अख़बार विचारों के हत्यारे बन गये हैं


"अखबारों ने लोकतांत्रिक चुनावों को ब्रांड मैनेजमेंट का बाजार बना डाला है।"




"मूडीज ने पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की रेटिंग कम कर के नेगेटिव कर दी है।" अगर ये खबर आप एक पाकिस्तानी होने की हैसियत से हर अखबारों के सबसे मुख्य हेडलाइंस में पढ़ेंगे तो आपका मत क्या बनेगा? आप सत्ताधारी दल के विरोध में चले जायँगे और किसी नए उभर रहे दल को आजमाने का विचार छोड़ देंगे। है न? और फिर आप उसे वोट करेंगे जिस ने अखबारों को इश्तेहारों के बदले मोटी रकम दी है। जो दल चापलूसी को वफादारी और लालच को धर्म का मार्का ठोंक के खुले आम बाजारों में बेच रहा है।
यही ख़बर अगर चुनाव के तुरंत बाद आई होती? तो शायद आप की ऊर्जा सुधारवादी, अर्थ को मूल तक ले जाने की कोशिश या सरकार तक अपनी चिंता पहुचाने के लिए ख़र्च होती।
या अगर ये ख़बर दूसरे ये अर्थ संकलित पन्ने में होती तो भी आपकी ऊर्जा सकारत्मक परिवर्तन का विचार करने में होती।
खैर, अगर ये अखबार नहीं होते, तो आप अपने आपको पाकिस्तानी महसूस करने में इतने असहज न होते। जितनी सहजता से आप अपने आपको अमरीकी, नेपाली या जापानी महसूस करते उतनी ही सहजता से आप पाकिस्तानि या फिलिस्तीनी या इराकी भी होने की कल्पना कर लेते। लेकिन गिरिराज और साध्वी जैसे दो कौड़ी के इंसानों के निजी विचार जब अखबारों की सुर्खियां बन जाएंगी तो आप और हम जैसे लोगों की सोचने की क्षमता ग़र्क तक गिर ही जाएगी।
अगर अख़बार नहीं होते तो राम मंदिर बन गया होता। इन अखबारों ने ही कलकत्ता और बनारस में टूट कर गिरे पुल को अलग-अलग रंग से पेश किया है। आखबरों के मुताबिक कलकत्ता के पुल टूटने से मरे हुए लोगों का खून हरा था और बनारस के टूटे पुल में दबी लाशों का खून भगवे रंग का था। अखबारों ने ही कश्मीर में चल रही गोलियाँ और पत्थरों के बीच बराबरी का युध्द छेड़ दिया है। इन अखबारों ने आपको ये समझा दिया है कि पत्थर बनाम गोली का युध्द भी कौरव बनाम पांडवों जितना जटिल, द्वपक्षीय और धर्म शेष युद्ध है।
अखबारों ने लोकतांत्रिक चुनावों को ब्रांड मैनेजमेंट का बाजार बना डाला है।
अगर आपके विचार जिंदा होते, तो आप सुदूर मरुस्थल में भटके हुए ऊंट की तरह चुनावी विकल्प तलाश कर रहे होते। और अगर आप विकल्प की तलाश में होते, तो ये भयानक बड़े बड़े विज्ञापन आपको लालहित नहीं करते। मरुस्थल की प्यास के लिए बिसलेरी का इस्तेहार बे माने होता है। जब भयानक प्यास लगी हो और आप बेतरतीब पानी तलाश कर रहें हो, उस वक़्त कोई अखबार आपको पानी साफ करने की मशीन का इस्तेहार दिखायेगा तो आप कैसे महसूस करेंगे?
मैं, मध्यप्रदेश का निवासी हूँ। यहाँ बेरोजगारी चरम पर है। बेरोजगार युवक रोज अपनी ऊर्जा नशा, जुवां और चोरी में ख़र्च करते हैं। यहाँ बलात्कार कर जिंदा जला देना दो जातियों की आपसी लड़ाई का बदला लेने जितना मामूली अपराध है। यहां के अखबार किसान की आत्महत्या को पुरुषार्थ की कमी बताते हैं। यहाँ के अखबार हमे बीजेपी और काँग्रेस का मैला ढोने वाला मजदूर समझते हैं।
लेकिन इसबार रेगिस्तान धधक रहा है, प्यास ने कंठ में आग लगा दी है इस बार बिसलेरी का इस्तेहार नहीं कुंवे का पानी ही चाहिए। इस बार ये अख़बार मुझे अंधा नहीं कर पाएंगे। इसबार... मैं विकल्प की तलाश में हूँ। इस बार मेरा वोट वो ही ले जाएगा जो स्वास्थ, शिक्षा और रोजगार का असली रोडमैप लेकर जनता के सामने आएगा। इस बार इस्तेहार नही, घोषणापत्र पढ़ा जाएगा।

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