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क्यों जरूरी है, संविधान की रक्षा?



हमारे बाद हमारा किया हुआ क्या रह जायेगा? आज क्या खायेंगे? कैसा घर खरीदूं? कहां इन्वेस्ट करूं जैसे प्रश्न हमारे होश में कितना गूंजते हैं। हमसे पहले आई और गई लाखों पीढ़ियों ने भी ऐसे ही सवालों में जिंदगी गुजारी होगी, लेकिन उनका क्या हुआ?

इस दुनिया में चार तरह के लोग पाए जाते हैं। एक जिनके जीते भी उन्हें कोई याद नहीं रखता, एक जिनके मरने से पहले ही लोग उन्हें भूल जाते हैं। तीसरे वो जिनके मरने के बाद भी दुनिया उन्हे याद रखती है, सलाम करती है। लेकिन अंततः इन तीनों ही लोगों को अधिकतर दुनिया भूल जाती है। कितने लोग एनस्टाइन को जानते होंगे? हिटलर को? कितने लोग जानते होंगे? यही नियम है, जो लोग मर जाते हैं, भुला दिए जाते हैं। लेकिन एक चौथी किस्म भी है, उन लोगों की जिनको कोई शायद ही जनता हो पर उनके बनाए को आज तक सहेजे हुए हैं। ऐसे लोग जो जीवन में कोई एक काम इतना गजब कर जाते हैं कि हमारी चेतना चिरंजीवी हो जाती है। वो मिट जाते हैं बस रह जाती हैं तो उनके बनाए अहद, उनके खयाल, उनके आईडियाज। शून्य रह जाता है, शून्य खोजने वाले बिसार दिए जाते हैं। पहिया चल रहा है पहिए के अविष्कारक चले गए। जहाज उड़ रहे हैं, जहाज के निर्माता जा चुके हैं।

आज संविधान दिवस के अवसर पर मैं इन चौथे किस्म के लोगों का इस्तकबाल करना चाहता हूं। ये बिरले लोग ही हमारी डोर हैं। मैं अहवाहन करता हूं, की विचारों के उपासक बने, विचारों के रक्षक बने। इस संघर्ष में यदि ये बिसर भी जाए कि ये किसके विचार थे और उम्दा होगा। क्योंकि जैसे ही हम किसी विचार को उसके उद्गामकर्ता से अलग करते हैं हम उस विचार को अमर कर देते हैं। अगर विचार और विचारक को अलग नहीं करेंगे तो वो विचार किसी नाम, जाती, लिंग, नागरिकता, धर्म आदि की पहचान से बनी बैसाखी में लचर चलते चलते मार जायेगा।  भूल जाइए, भारत का संविधान किसने लिखा है, ऐसा करने से संविधान की जाती, लिंग, धर्म, क्षेत्रीयता जैसी पहचान खत्म हो जाएगी और वो सिर्फ और सिर्फ संविधान बन जायेगा। पूरे भारत का संविधान।।

फिर से कहता हूं, आप क्या सूत्र लिख देंगे, क्या नियम गढ़ देंगे? क्या संस्कार भर देंगे, कैसे अलख जगा देंगे, कौन सा यज्ञ ज्योतिर्मय करेंगे इससे ही हमारी चेतना को विस्तार मिलता है? इससे तय होता है कि हमारी जिजीविषा, हमारा साहस इस ब्रम्हांड के कितने रहस्य जान पाएगा और इससे कितना तारतम्य बना पाएगा।

आज हमारी चेतना चिरंजीवी है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि अतीत में किसी ने खेती का अविष्कार किया, किसी ने भाषा विकसित की, किसी ने न्याय व्यवस्था बनाई, किसी ने राज्य कायम किए। किसने किए ये मायने नहीं रखता। मायने ये रखता है कि इन कृत्यों ने हमारे विकास पथ को प्रौढ़ किया है।

उदाहरण से समझिए,

जैसे ब्रिटेन के एक समुदाय ने इंगो ट्राइब की बोली को अंग्रेजी भाषा में विकसित किया। किसने किए ये महत्व की बात ही नहीं है। मायने इस बात के हैं कि आज ये दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली और सतत विकाशील भाषा है। समाज शास्त्री ये मानते हैं कि जिस समुदाय की भाषा सर्वाधिक लोकप्रिय होगी उस समुदाय का वर्चस्व उतना अडिग रहेगा। अंग्रेजी भाषा इसका उदाहरण है।

इसी विचार वश भारत में अंग्रेजी, तमिल, संस्कृत जैसी काल जई भाषाओं में संघर्ष हो रहा है। इसीलिए भारत में राज्यों का विभाजन भाषाओं के आधार पर हुआ। इसीलिए यह देश हिमालय की तराई से हिंदमहासगार तक एक समूचे राष्ट्रवादी विचार को अंगकृत करता है।

विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला ये देश। विश्व के सबसे उपजाऊ भूभाग में बसने वाले ये देशवासी जिस एक विचार के प्रतिफल में एक राष्ट्र हुए हैं उसे हम भारत का संविधान कहते हैं। जब-जब ये संविधान किसी बच्चे के हाथ में दिखे, किसी बुजुर्ग के हाथ में दिखे तो समझिए भारत देश और संकल्पित, और शक्तिशाली हो रहा है। संविधान को सर्वस्व व्याप्त करने के लिए ये बिसार दीजिए की इसका निर्माता कौन है।

क्योंकि हम कोई भी हों, हम कल नहीं रहेंगे। हमारी चेतना रहेगी अगर संविधान रहेगा। इतिहास गवाह है जिस देश का संविधान सलामत है वो देश आज तक सलामत है।



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