखा... बाजार और व्यापर के बीच अपने हुनर की बोली लगाते-लगाते एक रोज मेरी मुलाकात आलोक अग्रवाल से हुई| जब मैं आलोक से पहली बार मिला था, तो मुझे लगा ये विनम्र और शालीन स्वाभाव का पढ़ा-लिखा इंसान राजनीती में क्या कर रहा है? नयी-नयी पौध जैसी एक राजनीतिक पार्टी को अपने प्रान्त मध्यप्रदेश में शाशन तक लाने का संघर्ष कर रहे आलोक... मुझे बाजारवादी-समाज के बहार के इंसान लग रहे थे|
न कुरता सफ़ेद था, न कोई महंगी घड़ी पहने हुए थे, न ही कोई तड़क-भड़क! गंभीर मुस्कान लिए आलोक मध्यप्रदेश की दुर्दशा के आंकड़े ऐसे बता रहे थे जैसे दुनिया-भर की जांच एजेंसियों ने इनके कान में सभी आंकड़े कह दिए हों! मेरे तजुर्बे से तो कोई नेता इतनी तालीम से बात ही नहीं करता!
आलोक जी से मुलाक़ात के बाद उनके ऑफिस के लोगों से तफ्तीश की तो पता चला ये 28 साल पहले आई.आई.टी कानपुर से इंजिनियर पास हैं| सुन के बड़ा घमंड आया, मध्यप्रदेश की राजनीती में इतना पढ़ा-लिखा नेता? फिर तो विदेशी कमाई का धन भी होगा? पता चला की इंजिनयरिंग के बाद से ही आलोक जनता और पर्यावरण की सेवा में लग गए थे, कभी कोई धन संचय किया ही नहीं|
मेरे विचार में इस सदी में धन के बिना कुछ भी संभव नहीं है... लेकिन जैसे-जैसे आलको भाई को जानने का मौका मिलता गया, वैसे-वैसे मेरा ये मिथ टूटता गया! नर्मदा बचाओ आन्दोलन के अपने 24 वर्षों के संघर्ष में आलोक भाई ने नर्मदा घाटी में हजारों साल से रचे-बसे लोगों के लिए जो लड़ाई लड़ी, उसकी एक एक दास्तान में मुझे वो संगर्ष नजर आया जो मैंने महापुरषों की आत्म-कथाओं में पढ़ा था|
आलोक भाई के जीवन परिचय ने मेरा दूसरा मिथ भी तोड़ दिया! ये मिथ की “आज कल संघर्ष शील लोग नहीं मिलते” भी जाता रहा| नर्मदा घाटी में बेघर और बर्बाद हुए हजारों हजार लोगों को तंत्र के जबड़े से आजाद कराने वाले आलोक ने भूख से बिलखते हुए अन्नदाताओं और उनके बच्चों के लिए अपने संघर्ष को राजनीतिक पटल तक ले आये| क्यूँ?
तंत्र की निष्ठुरता और मक्कारी को तिल-तिल समझने वाले नर्मदा-पुत्र कहते हैं की पूरी कायनात के मानव समुदाय का भविष्य राजनीती से ही तय होता है| तंत्र की लगाम को हाथ में लिए बिना विस्थापित, किसान, युवाओं, यतीमों, विधवाओं, बुजुर्गों और बेरोजगारों के किसी भी समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता| चार वर्षों के राजनीतिक संघर्षों में जल-सत्याग्रह से जेल तक और 51 जिलों से 6 दिनों के अनशन तक, आलोक अग्रवाल... ने मौजूदा सरकार की जड़ें ज़र-ज़र कर डाली हैं|
संविधान पर यकीन, गांधी वादी जीवन शैली और ओशो-मयी विचार से लबरेज आलोक जी ने प्रदेश शाशन का गहन अध्यन किया है| इन्होने, पिछले तीन पंचवर्षीय सत्रों के दौरान विधान-सभा में हुए प्रत्येक सत्र की कार्यवाही के दस्तावेजों को, बड़ी बारीखी से पढ़ा है| प्रदेश शाशन की कुरीतियों का कच्चा चिट्टा लिए, आलोक ने, एक-एक संभाग में चल रही लूट का पूरे सबूतों के साथ परदाफाश किया है|
आलोक भाई के 28 वर्षों का संघर्ष मुझे दक्षिण अफ्रीका के 28 वर्षों तक जेल में रहे, नेल्सन मंडेला की याद दिलाता है| प्रदेश वासियों, ये सुनहरा मौका है, की जैसे भूखमरी और बीमारी से सने हुए साउथ अफ्रीका को माड़ीबा नेल्सन मंडेला ने एक सुनहरे सूरज की रौशनी में चमकने वाले देश के रूप में तब्दील किया था... आज वैसा ही एक सुनहरा मौका हमारे हिस्से में भी आया है| आओ इसबार अपनी सरकार चुने, आलोक चुने|  
“हर पेट अन्न,
हर घर नल,
हर खेत जल
के लिए
निश्चय करें
आलोक चुने!

सस्ती बिजली,
हर गाँव, हर शहर
रहने को घर,
हर हाथ हुनर,
आसान डगर
के लिए
संबल बने
आलोक चुने!

हर बच्चे की पढाई
हर युवा की कमाई
फसलों की सिचाई
अच्छे बीज की बुवाई
हिसाब की पाई-पाई
मध्यप्रदेश की भलाई
के लिए
संकल्प करें
आलोक चुने!”

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