बलात्कार रोकने के लिए मेरा प्रयास क्या होना चाहिए- दूसरा अंक


 

“यस्मिन् जीवति जीवन्ति बहव: स तु जीवति” 

पंचतंत्र का उपदेश है की “यदि व्यक्ति का जीवन और व्यक्तियों का जीवन संवारता है तभी वह व्यक्ति सच में जीवित है” क्या हमारे पुरखों का दिया ये अलौकिक ज्ञान आज कहीं भी चरितार्थ होता दिख रहा है? अगर नहीं तो हो रहे बलात्कार और हिंसा के हम भी भागीदार है|


“टीवी खबरों में, अख़बारों में, सोशल मीडिया में और आपसी लफ्फाजी में दुनिया के क्रूरतम होते जाने की निंदा कर देने भर से हमारे बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं होने वाला| इस क्रूरता के खात्मे के लिए हमें अपनी न्यूनतम और अधिकतम योगदान को तय करना होगा| और तय किये हुए कार्य को करना भी होगा| पिछले लेख (यहाँ पढ़ें) में मैंने न्यूनतम प्रतिबद्धता की बात की थी| उस लेख पर सवाल खड़े हुए कि कैसे मात्र गाली नहीं देने से बलात्कार रुक जायेगा? गाली के उन्मूलन मात्र से बलात्कार कम हो जायेंगे, ऐसा नहीं है| लेकिन ये बलात्कार को रोकने के लिए सबसे मौलिक और जरुरी कदम है| सच है की एक पत्थर मार देने से तिलस्म नहीं टूटेगा लेकिन जबतक पत्थर नहीं मरेंगे तबतक तो बिलकुल नहीं टूटेगा|
बलात्कार के विरुद्ध क्या किया जाना चाहिए के अपने विचार की अगली खेप में... मैं कारण और निवारण की तरफ थोड़ी गहराई से चर्चा चाहता हूँ| लेकिन पहले आपे इस लेखे की पहली कड़ी के खेप की मांग पूरा करने का निश्चय करें| आप पहले ये निश्चय कर लें की आज से आप हंसी मजाक या क्रोध में भी कभी गाली का उपयोग नहीं करेंगे| ऐसा करने मात्र से आप इस तरह की हिंसा के उन्मूलन के लिए सजग हो जाते हैं, और यही हमारे समर की पहली रणभेरी है|  
खुद की विफलताओं का दोष किसी और पर मढना ज्यादातर अपराध की बुनियाद है| लगातार मिल रहीं विफलताओं में स्वयं के दोषी होने के बावजूद भी किसी अन्य को दोषी मानने वाली भावना ही अपराध को जन्म देती है| इन अपराधों में बलात्कार की सम्भावना सबसे ज्यादा है| क्यूंकि बलात्कार का अपराधबोध हत्या और चोरी जैसे अपराधों से कम है| डकैती, फिरौती और खुले आम मार-पीट करने की अपेक्षा बलात्कार करने के लिए ज्यादा हिम्मतवाला होने की जरुरत भी नहीं होती इसके उअत इस अपराध में कायरता ही उपयोगी है|
पांडवों से युद्ध करने के बजाये द्रौपदी का चीर हरण करना ज्यादा आसान था| पांडवों को घायल करने से कहीं ज्यादा दर्दनाक उनकी स्त्री को लज्जित करना था| इसलिए द्रौपदी का बलात्कार हुआ था| बलात्कार सिर्फ शारीरिक भूख के लिए नहीं होता, बल्कि ज्यादातर तो शारीरिक भूख के लिए तो बिलकुल भी नहीं होता| बलात्कार बदले की भावना से होता है| बदला किससे? अभ्युक्त महिला से? जवाब है हाँ भी और नहीं भी|
द्रोपदी का चीर-हरण वासना से ग्रसित पुरुषों ने नहीं किया था| सत्ता की लालसा में औरत को दांव पे लगाना भी बलात्कार है| द्रौपदी का बलात्कार हस्तिनापुर के एक एक पुरुष ने किया था| कौरवों ने भी पांडवों ने भी और सत्तासीन वृद्धजनो ने भी| इसीतरह, आज चार साल और नौ साल की बच्चियों के साथ हो रही नितांत निर्दयी हिंसा भी आज जीवित एक-एक पुरुष कर रहा है|
हवस बलात्कार नहीं करती, हवस से पांडू की हत्या हुई थी, माद्री या कुंती का नहीं! बलात्कार 90% हिंसा है और 10% वासना, इसलिए बलात्कार को शारीरिक भूख के कोण से परखना ही बंद होना चाहीये|
दो बातें, पहली की जुबानी गाली देना और दी गयी गाली को सच में कर देना दोनों ही बलात्कार है| दूसरा, मैदान में हारे हुए लोग बदला लेने जैसी कायराना हरकत के लिए हमारे घर में सेंध लगाते हैं| इसलिए सबसे मौलिक जिम्मेदारी तो ये है की आप गाली का इस्तेमाल रोक दें| और अधिकतम जिम्मेदारी ये है की औरत को घर की इज्जत का प्रतीक मानना बंद कर दें|
जबतक मेरे से बदला लेने वाला इंसान मेरी पत्नी, बहेन या बेटी को अपने निशाने पे रक्खेगा, तब तक बलात्कार जैसे कुकरम से ये समाज बजबजाता रहेगा| इसलिए, ये मेरी जिम्मेदारी है की मेरे से दुश्मनी रखने वाले भी और दोस्ती रखने वाले भी मुझे और मेरी पत्नी को, मेरी बेटी को और मेरी बहन को अलग अलग और स्वतंत्र इंसान मान के व्यवहार करें|
मेरी जेब से 100 लूटना और मेरी पत्नी के जेब से 100 रूपए लूटना दोनों अलग और स्वतंत्र अपराध हैं| और मुझे जानने वाले अगर ऐसा नहीं मानते हैं तो मेरी पत्नी के बलात्कार का प्रथम जिम्मेदार मैं हूँ, दूसरा जिम्मेदार समाज है और आखिरी जिम्मेदार है इसका दुस्साहस करने वाला|
पहली नसीहत की गाली का उपयोग बंद कीजिये, दूसरी नसीहत महिलाओं को स्वतंत्र इंसान का दर्जा दें उन्हें अपनी बपौती मानना बंद करे|
अगला सवाल, असीफ़ा के सन्दर्भ में तो बदले की भावना वाला प्रसंग समझ में आता है लेकिन मंदसौर, निर्भया, सतना, बंगलौर में हुए बलात्कारों में तो कोई बदले की भावना नजर नहीं आती?
जवाब है की आती है.... यहाँ भी बदले की भावना ही है| कैसे, ये विचार में अगली कड़ी में रखता हूँ|

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