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भारतीय गणराज्य और नेहरू

भारतीय गणराज्य और नेहरू


मध्यप्रदेश के 67वें स्थापना दिवस के दिन ये संस्मरण अधिक प्रासंगिक है। भारतीय गणराज्य में राज्यों के निर्माण की क्या भूमिका रही है?

भारत देश में उपनिवेशवादी संघर्ष के बाद एक गौरवमयी इतिहास के प्रति लोगों को जागरूक करते हुए संघीय राज्य की संकल्पना के तहत राज्यों का निर्माण करना बेहद मुश्किल था। खासकर तब जब लोग अपनी रियासती पहचान को भुला देने के लिए तैयार न हों। छत्तीसगढ़, तेलंगाना इस न भुलाने की कड़ी में ताजे उदाहरण हैं। विदर्भ, बुंदेलखंड आदि आवाजें आज भी प्रखर हैं।

चर्चिल ने ऐसे ही नहीं कहा था कि भारत का एक देश के रूप में बने रहना लगभग असंभव है। जाते जाते अंग्रेज हमें विभाजन और विघटन का खूनी सबक भी सिखा ही गए थे। ऐसे संवेदनशील माहौल में संघीय ढांचे का निर्माण करना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। तब ये फैसला लेना की किसी कुल, जाती, धर्म के आधार पर राज्यों का गठन नहीं होगा अपितु भाषा एवं संस्कृति के आधार पर होगा। ये एक नवाचार था, जिसका श्रेय नेहरू को जाता है। ऐसे में, मध्य भारत और संयुक्त उत्तर प्रांत दो ऐसे राज्य निर्मित हुए जो किसी भाषा या संस्कृति के आधार पर न होकर, अंग्रेजी प्रशासन से सीधे भारतीय गणराज्य में जुड़े। ये दोनो राज्य कई रियासती और सांस्कृतिक रिवाजों को मनाने वालों का गठबंधन थे। इनकी अपनी बोलियाँ और भाषाएँ भी थी। लेकिन बहुत सी रियासतें अभी भी खुद को एक पृथक राष्ट्रीय पहचान देना चाहते थे और इन हलकों की आदिवासी पट्टी स्वतंत्र भारत की चेतना से दूर थी। ऐसे में नेहरू ने इन दोनों प्रांतों को वास्तविक संघीय गणराज्य का आदर्श घटक के रूप में प्रस्तावित किया।

आज का उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश नेहरू की कल्पना से छोटा हुआ है, इसे और छोटा करने की जुगत जारी है। लेकिन जिन आदर्शों ने भारतीय गणराज्य का निर्माण किया है, उसको कभी भुलाया नहीं जा सकता।

जहाँ एक ओर रियासतों को जोड़ने का जिम्मा सरदार ने उठाया, जिसके किये उसे हर रियासतों से अलग अलग समझौते करने पड़े। वहीं भारत की राष्ट्रीय पहचान को सशक्त करने का जिम्मा नेहरू ने लिया। इस पहचान को अंबेडकर ने उतना ही समावेशी और चिरकालीन व्यवस्था के रूप में संविधान लिख कर अंजाम दिया। ये नेहरू का ही नेतृत्व था कि उसने सभी तरह की विचारधाराओं को एक सूत में पिरोकर इस देश का निर्माण किया।

इसलिए भारत निर्माण में सरदार, नेहरू और अंबेडकर को अलग, अलग देखना या लिखना अनैतिक भावना किया हुआ कृत्य ही कहा जाना चाहिए। बहरहाल, मध्यप्रदेश के 67वें स्थापना दिवस की बधाई।

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