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मेरी राजनैतिक समझ

राजनीति सतत् वार्ता है। समाज के बहुपक्षीय विचारों की निरंतर बहस से उपजी नीतियों और फैसलों अमल है। इसमें कुछ भी यकायक नहीं हो सकता। इसमें कुछ भी बिल्कुल काला या बिल्कुल सफेद नहीं हो सकता। समाज तबतक सकरात्मक दिशा में बढ़ता जाता है जबतक इसमें बहस करने का साहस और इच्छाशक्ति बरकरार रहती है।

ये ठीक है कि रामनाथ कोविंद अपने समाज के लोगों का पक्ष अपनी क्षमता बराबर नहीं रख पाए, लेकिन भारतीय सामाजिक संरचना में एक शोषित समाज का नेता विधान के सर्वोत्तम पद पर विराजमान हुआ ये ही भारतीय समाज के राजनीतिक तर्जुमे की उपलब्धि है। यह भी मान्य है की द्रौपदी मुर्मू आदिवासी समाज का पक्ष अपनी क्षमता बराबर नहीं रख पाएंगी। लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में आदिवासी समाज की महिला का विधान के सर्वोतम पद में स्थापित होना, यह भी भारतीय समाज जीत है।

बराक ओबामा शपथ ग्रहण के बाद के अपने उद्बोधन में 105 वर्ष की उस अश्वेत महिला का जिक्र करते हैं जो दास युग ठीक अगली पढ़ी की महिला थी, जिसने अमेरिका में वो दौर भी देखा था जब आश्वेतों को और महिलाओं को मतदान करने का अधिकार नहीं था। 2008 के चुनाव में मतदान करते वक़्त मत पेटी में खड़े होकर उस महिला ने जो महसूस किया होगा, राष्ट्रपति ओबामा उस भाव को अमरीकी स्वप्न का सत्यापन कहते हैं।

ओडासिटी ऑफ होप के लेखक (ओबामा) की जीवनी प्रभावित करती है। पुस्तक पढ़ने की दिवानगी को मिले तंज से आहत होने के बाद भी इस किताब से मिली सीख के बारे में अपने विचार साझा करने की जुर्रत करना मुझे लाजमी लगा। सो इस पुस्तक से मिली एक सीख, आपसे साझा कर रहा हूँ।

चुनाव जीतने के बाद ओबामा अपने भाषण में जो कहते हैं उसका भारतीय रूपांतरण राष्टृपति मुर्मू के संदर्भ में कुछ यूँ बयां होता है।

अगर अब भी, किसी को शक है कि भारत अपने पूर्वजों के सपनों वाला देश नहीं है। अगर अब भी किसी को आईडिया ऑफ इंडिया पर संदेह है, यदि किसी को भी भारतीय मूल की चेतना पर संशय है, तो आज का दिन उनके इन संदेहों, शंषयों, शकों का जवाब है।


राष्ट्रपति मुर्मू आपका अभिनंदन।।


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दिवानगी की हद तक किताबें पसंद हैं। जब कोई किताब खत्म होती है तो देर तक मन में सन्नाटा भर जाता है। जैसे किसी अपने से बिछड़ने के तुरंत बाद सन्नाटा छाया रहता है। इस महीने दो किताब लगातार खत्म हुई। एक कित