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त्योहारों के क्या माने होते हैं?


क्या हर साल रावण जलाने का पर्व समाज को कोई सीख देता हैं? क्या हर साल राखी बांधने से बहनों की सुरक्षा हो जाती हैं? क्या हमारे मन से रावण मिट जाता हैं? समाज से बलात्कार जैसे घिनौने अपराध खत्म हो जाते हैं? किसी घटना या विचार को किसी तारीख से बांध कर उसे त्योहार बनाने के रिवाज को समाज ने क्यों अपनाया है?

राष्ट्रीय भावनाओं से लदे पर्व जिसे राज्य हमारे समाज को मनाने के लिए प्रेरित करता है, उसके लिए राष्ट्रीय पर्वों के क्या मायने हैं? क्या अंग्रेजों से मिली आजादी भारतीय जनमानस को भी आजाद करती है? क्या संविधान को अंगिकार करने को प्रथा की संज्ञा दी जा सकती है? क्या भारतीय संघ की आजादी और गणतंत्र को त्योहार की तरह मनाना हमारी चेतना में कोई सकारात्मक बोध पैदा करता है? चौक चौराहों में बासी देशभक्ति गीत, स्कूलों में होने वाले कार्यक्रम और बड़े बड़े नारों से हममें कोई ताकत पैदा होती है? कोई विचार पैदा होता है, देश के प्रति? समाज के प्रति, लोगों के प्रति?

अगर नहीं, तो हर तारीख़ को पुरानी यादों में लपेटे रिवाजों, प्रथाओं और त्योहारों की रीक बनाने से बाज़ आईए। रावण को जलाने के बजाए उसके ज्ञान का सम्मान कीजिए, राखी के दिन भी रावण को याद कीजिए और मनन कीजिए की किसी की अस्मिता को कैद कर लेना पराक्रम नहीं है। लक्ष्मी के प्रवेश के लिए दिए जलाईये लेकिन उस राष्ट्र के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करें जो सुनिश्चित करता है कि दीपोत्सव में खुले दरवाजों से लक्ष्मी ही आयेंगी। रंग लगाने की बसंती बेला में महसूस कीजिए की जैसे प्रकृति ने बसंत ऋतु में धरती, जंगल, पहाड़ रंग दिए हैं, वैसे ही हम एक दूसरे को भी रंगने के लिए आजाद हैं मगर किसी की निजिता को भंग किए बगैर। हर पल महसूस करें की आजादी महोत्सव नहीं जिम्मेदारी है। और उन जिम्मेदारियों को लिखित वचनों के आधार पर स्वीकार कर के हमारा गणराज्य गणतंत्र हुआ है। ये कोई एक दिन का पर्व नहीं है। स्वयं के संविधान को अंगिकार करने की शपथ को साल के कोई एक दिन दोहरा लेने मात्र से न हमारा दायित्व पूरा होता है न हमारा संकल्प सशक्त होता है। किसी लोकतंत्र में आजादी से सांस लेना एक साधना है जिसे हम सबको निर्विघ्न, निरंतर एवं निर्बाध करने के लिए संकल्पित होना होगा। यदि हम सिर्फ रिवाजी त्योहारों में ही अपने गणतंत्र को पूजने लगेंगे तो न रावण मरेगा, न अस्मिताओं की रक्षा होगी, न लक्ष्मी का ग्रह प्रवेश होगा, न रंगोत्सव की आजादी बच पाएगी।

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