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समाज और लोकतंत्र का भविष्य

पशुओं और इंसानों में क्या फर्क है?

इंसान अनंत इतिहास को ज्ञात और दूरस्थ भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। पशुओं में ये काबिलियत इंसानों की तुलना मे बहुत कम, न के बराबर, होती है। मुर्गों को मुर्गों के बीच से उठा के कसाई काटता रहता है, लेकिन मुर्गे दाना चुगने में मस्त रहते हैं। क्योंकि उनको न अपना इतिहास का बोध रहता है न वो अपने भविष्य की कल्पना कर पाते हैं। मुफ्त में दाना चुगाने वाला उनका क्या हश्र करने वाला है उनसे पहले बांकी मुर्गों का क्या हश्र हुआ है, उन्हें इसका भान भी नहीं रहता।

पशुओं और इंसानों में ये फर्क कैसे विकसित हुआ?

रीढ़ के बल सीधा खड़े होने पर इंसान को अपने मस्तिष्क तक रक्त प्रवाह करने के लिए ज्यादा मुश्किल होने लगी। मस्तिष्क को सही रक्त और ऑक्सीजन मिले इसके इंसानों को दिनभर में कुछ देर के लिए चित लेटना जरूरी हो गया। यहाँ से मनुष्यों को अच्छी नींद की जरूरत पड़ी। अच्छि नींद के उपाय के लिए इंसानों को सुरक्षित माहौल बनाना था। इसके लिए वो एक जुट हुए और एक जुट होकर रहने के आदि होने लगे, ऐसे बना हमारा कुटिम्ब्, हमारा समाज। एक दूसरे की सुरक्षा में सोने, मिलकर मेहनत करने और बांटकर खाने से हमारा मस्तिष्क और शरीर की मांशपेशियों को सही समय में आराम, उपयुक्त समय में मेहनत और सामाजिक सौहार्द नियमित मिलने लगा इस तरह, मनुष्यों ने समाज, रिवाज, चलन, नीति, व्यवस्थाओं आदी का गठन किया। इन विकसित व्यवस्थाओं को संचालित करने के लिए आगामी पीढ़ी का नीतिगत ज्ञान वर्धन किया जाने लगा और मनुष्य पशुओं की तुलना में लगातार संवेदनशील एवं दक्ष होता गया।


प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, एवं लोभ का उदय

सुख भंजन यानी आराम, वैभव और सुरक्षा की प्राप्ति के लिए अनैतिक मूल्यों का प्रयोग करना। समाज जैसे जैसे विकसित हुआ, इसमें काबिलियत और दक्षता के आधार पर कर्मियों को निर्धारित किया गया। लेकिन कई कार्य ऐसे हुए जिसके लिए काबिलियत की आवश्यकता न के बराबर थी और उसे करने से कोई विशेष सम्मान प्राप्त नहीं होता था। जैसे साफ सफाई, मृत पशुओं हटाना आदि। ऐसे कामों को करने के लिए अच्छी कीमत देने पर भी पर्याप्त कर्मियों की उपलब्धता नहीं हो सकती थी। इसलिए इस तरह के कार्मिकों का चयन दंड विधि के आधार पर होने लगा। इसके उलट जोखिम भरे कामों को करने के लिए भी कर्मियों की कमी न हो इसलिए जोखिम को अतिरेक मुनाफे से जोड़ दिया। यानी की अब समाज में मेहंताने की एवज में सिर्फ कीमत ही नहीं बल्कि दंड अथवा सम्मान को भी जोड़ दिया गया। किसी व्यवस्था में दंड और सम्मान का निर्धारक कौन होगा, इसकी प्रतिस्पर्धा होने लगी। और इस तरह समाज में इर्ष्या, प्रतिस्पर्धा एवं लोभ का उदय हुआ।

इन घटकों ने समाज में अनैतिक मूल्यों को स्थापित किया। दंडाधिकारी या नीति नियंता बने रहने के लिएआवश्यक है कि ज्यादतर लोग इस काबिलियत को हांसिल ही न कर सकें। इसके लिए अधिक से अधिक लोगों को दंडित किया जाए और कम से कम लोगों को सम्मानित किया जाए। लगातार विकसित हो रही इस सामाजिक व्यवस्था में दंड और सम्मान के विधान को कठिन और विलक्षित बनाया जाने लगा ताकि समुदाय के बड़े हिस्से को गुलाम बनाय जा सके। किसी समुदाय में यदि 70% लोग गुलाम हो जाएं तो 3% लोग अनैतिक रूप से सुख भंजन कर पाते हैं।

इसका नुक्सान ये होता है कि उस समुदाय के 30% लोग वापिस पशुत्व की हद तक गुलाम हो जाते हैं। ये लोग निरक्षर, अज्ञानी, अंधभक्ति और नशे में लिप्त हिंसक पशु की तरह हो जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ 3% लोग निष्ठुर, अनैतिक और लोभी होते जाते हैं।

अतः दोनों तरफ पशुत्व का प्रभाव बढ़ता जाता है दोनों समूहों में अतीत का ज्ञान और भविष्य की कल्पना का शिल्प खत्म हो जाता है। अतः 3% वाला वर्ग 30% वाले वर्ग को बलि के बकरों और मुर्गों की तरह इस्तेमाल करने लगता है।

लोकतंत्र इंसानों को पशु हो जाने से बचाता है

लोकतंत्र एक आदर्श व्यवस्था है। इसका संपूर्ण रूप कभी स्थापित नहीं होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक इंसान का मूल्य समान होता है। इसमे पशु तुल्य निर्ममता भोग रहे गुलाम और पशुओं समान निर्दइ हुए सभ्रांतों में कोई फर्क नहीं होता। लोकतंत्र के बाल्यकाल एवं किशोरकाल में सुख भंजक वर्ग गुलाम वर्ग को फुसलाकर बहुमत हाँसिल कर लेता है। लेकिन, मनुष्य जाती वो वनस्पति है जो ग्रीष्मकाल में भले ही सुख के मृत पड़ जाए, सावन आते ही लहलहा उठती है। हर वर्ष सूखने और हरे हो जाने की प्रकृति इस वर्ग को धीरे धीरे शक्तिशाली बनाती जाती है। इसी तरह, निकट भविष्य में लोकतंत्र के प्रौढ़ होने पर, मानव जाती फिर से खुद को पशु हो जाने से बचा लेगी।

ये ठीक है कि आज लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी दुरूपयोग हो रहा है लेकिन कम से कम जो गलत है वो दर्ज तो हो रहा है। अन्य व्यवस्थाओं में तो इसे न्यायसंगत माना जाता रहा है। ये मानव जाती के हित मे है कि उच्च वर्चस्व वाले 1% समुदाय को निम्न स्तर के 30% समुदाय की जरूरत महसूस हो। फिर चाहे ये रिश्ता जंगल में झाड़ियों और शिकारी पशुओं वाला ही क्यों न हो।

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