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हम जैसे लोगों का राजनीति में दख़ल



बचपन से ही हर काम बचकाने ही लगते आए हैं। जब लोग क्रिकेट दीवानगी से खेलते थे और हर गेंद में जीने मरने जितनी बाज़ी लगा के क्रिकेट देखते थे तो ऐसा लगता था ये सब लोग बड़े हो गए हैं, मैं अबोध ही रहा गया हूँ। जब क्लास में लोग टॉप करते, उनको इनाम मिलता तो मुझे लगता लोग इतनी मेहनत करते हैं, मुझसे ज़्यादा समझदार हैं। मैं नासमझ ही मारूँगा शायद। कॉलेज में जब लोग प्लेसमेंट के लिए कवायत करते, हर कम्पनी के बारे में पढ़ते, कौतूहल करते तो मेरे मन में यही चलता इन्हें कैसे पता चलता है अगला ज़रूरी काम ये है? मुझे क्यों नहीं समझ आता? नौकरी के दौरान जब लोग टार्गेट पूरा न होने की स्थिति में डराने लगते तो ये ख़याल आता की कौन सा जान से मार देंगे? छोड़ो, और छोड़ देता नौकरी।

शिक्षक के रूप में जब मैं बच्चों को यही सब करते हुए देखता था जो मेरे साथी लोग करते थे, तो मन करता की इन्हें टोक दूँ। बता दूँ की ये दुनिया इतनी कठिन नहीं है। लेकिन रुक जाता, ये सोच कर की कहीं ये लोग मुझे शिक्षक मानने से ही न इनकार कर दें। फिर धीरे-धीरे साहस किया और शिक्षक के रूप में अपने बच्चों में इस साहस को अंकुरित करने लगा, शायद इस लिए शिक्षक के रूप में कोई हैसियत बना पाया हूँ।

आज लेकिन किसी एक मौक़े पर मैं संगीन हो रहा हूँ। एक बात जिस पर मुझे लगता है संघर्ष किए जाने के अलावा कोई चारा नहीं है। इस लिए इस विषय पर मैंने कई वर्ष विमर्श किया है। कई कौतुहलों से गुजरने और जूझने के बाद कुछ रास्ते ढूँढ के लौटा हूँ। अब जो पागलपन सवार हुआ है, उसमें मैं और पागलों को घसीटना चाहता हूँ। शायद यही कुछ है जिसे करने के इंतज़ार में मैं आज तक निकम्मा भटकता रहा हूँ।

यदि आप इस तिशनगी से वास्ता चाहते हैं तो आपको एक प्रक्रिया से गुजरना होगा। आपको ये चार निबंध पढ़ने होंगे।

1. नागरिक और राज्य - आज

2. परिस्थितियों की परवरिश

3. मतदान का अंकगणित

4. मतदाता का मनोविज्ञान

जी हाँ, सभी निबंध राजनीति विषय के हैं। जैसा मैंने कहा, किसी एक मौक़े पर मैं संगीन हो रहा हूँ। कई विपत्तियों और उपहास का केंद्र बनने के बाद भी मैं राजनीति से इतर कुछ सोच समझ नहीं पता हूँ। यूँ ही नहीं मैंने इसे पागलपन कहा है। अभी तक के तजुर्बों के आधार पर मैं इस विचार को ख़ारिज करता हूँ कि आप और हम जैसे लोग राजनीति में दख़ल नहीं रखते हैं। हाँ, इस भीमकाय दैत्य से लड़ने के लिए इसकी नाभि में तीर मारने की तरकीब निकालनी होगी। एक कोशिश मैं कर रहा हूँ, क्या आप साथ देंगे?


१ नागरिक और राज्य - आज

मौत से ज़्यादा मौत का डर सताता है। जीवन बीमा इसलिए बिकता है क्योंकि लोग मर जाने के बाद की भी चिंता जीते जी करना चाहते हैं। आभासी डर असली डर से भी ज़्यादा डरावना होता है। आम आदमी को अपनी हद में रखने के लिए अब उसे पेट भर खाने का लालच देने की भी ज़रूरत नहीं है। अब उसे बस ज़िंदा बचे रहने मोहलत देते रहिए वो अपनी हद कभी नहीं पार करेगा। राज्य और नागरिक के बीच अब यही डर का रिश्ता रह गया है।

किसी को भी बस यक़ीन दिला दो कि उसका कुनबा या उसका ख़ेमा या उसके लोग ख़तरे में है। ख़तरा हो या न हो, उसको यक़ीन हो जाना चाहिए की ख़तरा है। वो डर के मारे आपकी हाँ में हाँ और न में न स्वीकारने लगेगा। राजनीतिक दल अब अपनी क़ाबिलियत पर नहीं इस डर के आधार पर वोट माँगते हैं। अगर हमारे विरोधी दल के लोग सत्ता में आ गए तो हम ख़त्म हो जाएँगे। अगर विरोधी दल हमसे सत्ता छीन लिया तो हमसे भयानक बदला लेगा। ये डर पहले घरों में चोरी छिपे बताया जाता था, अब खुले मंच में ज़ताया जाता है। कैसे पनपा ये डर? राज्य और उसके नागरिकों के बीच ये रिश्ता इतना डरावना क्यों हो गया है?

कारण है जन संख्या! दूसरे विश्व युद्ध के बाद से जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी है। इस बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए संसाधनों का प्रबंधन इतना सुस्त रहा की ये आबादी भीड़ में तब्दील होती चली गयी। आज लोग कम है, भीड़ ज़्यादा है। विचार कम हैं, सनक ज़्यादा है। अनुशासन कम है, उत्तेजना ज़्यादा है। इसलिए नागरिक और राज्य के बीच के रिश्ते भीड़ और सनक के आधार पर बनाए जाने लगे हैं।

२ परिस्थित्यों की परवरिश

दुनिया में जब आधुनिक लोकतंत्र की संकल्पना विस्तार ले रही थी, तब हम दो-दो विश्व युद्धों से उबर रहे थे। उस दौर के नीति निर्माताओं ने तानाशाही का मंजर देखा था। दो विश्वयुद्धों के ख़ौफ़नाक हश्र को देखकर हमारे पूर्वजों ने लोकतांत्रिक ढाँचे को इस तरह से तैयार किया कि हम फिर से इतने कुंद न हो जाएँ की तीसरा विश्व युद्ध सब ख़त्म कर दे। उस वक्त दुनिया की आबादी ढाई अरब थी, आज दुनिया की आबादी आठ अरब है। तब हमारे पुरखे को इस बढ़ती भीड़ की रफ़्तार का अंदाज़ा नहीं हो पाया था। अगर जनसंख्या कम होती तो हम नई पीढ़ी वाले और नए विचार वाले बनते लेकिन हम इतने तंग हालातों में पले बढ़े की हम सनक का शिकार हो गए। जब नव भारत का संविधान रचा गया था तब भारत की आबादी ४२ करोड़ थी, आज १४२ करोड़ है। १४२ करोड़ लोग जो 5जी की रफ़्तार से आपस में जुड़े होने के बावजूद इतने परिपक्व विचार नहीं रखते जितना दूसरे विश्वयुद्ध से उबरे हुए हमारे पूर्वज के विचार परिपक्व थे। क्यों? क्योंकि आज शिक्षा का सीधा रिश्ता आमदनी से है। यदि अभिवावकों की आमदनी कम है तो बालकों का शिक्षा स्तर भी कम होगा। लिहाज़ा भविष्य में बालकों की आमदनी भी कम होगी और ये क्रम चलता जाएगा। इस क्रम को 2% या 3% अलौकिक कौशल वाले लोगों की बात कर के ख़ारिज न करें। 1950-80 के दशकों में कम आमदनी वालों ने अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा खर्च किया। नतीजा यह हुआ की उन लोगों के बच्चे जो अधिकतर गरीब तो रहे लेकिन प्रगतिशील रहे। उनमें विचार शून्यता नहीं थी। आज मिडल क्लास की जनसंख्या बढ़ी है, इस वर्ग ने अच्छी शिक्षा के लिए अच्छा खर्च भी शुरू किया लेकिन परिणाम वाजिब नहीं मिल रहे हैं। पहले गरीब जब अपने बच्चों को जैसे-तैसे बड़े स्कूल में दाखिल करा लेता था तो उस स्कूल का माहोल जो बड़े घर के बच्चों के साथ पढ़ने से मिलता था वो माहोल बच्चों की परिवारिश सुधार देता था। आज मिडल क्लास अपने बच्चों को जिस स्कूल में पढ़ा पा रहा है वहाँ सिर्फ़ मिडल क्लास के बच्चे ही पढ़ते हैं। इस माहौल में बच्चे कुछ नया नहीं सीख पाते बल्कि एक दूसरे के घरों की कमियाँ जैसे ख़राब समय प्रबंधन, बहाने बाज़ी, काम चलाऊ रवैया, जो हर मिडल क्लास अभिवावकों की कमज़ोरियाँ हैं, वही कमज़ोरियाँ बच्चों में सीधे उपज रहीं हैं। यह भी एक मुख्य वजह है कि आज समाज से विमर्श ख़त्म हो रहा है। मिडिल क्लास वर्ग सिर्फ़ अपने बराबर वालों से स्पर्धा कर रहा है। निकटवर्ती समस्याओं से जूझ रहा है, इसलिए प्रौढ़ विमर्श उसकी प्राथमिकता है ही नहीं। और गरीब, हार चुका है। रीसर्च ये कहती है कि आज ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोग आगामी सौ वर्षों में भी ग़रीबी से नहीं उबर पाएँगे। इस लिए ये वर्ग हार चुका है। रोज़ थक कर चूर होता है, नशे में शाम गुज़ारता है और चिंता में रात। इस वर्ग को अपना वोट बेचने के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं बचा। इन परिस्थितियों ने हमारी परवरिश ही ऐसी की है कि हम विमर्श के बजाए, सनक पे सवार रहें।


३ मतदान का अंकगणित

बेहद गरीब, नशे का आदि, विचारशून्य वर्ग जिसकी जनसंख्या 23 करोड़ है (18%) ये भी वन वोट वन वैल्यू है और 3% अमीर, बुद्धिमान और चालक नागरिकों का वोट भी वन वोट वन वैल्यू है। निचला मध्यम वर्ग (Lower Middle Class) सबसे कम मतदान करता है, क्योंकि ये वर्ग अक्सर अपने पोलिंग बूथ से दूर किसी शहर में नौकरी कर रहा होता है। लेकिन यही वर्ग अपने पोलिंग बूथ के मतदाताओं के विचारों और फ़ैसलों में सोशल मीडिया एवं अन्य माध्यमों से दख़ल भी रखता है। 2019 में मध्यम वर्ग ने मतदान में बहुत बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन उच्च मध्यम वर्ग इन सब से दूर अपनी दुनिया में मशगूल रहा। इस तरह से भारत में (और विश्व में भी) वोट देने वालों के दो वर्ग बने। एक वो जो अपनी समझ और सूझ-बूझ से वोट देता है और दूसरा वो जो किसी शक्तिशाली वर्ग के प्रभाव में आकर वोट देता है। प्रभाव यानी किसी भी तरह का प्रभाव, जैसे यदि कोई जिस सेठ के यहाँ नौकरी करता है तो उस सेठ के प्रभाव, या दारू-मुर्ग़ा की लालच में या नोट पे वोट या फिर अपने साथी, सहकर्मियों में अपने महत्व को बनाए रखने के दबाव में वोट ये सभी प्रभावित वोटर हुए। आज इन दोनों वर्गों की संख्या बराबर है। जो लोग अपनी सूझ-बूझ से वोट करते हैं, उनमें ही वो वर्ग भी आता है जो अपने से निचले वर्ग को को प्रभवित भी करता है। लिहाज़ा लोकतंत्र में वन वोट वन वैल्यू का नहीं बचा, अब ये जिसकी लाठी उसकी भैंस हो गया है।

दूसरा यह समझना भी ज़रूरी है कि गुप्त मतदान की संकल्पना भी डिजिटल युग में फ़ारिक हो चुकी है। हमारे देश के पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन नें उँगली पे पक्की स्याही का निशान लगाने की प्रथा शुरू की थी। यह स्याही, आज़ाद भारत का सबसे पहला अविष्कार है। 1952 में हुए पहले आम चुनाव में कुल 3 लाख टन पक्की स्याही का इस्तेमाल हुआ था। उस चुनाव में वोटर लिस्ट जैसी कोई चीज़ थी ही नहीं। यदि इस सूची के बनने का इंतज़ार करते तो शायद दो दशक और चुनाव न हो पाते और नेहरू को तानाशाह करार कर दिया जाता। सुकुमार सेन की ज़िम्मेदारी थी की लोग मतदान करने आएँ और अपने-अपने काम में वापिस लौट जाएँ। उनके लिए वोट करना और दिहाड़ी कमाने के बीच में फ़ैसला कर पाने की दुविधा न पनपे। इसलिए बूथ बनाए गए, हर गाँव में लोग सुबह वोट करें और अपने काम पे जाएँ ऐसी व्यवस्था करने के लिए बूथ बनाए गए। फिर इन्हीं बूथों के आधार पर मतदाता सूची को निर्मित किया गया। धीरे धीरे चुनावी प्रक्रिया और संगीन होती गयी लेकिन बूथ लूटना, बैलेट में स्याही भर देना, मतदाताओं को आतंकित कर देना जैसी सामंती कार्य भी होते गए। इस लिहाज़ से EVM बनायी गयी, भारत के चुनावों में EVM या VVPAT के उपयोग को भी उसी तरह थोपा गया जैसे GST थोपा गया। बिना किसी उचित संसदीय कार्यवाही के ये मशीने आयीं और इस लिए इनका उपयोग अभी भी विवादित है। चुनाव आयोग अब हर चुनाव का पूरा आँकड़ा मय फ़ॉर्म 20 के आम लोगों के लिए वेबसाइट पर प्रकाशित कर देता है। नतीजा यह हुआ, की अब बिग डेटा की मदद से ये सीधे पता लगा लिया जाता है किसने किसको वोट दिया है।

सुझाव ये है कि गुप्त मतदान के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए बूथ वार मतदान की व्यवस्था को और संगीन एवं त्रिकोणीय किया जाए। VVPAT की पर्चियों को गिनने के लिए टच लेस OMR मशीनों की व्यवस्था की जाए एवं सभी प्रत्याशियों को डिजिटल गणना के साथ-साथ पर्चियों की गड़ना का सत्यापित पत्र सौंपा जाए।


४ मतदाता का मनोविज्ञान

हमारा मन जिन विचारों को खाता है उन्हीं विचारों की जुगाली करता है। उसी जुगाली के रस को ही सत्यापित ज्ञान मानता है। हमारा मन कौन से विचार खाएगा इसका फ़ैसला हमेशा से ही शक्तिशाली वर्ग करता रहा है। लोकतंत्र में हमारे विचारों का ह्रास करने, हनन या अगवा करने के अलावा शक्तिशाली वर्ग के पास कोई विकल्प नहीं बचा। चूँकि किसी एक समुह को सभी अन्य समूहों के ख़िलाफ़ खड़ा कर के चुनाव नहीं जीता जा सकता इसलिए राजनीतिक दलों ने अपने लिए कित्रिम पहचान और वास्तविक पहचान की कई परतों का अविष्कार किया है। ये परतें हमारा मानसिक अपहरण करते हैं। कौने किसे वोट करेगा ये जानना अब उनके लिए सबसे आसान हो गया है। जिस देश के राजनीतिक दल जितनी आसानी से मतदाताओं का मिज़ाज जान पाते हैं उस देश में उतनी प्रचंड बहुमत की सरकार बनती है। लोकतंत्र में बहुमत की सरकार तानाशाहों जितनी ही अन्यायपूर्ण होती है।

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