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हमेशा की तरह



जो लोग सरकार की तरफ हैं वो ये साबित करने में लगे हैं की ये वाला फैसला भी सही है। बांकी लोग यही माने बैठे हैं कि ये गलत है। कोई भी मुद्दा हो, हिंसक से हिंसक या आर्थिक फायदे नुकसान का या फिर इतिहास का, भविष्य का या कोई भी ज्ञान विज्ञान का स्थिति ज्यों की त्यों है। जो समर्थन में है वो समर्थन में है, जो विरोध में है वो विरोध में। सरकार जैसे दोनों पक्षों को उलझे रहने की खुराक परोसती है। सत्ता किसान को खालिस्तानी, विरोधी उसे अन्नदाता कहते हैं। उनके मुताबिक कोई टूलकिट है तो कोई देश की धरोहर, कोई अर्बन नक्सली तो कोई समाजवादी, देशभक्त देशद्रोह, खिलाड़ी या बच्चलन। बस हर मुद्दा एक खुराक है, जुगाली के लिए। ये मुद्दे टाइम-टाइम पे पूरी पाबंदी से समाज को ड्रिप से दवाई की तरह पिलाये जा रहे है। ताकि समाज एक दूसरे से लड़ते-लड़ते थक न जाए साथ ही इतना ताकतवर भी न हो जाए की लड़ाने वाले दलालों पर ही हमला कर दे।

सोशल मीडिया में किसी दंगल के खेल की तरह ट्रोल्स लड़ते हैं और जनता स्क्रोल करती हुई मजे लेती है। जैसे मेले में दंगल होता था, मुर्गा लड़ाया जाता था। भीड़ या तो तमाशा देखती थी या फिर दांव लगाती थी। अपने अपने मुर्गे पर अपने पहलवान पर। सोशल मीडिया एक मेला ही है। जहां कुछ लोग खरीदने बेचने या बाजार करने आते हैं और अधिकतर लोग तमाशा देखने, जुआँ खेलने या दाँव लगाने।

पहलवान की हड्डी टूटने पर वो ताली बजाते हैं,मुर्गे के खून उछलने पर उनका भी खून उबलता है और जेब से नोट उछलने लगते हैं। इस खेल में हर दर्शक, हर जुआरी अपना अपना मुर्गा या पहलवान चुन लेता है और मन ही मन उसके जीतने की दुआएं माँगता है। टॉम-जेरी का स्वांग हो या आईपीएल का खेल, इस्राएल-फ़िलिस्तीन या रूस-युक्रेन के युद्ध हो, हर दर्शक/जुआरी का एक पक्ष है। दर्शकों को इसका यकीन है कि अपने पक्ष का चुनाव वो खुद करते हैं। जबकि, तमाशाई तमाशा रचने से पहले ही उसकी रचना में यह तय कर देते हैं कि कौन किसके पक्ष में दाँव लगायेगा। ये पूरी इंसानी दुनिया ही मेले के बिसातों में बिछे मोहरों की तरह है। जैसे गहरे पानी में रहने वाली मछली आसमान में उड़ने वाले बाज़ की कल्पना भी नहीं कर सकती पर रह रह कर शिकार होती है। वैसे ही हम तमाशबीन कभी ये सोच भी नहीं सकते कि टॉम एन जेरी हमारे टीवी चैनेल में दिखाने वालों का असली मकसद क्या है।

वैसे किसी भी सिस्टम में सत्ता के पक्ष में दो ही लोग खड़े होते हैं। एक वो जिसे सत्ता से मुनाफा होता है और दूसरा वो जो नशे मेें होता है।वरना और क्या वजह है कि जो लोग कल तक नितीश कुमार के पक्ष में थे, आज वो विपक्ष में क्यों हैं? या जो लोग कल तक विपक्ष में थे, आज पक्ष में क्यों है?

चाहे, दो लोगों को मार्शल गाड़ी में जिंदा जला कर मार डालने का मुद्दा हो, या दो हजार के नोट शुरू करने से लेकर बंद करने का मुद्दा हो। एक भी भारतीय नागरिक ऐसा नहीं मिलेगा जिसने अपना पक्ष बदला हो। क्योंकि या तो उसने तमाशे में दाँव लगा रखा है या तमाशे के नशे में मग्न है।

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