सिफ़र शेष

लघु कथाओं का संग्रह

आभार

आभार

क्यूँ लिखी ये कहानियाँ? स्वप्न हर कोई अकेला ही देखता है, उन सपनों को सच कोई भी अकेले नहीं कर सकता। ये जिरह होती रहेगी कि किसने कितना किया होगा लेकिन शिल्प तभी पूरा होता है, जब सबके हाथ लगे, सबका मन लगे और उस शिल्प से सबकी उम्मीदें जुड़ने लगे। “सिफ़र शेष” किस्सा गोई की दुनिया में कहानी संग्रह कही जा सकती है, शिक्षा के लिए साहित्य है, लेखक के लिए अरमान और बाज़ार के लिए उत्पाद। सब जगह इसकी मौजूदगी किसी विशेष इंसान की वजह से सम्भव हो पायी है।

इश्क़ ही तो है

इश्क़ ही तो है

"हर रिश्ते की ज़र्दी में है रूमानियत? न कहो!
इश्क़ है ब-कद्र-ए-जर्फ़-ओ-आलिम? न कहो!” क्या नाम है आपका?” 
“कलश!” उसने कहा “और आपका?” पूछ भी लिया
“अमन” मैंने कहा अजनबी को दूर से घूर के देखा जा सकता है, लेकिन अजनबी से बातें होने लगे तो फिर बातों के दौरान देखना भी मुहाल हो जाता है। कलश जितनी ख़ूबसूरत है, अमन को यही लग रहा होगा कि इससे तो अच्छा था, के अजनबी ही रहते। कम से कम निहार तो सकते थे। 
अभी रात नौ बजे ही कनाट प्लेस में अमन और कलश की मुलाक़ात हुई है। अमन बैंगलोर से आया था, वो पिछले तीन साल से बैंगलोर की एक कम्पनी में कन्सल्टंट है। कोई कम्प्यूटर है, जो अंतरिक्ष में भेजे गए किसी विशेष यान की संचार व्यवस्था के दुरुस्त रहने की जानकारी धरती पर भेजता है।

कहानीकार का परिचय

कहानीकार का परिचय

सन 1983 में ग्राम हँसवा ज़िला फ़तेहपुर उत्तर प्रदेश में जन्मे, जितेंद्र राजाराम वर्मा वर्तमान में इंदौर शहर के निवासी हैं। आप एक शोध संस्था “पर्सेक रिसर्च” में परियोजना प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं। साथ ही, इंदौर और भोपाल के कई महाविद्यालयों में बतौर अतिथि शिक्षक जुड़े हुए हैं। आपने कोरपोरेट ट्रेनर के रूप में भी कई संस्थानों के अभि-कर्मियों को प्रशिक्षित किया है। आपके द्वारा पढ़ने-पढ़ाने का ये सतत कार्य पिछले डेढ़ दशक से अनवरत जारी है।आपकी पहली किताब “माई वाइज़ कंट्रीमेन” अंग्रेज़ी भाषा में लिखी...

ग़लती किसकी है?

ग़लती किसकी है?

मुट्ठी भर सपने साथ लिए इस दुनिया में आए थे।
क्या कुछ देकर जाएँगे, जब खुली हथेली जाएँगे? विकासशील भारत को यदि आसमान से देखा जाए तो लगेगा कि यहाँ के शहर किसी मोटापे के मरीज की तरह फैलते जा रहे हैं, और गाँव किसी भूखे नंगे की तरह बिलबिलाते हुए सिकुड़ते जा रहे हैं| बाजार ने दोनों को बीमार कर दिया है| डाइबिटीज़ की तरह... शहरों में शुगर बेहद बढ़ गई है, गाँवों में इन्सुलिन बढ़ता ही जा रहा है|
इंदौर शहर भी बाकी सभी स्मार्ट शहरों जैसा ही बढ़ता जा रहा है| सड़कों को देख कर लगता है कि सबसे स्वस्थ शहर है| पिछली बार तो प्रतिस्पर्धा में अव्वल आया था, लेकिन भ्रष्टाचार भी किसी बैड कोलेस्ट्रोल की तरह चिपका ही जा रहा है|

दो टूक

दो टूक

थोड़े दीवाने तो हैं मगर खुली किताब नहीं है,
जुबाँ में जवाब है, हम हाज़िर जवाब नहीं हैं। मैं ऐसा शायराना कभी नहीं था, हाँ लिखता था बस यूँ ही… कभी किसी कापी के पीछे के पन्नों में या कोई मेल-बॉक्स में ड्राफ्ट बना के छोड़ दिया बस। किसी को कभी सुनाया नहीं, वैसे भी दोस्त अक्सर मेरा मजाक बनाये रहते हैं ऐसे ऊल-जलूल अध गुथे शब्द देखेंगे तो टांग खिंचाई दरार पैदा कर देगी। और वैसे भी जब से फेसबुक आया है, हर कोई लिखता ही रहता है। कई बड़े लाजवाब लिखते है, उनके आगे तो मैं जग हंसाई ही समेट पाऊँगा बस। और फिर दुनिया को अब और साहित्य की ज़रूरत नहीं है, खास तौर से प्रेम विषय पर।

निराधार

निराधार

“किस-किस से फ़रियाद करोगे, कौन रखेगा ध्यान?
पलक झपकते खो जाए गर काग़ज़ की पहचान!” आज ऑफ़िस से घर जाने में देर हो रही है, जेब में कैश नहीं है और टैक्सी वाला ऑनलाइन पेमेंट नहीं ले रहा है। वैसे बिल्डिंग के नीचे सब्ज़ी वाले से बात हो गयी है। सब्ज़ी भी ले लूँगी और टैक्सी को कैश भी, बस फोन की बैटरी बची रहे। 3% इज़ ऑल आई ऑल्वेज़ फ़ेल शॉर्ट आफ़।
सब्ज़ी वाले, टैक्सी वाले हो या मोची इन लोगों के पास हमेशा कैश रहता है। यहाँ एक-एक करके किश्त कटती है, और फिर इंतज़ार रहता है पगार का, ग़ज़ब है। हर साल इंक्रिमेंट लगता है, जितनी बार नौकरी बदली है लगभग तीन गुना सीटीसी बढ़ गयी है।

बूढ़ी बस्ती

बूढ़ी बस्ती

चलते चले आए कई मील उन गलियों से
दरक गए होंगे, वो बस्ती, घर, चौराहे सिगड़ी लहक चुकी थी और शायद ठण्ड भी बढ़ गयी थी। शरीर आगे से तो गर्म था, मगर पीठ ठिठुरी जा रही थी। ऐसे मे विज्ञान का पाठ याद कर के पापा जी को सुनाना भला किसी फांसी की सजा से कम क्या होगा। भोर उठ आई थी मगर कोहरे ने धूप को रोक रखा था। भीनी सी ओस ने आसमान को बर्फ़ की पहाड़ी जैसा श्वेत कर दिया था। लिप्टिस के पेड़ हलकी हवा में झूम रहे थे, विज्ञान की किताब के अलावा सब कुछ हसीन लग रहा था। तभी भीतर से कुछ आहट आई, शायद पापा उठ गए हैं।

भूमिका

भूमिका

मैं लेखक नहीं हूँ, घुमक्कड़ हूँ। अपरिचित लोगों से बात करना और उनके लफ़्ज़ों से ज़्यादा उन्हें सुनना मेरे चरित्र का हिस्सा है। ये सभी कहानियाँ कल्पनाओं की ओट में लिखी हुई सच्ची कहानियाँ हैं। सच है, कि सच कल्पनाओं से भी अधिक नाटकीय होता है। इसलिए हर सच का सत्यापित साक्ष्य प्रस्तुत करना मेरे बस में नहीं था। न ही ऐसा करना मेरी इच्छाशक्ति बन पायी। हर कुछ जो हम महसूस करते हैं, उसका साक्ष्य नहीं दे सकते। मगर सिर्फ़ इसलिए जो कुछ महसूस किया उसको व्यक्त ही ना किया जाए ये तो ज़मीर से बेईमानी लगती है। ये जोखिम कि लोग नहीं मानेंगे से बड़ा ये जोखिम है कि जो बीती हो उसे बिसार दूँ।

मास्टर का प्रेम

मास्टर का प्रेम

नहीं हर एक को मुमकिन है एक जैसी हैसियत
मिरे हिस्से में फ़र्ज़ आया, तिरे हिस्से में नफ़ासत हर किसी का नामकरण उसके परिवार वाले करते हैं, लेकिन मास्टर का नामकरण दो बार होता है। पारिवारिक नाम उसका चरित्र बताता हो या ना बताता हो, छात्रों का दिया हुआ नाम उसका विचित्र ज़रूर बताता है। जी हाँ विचित्र, क्यूँ कि हर मास्टर विचित्र होता है। कितना ही जवान क्यूँ न हो, छात्रों से बूढ़ा ही होता है। नए नवेले मास्टर की दोहरी मरम्मत होती है। स्टाफ़ रूम में उसे प्यून से थोड़ा ही ऊपर समझा जाता है और क्लासरूम में उसका जो सलूक होता है उसको ना ही बयान करें तो बेहतर। युवा मास्टर के रूप में प्राईवेट संस्थानों को एक गधा मिल जाता है। मल्टी पर्पज गधा, जहाँ चाहे हाँक दो, ग़लती कर बैठे तो ठीकरा भी उस पर ही डाल दो। सारी मलामत उसकी और वेतन? दर्द तो आगे सुनिएगा।

यायावर

यायावर

“ज़र्द रात की हर धुँध को कोहरा नहीं कहते” जब पापा ने कम्प्यूटर की कोचिंग लगवाई थी, कम ही सही लेकिन ये मुझे एहसास हुआ था कि फ़ीस के पैसे उनकी सैलेरी से ज़्यादा हैं। हर पल ये एहसास होता था कि जितने पैसे मेरी पढ़ाई में लग रहें हैं उतनी मेहनत नहीं कर रहा हूँ। जब कभी चार-चार घंटे तक कम्प्यूटर में गेम खेल जाता था, ये ख़याल और गहरा हो जाता कि जिस कोचिंग की फ़ीस इतनी ज़्यादा हैं, वहाँ वक़्त की बर्बादी किसी की मेहनत की कमाई का क़त्ल है। लेकिन आज भी ये समझ नहीं पाया कि अपराध बोध होते हुए भी अपराध करते जाना कैसी मानसिकता कहलाती है?

सराहना

सराहना

परामर्श और आशीष वक़्त के शोर में यूँ चीख़ रहे हैं लम्हे!
बहते पानी में कोई डूब रहा हो जैसे!!
लेखनी में ठहराव के साथ समाज की अंदरूनी तहों में बहता हुआ दर्द भी है। यह दर्द हमारे पढ़ने के सफर को कहां-कहां तक ले जाता है, यह तो सिर्फ इन कहानियों को पढ़कर ही अंदाज लगाया जा सकता है। बशर्ते यदि आप कहानी के मर्म में वास्तविकता को उसी विद्रूपता में देखना चाहते हैं। यदि आप हिंदी की उत्कृष्ट कहानी और इसकी बानगी पढ़ना चाहते हैं, तो यह संकलन आपके लिए ही है।”

- डॉ॰ प्रशांत चौबे, एस॰पी॰, ए॰टी॰स, मध्य प्रदेश पुलिस, शोधकर्ता, लेखक

सिफ़र शेष

सिफ़र शेष

यूँ तो होता है
हर कोई मुंसिफ़ मगर।
हर बार फ़ैसला हो,
मुश्किल भी नहीं,
मुमकिन भी नहीं।। कनाडा, भारतीय लोगों के लिए नया राज्य जैसा है। पिछली सदी में समृद्धि की तलाश में लोग मुंबई, बैंगलोर या दिल्ली की ओर पलायन करते थे, इस सदी में कनाडा आया करते हैं।
वैसे दुनिया के लगभग सभी देश में एक ना एक भारतीय परिवार बसा हुआ है। अंग्रेज़ी हुकूमत में किए गए दास व्यापार का उस वक़्त तो ख़ौफ़नाक मंज़र था। लेकिन अतीत की दफ़्न लाशें ही भविष्य का बीज और खाद बनती हैं। इसलिए उस दास व्यापार का फ़ायदा यह हुआ कि वो ग़रीब भारतीय जो अपने गाँव में दो गज़ ज़मीन के लिए मोहताज थे वो मौरिशियस और बाली जैसे देशों के सत्ताधीश हो गए हैं।