जाने क्या क्या


"ये अचानक बढ़ी कौतुहल का ग़ुबार भर है, कविता कह देना बड़ी बात होगी, पेश है आपके नज़रो-क़रम के लिए "

कुछ मीठा मीठा छूट गया,
कुछ कड़वा कड़वा साथ रहा। 

उसके आने जाने तक का,
जाने क्या क्या याद रहा।

फूल, किताबें, मंदिर ओटलें,
वो गली गलीचे गुजर गये।

भीड़ भाड़ कि धक्का मुक्की,
में ये शहर बड़ा आबाद रहा।

सायकल, गच्छी, सीठी, घंटी,
छुप छुप के संवाद किये।

अब आँखों की अठखेली का,
न वो हुनर रहा न उन्माद रहा।

कुछ मीठा मीठा छूट गया,
कुछ कड़वा कड़वा साथ रहा। 

उसके आने जाने तक का,
जाने क्या क्या याद रहा।

- जितेंद्र राजाराम



1 comment:

Unknown said...

अब ना येसी कविताएँ रहीं, और ना येसा उल्लास रहा.
कुछ मीठा मीठा छूट गया, कुछ कड़वा कड़वा याद रहा.

बहुत खूब जनाब शुक्रिया.
बहुत ही सुंदर कविता है.
कुछ मीठी, कड़वी यादें ताजा कर गयी.