J Rajaram

भूमिका

मैं लेखक नहीं हूँ, घुमक्कड़ हूँ। अपरिचित लोगों से बात करना और उनके लफ़्ज़ों से ज़्यादा उन्हें सुनना मेरे चरित्र का हिस्सा है। ये सभी कहानियाँ कल्पनाओं की ओट में लिखी हुई सच्ची कहानियाँ हैं। सच है, कि सच कल्पनाओं से भी अधिक नाटकीय होता है। इसलिए हर सच का सत्यापित साक्ष्य प्रस्तुत करना मेरे बस में नहीं था। न ही ऐसा करना मेरी इच्छाशक्ति बन पायी। हर कुछ जो हम महसूस करते हैं, उसका साक्ष्य नहीं दे सकते। मगर सिर्फ़ इसलिए जो कुछ महसूस किया उसको व्यक्त ही ना किया जाए ये तो ज़मीर से बेईमानी लगती है। ये जोखिम कि लोग नहीं मानेंगे से बड़ा ये जोखिम है कि जो बीती हो उसे बिसार दूँ।

भूमिका
मैं लेखक नहीं हूँ, घुमक्कड़ हूँ। अपरिचित लोगों से बात करना और उनके लफ़्ज़ों से ज़्यादा उन्हें सुनना मेरे चरित्र का हिस्सा है। ये सभी कहानियाँ कल्पनाओं की ओट में लिखी हुई सच्ची कहानियाँ हैं। सच है, कि सच कल्पनाओं से भी अधिक नाटकीय होता है। इसलिए हर सच का सत्यापित साक्ष्य प्रस्तुत करना मेरे बस में नहीं था। न ही ऐसा करना मेरी इच्छाशक्ति बन पायी। हर कुछ जो हम महसूस करते हैं, उसका साक्ष्य नहीं दे सकते। मगर सिर्फ़ इसलिए जो कुछ महसूस किया उसको व्यक्त ही ना किया जाए ये तो ज़मीर से बेईमानी लगती है। ये जोखिम कि लोग नहीं मानेंगे से बड़ा ये जोखिम है कि जो बीती हो उसे बिसार दूँ।
आवारगी, बढ़ती उम्र के साथ बेहद महँगी पड़ती जाती है। लेकिन शौक़ नफ़े-नुक़सान कहाँ देखता है। मेरी आँखों ने क्या देखा इसका आलम तो कुछ टूटा-फूटा लिख दिया है। लेकिन मेरे मन ने क्या महसूस किया है, वो आप महसूस कर पाए तो ही इस कोशिश को कामयाब कहा जा सकता है।
पहली कहानी है, एक ग़रीब के हौसले की, जिसने कोशिश की तो उसे पंख भी मिल गए। सबके साथ ऐसा नहीं होता। कइयों के साथ बहुत बुरा होता है। ज़्यादातर लोगों के साथ बुरा होता है। लेकिन बुरा ही होगा, ये सोच के जीवन बिताना क्या ही जीवन होगा? इस रिक्शे वाले से मैं सच में मिला हूँ। दुर्ग में ही मुलाक़ात हुई है। कहानी के नाटकीय रूप को छोड़ दें, तो उसकी बिटिया की पढ़ाई, उसकी कमाई का गुल्लक, सब कुछ ज्यों का त्यों सच है। अगर सच ना लगे तो मेरी लेखनी को ही दोष दीजिएगा।
दूसरी कहानी, ग़लती किसकी है? एक सवाल है। दो अलग-अलग लोगों की सच्ची दास्तान को एक क़िस्से में गुह दिया है। हर इंसान काला है, हर इंसान के सीने में दिल है। इंसान प्रेम, बेईमानी, न्याय, घमंड, करुणा, हवस, स्वार्थी और दानवीर जैसे हज़ारों-हज़ार इकाइयों को जोह के बना है। ये दुरुस्त तो है ही नहीं बल्कि उधरंगा है, इस अध बने इंसान ने आज एक तिलस्म जैसा भीमकाय साम्राज्य खड़ा किया है। इस साम्राज्य को बनाने, ध्वस्त करने और फिर बनाने में, इंसानों ने पीढ़ियाँ लगायीं हैं। ये साम्राज्य कैसे सतत इंसान के विरुद्ध खड़ा रहता है। कैसे इंसान थोड़ा-थोड़ा ग़लत होके ख़ुद इंसानियत की हत्या करने लगता है। ये कहानी इस सवाल की खोज बीन है।
तीसरी कहानी है “दो टूक”, ग़लती के पुतले इंसान की कई ग़लतियों में एक निरंतर स्थापित गलती यही है कि वो हर सवाल के जवाब को दो टूक में सुनना चाहता है। टीवी रिमोट से लेकर, कार की रिमोट चाभी तक उसे सब कुछ बाइनेरी जितना आसान चाहिए। उसे हाँ या न में ही सब कुछ सुनना है, जबकि इस हाँ या ना के बीच ही उसका जीवन शुरू और ख़त्म होता है। हाँ और ना के बीच ही तो है जीवन। पैदा होना हाँ है तो मरना ना है। इसके बीच जो कुछ होता है, उसकी गफ़लत है “दो टूक”।
मास्टर का प्रेम, मेरे दिल के क़रीब इसलिए है क्यूँ कि मैं ख़ुद एक मास्टर हूँ। हर पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को नकारा और बेकार साबित करने की होड़ में जीती है। मास्टरों के दड़बों में, यानी की स्टाफ़ रूम में, ये होड़ बिलकुल स्थापित रूप से पसरी रहती है। इसी बहस को मैंने जिया है। मैंने अपनी अगली पीढ़ी से बतौर शिक्षक बहुत सम्मान पाया है। हालाँकि इस सम्मान के तेवर कुछ और हैं! पढ़िएगा इस कहानी को।
यायावर, मलंग, बेफिक्र, बिना खूँटे का बैल ये सब उपमाएँ उस इंसान के लिए हैं जिसे दुनिया वैसी बिलकुल नहीं दिखती जैसा दुनिया वाले उसे दिखाना चाहते हैं। अलबत्ते जैसे दुनिया इस यायावरी में देखने को मिलती है, आग तो उसमें भी सुलग रही है। बस यही है कि सच के क़रीब जाने का मौक़ा मिलता है। सच को जानने की हिम्मत मिलती है। यायावर उस एक मुलाक़ात की कहानी है, जिस मुलाक़ात के बाद दुनिया के कई रंग हमेशा के लिए फीके हो गए।
कहानी "इश्क़ ही तो है”, इश्क़ को ऐडम और इव के रिश्ते से परे ले जाती है। नोच के खाने से लेकर मेज़ में नफ़ासत से खाने तक के सफ़र को भले ही संस्कृति का विकास कह लें। लेकिन इस संस्कारी शिष्टाचार के केंद्र में तो भूख ही है। भूख से तृप्ति की ओर होने वाली रोज़ की जद्दो-जहद में भूख के एक नए प्रतीक को अंकित किया है। नैसर्गिक मापदंडों से बाहर, एक और भूख है इंसान को, उस भूख को मैंने जैसा देखा है वैसा लिखा है।
“सिफ़र शेष” वो कहानी है, जिसकी वजह से इस संग्रह को एक किताब की शक्ल देने की इच्छा ज़ाहिर हुई थी। बचपन से लेकर आज तक उन सवालों से जूझ रहा हूँ, जिन सवालों से सामना तो रोज़ होता है। लेकिन कभी जवाब देने से बच जाता हूँ, कभी सवाल पूछने वाला ही विषय बदल देता है। ये सवाल का होना और न होना दोनो ही संतृप्ति पैदा नहीं करते। दोनो तरफ़ की खींच तान में शेष जो रहता है वो सिफ़र ही है।
जी हाँ, बस्तियाँ भी बूढ़ी होती हैं। इंसान हमेशा किसी नदी या झील के किनारे ही बसा है। पानी के स्त्रोत के आस-पास। जितने पुराने शहर या गाँव हैं, वो किसी ना किसी जल-स्त्रोत के पास ही हैं। लेकिन पिछली दो सदियों में, ये सिलसिला जाने लगा। धरती चीर के पानी निकाल लेने के यंत्र का अविष्कार होने के बाद से अब इंसान वहाँ बसते हैं जहाँ से व्यापारी मुनाफ़ा कमा ले, या मज़दूर अपनी मज़दूरी। व्यापारी मुनाफ़ा कमा के निकल जाता है, मज़दूर फिर भी कारख़ानों के कबाड़ में अपनी मज़दूरी ढूँढता रहता है। लेकिन धीरे-धीरे कारख़ानों की ओट में बसी ये मज़दूरों की बस्तियाँ भी बूढ़ी होने लगती हैं।
सबसे अधिक समय लगा है, निराधार को मूर्त रूप देने में। ये पूरे मायने में सच्ची तो बिलकुल नहीं है। लेकिन एक सवाल को उकेरने में जो भूमिका बनाई गयी है, वो किसी लिहाज़ से काल्पनिक तो बिलकुल नहीं है। कई घटनाओं को जोड़ा है, लेकिन इन सच्ची घटनाओं के ज़र्द में वो एक सवाल है। जब इतनी आसानी से बनी बनाई ये काग़ज़ी पहचान अगर खो जाए तो क्या होगा?
इस कथा माला “सिफ़र शेष” में क़िस्सा गोई के कई प्रयोग हुए हैं। सिवाय इसके कि ये सभी कहानियाँ प्रेरित हैं, इनके पात्रों को गढ़ने में इतनी ढील बरती गयी है ।इतनी ढील कि हर एक पाठक अपने हिसाब से पात्रों की कल्पना कर ले। कुछ और भी प्रयोग हैं, लेकिन अभी से भांडा फोड़ कर मैं प्लेसिबो इफ़ेक्ट का सत्यानाश नहीं करना चाहता।
अंत में एक गुज़ारिश, तवज्जो देना जितना ज़रूरी है, ये जताना की तवज्जो दी है उतना ही ज़रूरी है। इन कथा शिल्पों में इतनी गुंजाईश तो है पढ़ कर सवाल कौंध उठेंगे। उन सवालों का इंतज़ार रहेगा! इन सवलों को इस पते पर office@jrajaram.com लिखिएगा ज़रूर।