J Rajaram

आभार

क्यूँ लिखी ये कहानियाँ? स्वप्न हर कोई अकेला ही देखता है, उन सपनों को सच कोई भी अकेले नहीं कर सकता। ये जिरह होती रहेगी कि किसने कितना किया होगा लेकिन शिल्प तभी पूरा होता है, जब सबके हाथ लगे, सबका मन लगे और उस शिल्प से सबकी उम्मीदें जुड़ने लगे। “सिफ़र शेष” किस्सा गोई की दुनिया में कहानी संग्रह कही जा सकती है, शिक्षा के लिए साहित्य है, लेखक के लिए अरमान और बाज़ार के लिए उत्पाद। सब जगह इसकी मौजूदगी किसी विशेष इंसान की वजह से सम्भव हो पायी है।

आभार
समर्पण मम्मी जिसके सदके नाकाफ़ी है इश्क़ ऊषारानी

स्वप्न हर कोई अकेला ही देखता है, उन सपनों को सच कोई भी अकेले नहीं कर सकता। ये जिरह होती रहेगी कि किसने कितना किया होगा लेकिन शिल्प तभी पूरा होता है, जब सबके हाथ लगे, सबका मन लगे और उस शिल्प से सबकी उम्मीदें जुड़ने लगे। “सिफ़र शेष” किस्सा गोई की दुनिया में कहानी संग्रह कही जा सकती है, शिक्षा के लिए साहित्य है, लेखक के लिए अरमान और बाज़ार के लिए उत्पाद। सब जगह इसकी मौजूदगी किसी विशेष इंसान की वजह से सम्भव हो पायी है। जो असम्भव था वो ऊषारानी और राजाराम ने किया है। ग़रीबी के चंगुल से शिक्षा का हल लिए, मज़दूरी की बरछी और अरमानों की गुल्लक संजोए अपने सभी बच्चों को इस क़ाबिल बनाया कि हम भविष्य से कोई कामना कर सकें। हमराह ज्योत्स्ना ने न सिर्फ़ इस कथा संग्रह की बल्कि मेरे जीवन की ख़ामियों को भी ढूँढ के सुधारने की लगातार कोशिश की है। इस संग्रह में यदि फिर भी त्रुटियाँ बाकी रह गयीं है, तो हम दोनों की अध बनी को आप क्षमा करें। बहन, सखी निशा वर्मा ने इस संग्रह को शक्ल दी है। मुख्य पृष्ट का सुंदर चित्र आपका रंगाश्रम है। मित्र तपन पंडित ने हर उस बारीकी को नापा है, जिसे लेखक शिल्प मुग्ध वश देख ही नहीं पाता। आपके साथ अक्षर-अक्षर पढ़कर उसपर जिरह करने के बाद इस संग्रह को सम्पूर्ण गढ़ा गया है। निरंतर प्रेरणा देने वाले बड़े भाई डॉ॰ प्रशांत चौबे जी ने सिखाया कि कैसे दुनिया दारी, थका देने वाली रोजगारी, जो निरंतर चलती रहेगी, लेकिन ख़ुद से कुछ बेहतर करने का समय इसी दुनिया दारी की व्यस्तताओं से ही निकालना होगा। मित्र अश्वथ रामचन्द्रन ने इस पूरे संकलन को प्रदर्शित कर सकने की जोह में जिल्द को डिज़ाइन किया है। मित्र संतोष जी ने इस पूरी किताब को काग़ज़ी पुलिंदे में भरने का कठिन काम किया है। मेरे अनुज राजेंद्र वर्मा साथ हैं, इसलिए ही ये सब कुछ असम्भव सा भी सम्भव हो जाता है।छोटी बहन लेकिन बड़ी सखी रिशा वर्मा हर उस राही को फिर से चलने को प्रेरित करती हैं जो थक के रुकने लगा हो।पार्टनर इन क्राइम मयंक शर्मा ने इस पुस्तक को पाठक तक पहुँचाने का सेतु बनाया है। शिवम् शुक्ला ने इन कहानियों को पढ़ कर बताया है कि ये कहानियाँ पाठकों और पात्रों में क्या रिश्ता पिरोएँगी। मेघेश पल्लवी हमेशा ही मेरे शब्दों को आकार देने, उन्हें पिरोने में मेरी मदद करते हैं। कुंदन पांडे ने हमेशा लिखते रहने के लिए मुझे सर्वाधिक प्रेरित किया है। और भी कई मित्र हैं, जिन्होंने इस यक़ीन को मरने नहीं दिया कि जीवन में कुछ अपना गढ़ा हुआ इस दुनिया के लिए छोड़ जाना हैं। आवेश, यश, अजय, अभिषेक, रमेश, और भी बहुत से यार हैं, सबने ये विश्वास जताया कि निस्वार्थ लिखना समाज के लिए आवश्यक उपक्रम है। कल्पनाओं के अंतरिक्ष में क्या देखोगे? अगर देखने का हौंसला ही न बचे? अलख के शिशु मन ने वो शक्ति दी है कि मैं अपनी कल्पनाओं की गोताख़ोरी अनवरत जी सकूँगा।