J Rajaram

यायावर

“ज़र्द रात की हर धुँध को कोहरा नहीं कहते” जब पापा ने कम्प्यूटर की कोचिंग लगवाई थी, कम ही सही लेकिन ये मुझे एहसास हुआ था कि फ़ीस के पैसे उनकी सैलेरी से ज़्यादा हैं। हर पल ये एहसास होता था कि जितने पैसे मेरी पढ़ाई में लग रहें हैं उतनी मेहनत नहीं कर रहा हूँ। जब कभी चार-चार घंटे तक कम्प्यूटर में गेम खेल जाता था, ये ख़याल और गहरा हो जाता कि जिस कोचिंग की फ़ीस इतनी ज़्यादा हैं, वहाँ वक़्त की बर्बादी किसी की मेहनत की कमाई का क़त्ल है। लेकिन आज भी ये समझ नहीं पाया कि अपराध बोध होते हुए भी अपराध करते जाना कैसी मानसिकता कहलाती है?

यायावर
“जब पापा ने कम्प्यूटर की कोचिंग लगवाई थी, कम ही सही लेकिन ये मुझे एहसास हुआ था कि फ़ीस के पैसे उनकी सैलेरी से ज़्यादा हैं। हर पल ये एहसास होता था कि जितने पैसे मेरी पढ़ाई में लग रहें हैं उतनी मेहनत नहीं कर रहा हूँ। जब कभी चार-चार घंटे तक कम्प्यूटर में गेम खेल जाता था, ये ख़याल और गहरा हो जाता कि जिस कोचिंग की फ़ीस इतनी ज़्यादा हैं, वहाँ वक़्त की बर्बादी किसी की मेहनत की कमाई का क़त्ल है। लेकिन आज भी ये समझ नहीं पाया कि अपराध बोध होते हुए भी अपराध करते जाना कैसी मानसिकता कहलाती है? ख़ूब पता है कि स्कूल फ़ीस, कम्प्यूटर फ़ीस और अन्य ट्यूशन फ़ीस देने के बाद घर में रोटी-दाल की नौबत आ जाती है, लेकिन फिर भी पापा से नाराज़गी इस बात की हैं उन्होंने मेरे लिए रेंजर साइकल नहीं ख़रीदी। मेरे और दोस्त जो साथ में कम्प्यूटर क्लास जाते हैं, उनके पास महँगी रेंजर साइकल हैं। वो लोग महँगे जींस और टी शर्ट्स पहनते हैं। वो दोनो बहुत अच्छे दोस्त हैं, वो मेरी हैसियत या जात को लेकर कोई भेदभाव नहीं रखते। बल्कि उनकी संगति ने ही मुझे अंग्रेज़ी बोलना, स्कूल ड्रेस को बेहद सलीक़े से पहनना और पढ़ाई कर के अच्छे नम्बर लाने की कला सिखायी है। ये कम्प्यूटर क्लास के लिए भी उन दोनों ने ही मेरे पापा से बात की थी। मुझे हेयर स्टाइल कैसी रखनी चाहिए, किस लहजे में बात करनी चाहिए, लड़कियाँ लड़कों में क्या नोटिस करती हैं। ये सब मुझे यही दोनो दोस्त बताते थे।
हम लोग फ़िज़िक्स और मैथ्स की कोचिंग भी साथ जाते थे। एक दोस्त के बड़े भाई एयरफ़ोर्स में फ़ाइटर पाइलट हैं। उनकी जर्सी और उनका रुतबा देख कर हम तीनों एनडीए की तैयारी में लग गए। भइया हमें एस॰एस॰बी की ट्रेनिंग भी देने लगे। क्या ग़ज़ब के दिन थे, कविताएँ लिखता था, कभी मंच पर नहीं पढ़ा लेकिन जो लोग भी पोयम कॉम्पटिशन में मेरी लिखी हुई पोयम गाते थे, वो ही अव्वल आते थे। एयरफ़ोर्स का बुख़ार सर चढ़ गया था, सपने में एफ-16, मिग-29, और सुखोई आते थे। अपाची, सी-हर्रीयर, ब्लैक-हॉक, बी-56 उस दशक के जितने लड़ाकू विमान थे, सबकी डिटेल निकाल रखी थी। वो भी तब, जब गूगल पैदा भी नहीं हुआ था। हम लोग अपनी उम्र की एक मात्र खेप होंगे, जिनका दिल किसी लड़की ने नहीं बल्कि एसएसबी ने तोड़ा था। पी॰ए॰बी॰टी (पाइलट एबटिट्यूड बैटरी टेस्ट) फ़ेल हो गया था। पूरे जीवन में एक बार ही ये टेस्ट लिया जाता है, कारगिल युद्द भारत जीत चुका था। और हम लोग अपना सपना हार गए थे। मेरे पापा ने मुझे पहली बार किसी हार के लिए मायूस होते देखा था।
अब याद करता हूँ, तो समझ पाता हूँ कि पापा इस बात से नाख़ुश तो थे कि मेरा सिलेक्शन एयरफ़ोर्स में नहीं हुआ, लेकिन कारगिल के युद्ध के बाद उन्होंने कभी नहीं कहा की फ़ौज के लिए अपनी तैयारी जारी रखूँ। पता नहीं, पिता होना क्या होता होगा। मुझे फ़ौज या वतन परस्ती का कोई जुनून नहीं था, लेकिन सुपरसॉनिक रफ़्तार से हवा में उड़ना, ये भला किसका ख़्वाब नहीं होगा? ख़ैर ख़्वाब टूट गया, वैसे भी ख़्वाब और कर भी क्या सकते हैं?
स्कूल ख़त्म होने के बाद, पापा ने पढ़ाई के लिए इंदौर जाने की परमिशन दे दी। हालाँकि मेरे जीवन में ख़ुशियाँ अकेले कभी नहीं आयी, हर आने वाली ख़ुशी अपने साथ शर्त लेकर आती है। इन दो-तीन सालों में पापा की सैलरी बढ़ गयी थी, उतनी ही जितना इंदौर में रहकर पढ़ाई करने में ख़र्च कर सकूँ। इस बार, मेहनत से पढ़ाई करना कोई विकल्प नहीं था, बल्कि एक मात्र गुंजाइश थी। लेकिन अपराध बोध के होते हुए भी अपराध करते जाने का हुनर शायद ही सबको नसीब होगा। दोस्तों ने कम्प्यूटर साइन्स चुना तो मैंने भी चुन लिया। अभी तक जीवन में जो कुछ भी अच्छा हुआ हैं, इन दोस्तों के फ़ैसलों से ही हुआ है। लेकिन, कम्प्यूटर को आज भी उतना ही जनता हूँ जितना एक स्टैनो किसी टाइपराइटर को जनता है।
इस अक्टूबर में पापा ने रेंजर साइकल दिला दी॰॰॰ साइकल की बेहद ख़ुशी थी लेकिन उस रोज़ अपने आप को हज़ार गालीयाँ दी थी। उस दिन के लिए, जब दो साल पहले कम्प्यूटर कोचिंग जाने के लिए मुझे रेंजर साइकल नहीं मिली थी, और पापा को उनकी ग़रीबी के लिए कोस रहा था। नीली साइकल, इंसान तो क्या जब किसी चीज़ से भी मोहब्बत करने लगते हो तो लोग आपकी निगाहें पढ़ लेते हैं। उमर तो किसी हसीन पे फ़िदा होने की थी, लेकिन जेट विमानों के रूठने के बाद मेरी दूसरी मोहब्बत ये साइकल थी। 
एक छोटे से टाउन में पला-बढ़ा जब इंदौर जैसे सघन शहर का बाशिंदा हो जाए तो यूँ मानो कि किसी तोते के पंख फड़फड़ाते ही उसे पिंजरे में डाल दिया हो। हर चौराहे में बरसती हुई गाड़ियों की लड़ी के ख़त्म होने के तुरंत बाद, चौराहे से अपनी साइकल निकाल लेना, ग़ज़ब का हुनर था। कॉलेज से हॉस्टल और हॉस्टल से कॉलेज एक साइकल में दो लोग आया-जाया करते थे। लेकिन साइकल को पूरी रफ़्तार से ना चला पाने कि खीज का बस एक ही इलाज था। रात के सन्नाटे में सुन-सान गलियों में बादशाह की तरह अकेले मँडराना। फ़िल्मी गानों की धुन की सीटी बजाते हुए, हैंडल छोड़ कर पंख की तरह हाथ फैला लेना और ढलान में बर्फ़ की तरह फिसलते जाना॰॰॰ किसी यायावर की परिंदगी में भी इतना रोमांच नहीं भरा होगा। किसी बादल से गिरी हुई पानी की बूँद की तरह, जिसे गिरना ही है, और बिखर ही जाना है। लेकिन बर्फ़ीले बादल से रिस के बूँद हो जाना और फिर गिरने से पहले सरगम की किसी एक हर्फ़ जितनी धुन सी खनक के बिखर जाना॰॰॰ और क्या हासिल हो सकेगा उस इंसान को जो भीड़ में भीड़ की तरह गुम है। जो अकेले में सन्नाटे की तरह पसरा हुआ है। जिसकी साइकल की चैन भी झींगुर से ज़्यादा तेज़ नहीं रीठती। 
इंदौर की रात मुग़लिया रुबाइयों में गायी जाती रही है। रजवाड़ा से लेकर सराफ़ा तक महकते पान, उबलती चाय और छनती मिठाइयाँ ज़ुबान को तैरने पर मजबूर कर देती हैं। कई और नए दोस्तों के साथ आज की रात सराफे में कट रही है। और आज लुत्फ़ लेने की बारी सिर्फ़ ज़ुबान की नहीं थी, आज तो निगाहों को भी अपने होने का सुकून हुआ होगा। हर नज़ारे में निगाह ठंडी और साँसें गर्म हो रही थी। अब से पहले इतनी सुंदरता मैंने सिर्फ़ टीवी में देखी थी। और इंदौर आने से पहले तक तो यही मानता था कि इतनी सुंदरता सिर्फ़ कैमरा ही दिखा सकता है। कोई इतना भी सुंदर नहीं होता होगा। आज पहली बार मिठाइयों की ख़ुशबू भी वो असर नहीं कर रही थी जितना नज़ारों में पसरी चकाचौंध ने मचा रखी थी। उस पर से साथियों की लफ़्फ़ाज़ियाँ, यदि हुस्न वाले हम दीवानों की आह सुन लें, तो ख़ुद को शीशे में निहारना भूल जाएँ। हाथ में मूँग का हलवा है, लेकिन नज़र अभी भी सड़क के दूसरे कोने में टक-टकी बांधे हुए है। तभी एक बेहद बूढ़ी सी महिला ने कोहनी पकड़ के इशारा किया। कोई रात में भी भीख माँगता है? ये सवाल मेरे ज़हन में पहली बार आया था। दोस्तों ने उसे डाँट के आगे जाने को कहा, वो बूढ़ी महिला जाने लगी। मैंने हलवे का दोना उसे दे दिया। साथियों ने बताया कि, ये भिखारी इसी तरह हमारी दया का फ़ायदा उठाते हैं। कोई दया से फ़ायदा कमा सकता है? ऐसा व्यापार भी मुझे आज ही पता चला। जवान हो रहीं वलगाएँ ऐंठ गयीं और ख़यालों की डोर किसी झोंके से किलफ कर औक़ात में उलझ गयी। एक दुकान में शुद्ध देशी घी की बहुत बड़ी सी एक जलेबी बिक रही थी। वो जलेबी इतनी बड़ी थी, हमारे गाँव का एक परिवार खा ले। उस बुढ़िया को देखते हुए जलेबी की तरफ़ नज़र दौड़ रही थी। मैंने भूख से मरते हुए लोगों को देखा है। देशी घी की इतनी बड़ी जलेबी मुझे किसी ज़ौहरी के ख़ज़ाने की तरह लग रही है। 
उस रात, देर तक साइकल चलाता रहा, आज किसी धुन में सीटी नहीं बज रही थी, आज झींगुर भी ख़ामोश थे। हवा सूखी बह रही थी, और साइकल की चैन भी आवाज़ नहीं कर रही थी। या शायद सब कुछ यथावत था, सिवाय मेरे अंदर ही कोई सवाल कौंध उठा है। एक बार ठहरे पानी को छेड़ देने के बाद वो पानी वापिस कब शांत होता है? इसका सही-सही आकलन आज तक किसी ने नहीं लगाया। जो लोग इंदौर से वाक़िफ़ हैं, उनके मन में गांधी-हाल के बाहर शिव-मंदिर में बैठे भिखारियों का नज़ारा महफ़ूज़ होगा। पहले तो उन भिखारियों को देर तक घूरता रहा। दूर से उन्हें देखे जा रहा था, अचानक सराफा में टकरायी हुई उस बूढ़ी औरत का नसीब मेरे ख़याल में कौंध गया है। जिन दिनों 1500 रुपए महीने के ख़र्च के लिए घर से पैसे आते हों, उन दिनों 100-100 रुपए की दो जलेबी लेकर आया और उन भिखारियों के पास उन्हीं के बिछौने में बैठ गया। शर्त रख दी, की जलेबी मुफ़्त में नहीं दूँगा, बीड़ी पिलाओगे तभी खाने को दूँगा। उस दिन से पहले, मैंने बीड़ी नहीं पी थी, लेकिन 200 रुपए की जलेबी मैंने भीख में दी है, इसका ख़याल भी मुँहे बेचैन करता रहेगा। इसलिए बीड़ी के बदले जलेबी का सौदा बढ़िया लगा। कम से कम ये सौदा मेरे लिए मुनाफ़े में सुकून की नींद बचा लेगा। वहाँ बैठे भिखारी पूरी ईमानदारी से जलेबी आपस में बाँट रहे थे, और मुझे बीड़ी का बंडल दे दिया था। एक बीड़ी जलाने के लिए, उन लोगों की टोली में बैठे एक भिखारी से मैंने कहा, की बीड़ी जला दो, उसने जला के मुझे दे दी, और ख़ुद भी पीने लगा। 
उसके सुनसान रवैए ने मुझे उकसा दिया। 
“यार तुम भिखारी तो नहीं लगते?” मैंने आख़िर पूछ ही लिया 
“किसने कहा भिखारी हूँ” फेफड़ों से धुआँ फेंकते हुए उसने जवाब दिया।
“अब व्यापारियों के साथ तो बैठे नहीं हो, कोई दिया लेके देख नहीं रहा। भिखारी नहीं हो तो यहाँ क्यूँ बैठे हो?” मैंने टॉंट मारते हुए तल्ख़ सवाल पूछ लिया। 
और कई बार उकसाने के बाद उसने आप बीती सुनाई। बताया कि वो पुलिस थाने में मुंशी था। रिटायर होने के बाद, बैतूल शहर में उसने एक पक्का मकान बनाया था। उसके दो बेटे हैं, और दो बहुएँ भी हैं। अपनी सारी पूँजी उसने बच्चों को दे दी है। 600 रुपए महीने पेंशन आती है, गुज़ारा तो क्या ही चलता। फिर उसने बताया की जब तक उसकी घरवाली ज़िंदा थी, वो उसको खाना खिलाती थी। रसोई में बहुएँ गालियाँ और रोटी दोनो परोस के देती थीं। उसकी लुगाई गालियाँ ख़ुद खा लेती थी, और रोटी अपने मर्द के लिए ले आती थी। फिर उसकी घरवाली चल बसी और रसोई से रोटी के साथ-साथ गाली भी सीधे मिलने लगी। फिर एक रोज़ मुंशी से ये सब बर्दाश्त नहीं हुआ और वो सीधे रेलवे स्टेशन जा कर एक रेलगाड़ी में बैठ गया। ट्रेन पूरा दिन और पूरी रात चलती रही, फिर किसी ने उसको बताया की आख़िरी स्टेशन आ गया है। मुंशी उतर गया और दुत्कारते-भटकते वो इस मंदिर तक आ गया, यहाँ उसे कोई नहीं डपटा है। यहाँ समोसा, रोटी अचार मिल जाता है, बिना गाली सुने हुए। वैसे भी दर्द तब होता है जब पराए रोटी दे और अपने गाली। यहाँ पराए रोटी दे जाते हैं, गाली देते हैं या नहीं, सुनायी ही नहीं देता। 
“हाथ पैर सलामत हैं, कोई काम धंधा ढूँढ लो यहाँ, रहो आराम से?” मैंने अपनी ऐंठन में ही उसे सुझाव दे मारा। 
“नहीं भाई, अब जीने की इच्छा नहीं है!” उसने दूसरी बीड़ी फूँकते हुए कहा। 
मैं उसको घूर रहा था, उस पर तरस आने के बजाए ग़ुस्सा आ रहा था। मैंने कहा

“तो फिर, ये पुल के नीचे रेल की पटरियाँ हैं, अभी थोड़ी देर में आती ट्रेन के नीचे कूद जाओ, मर जाओगे, सब आसान हो जाएगा!”

मुंशी धुआँ बाहर फूँकते हुए बोला “मरने की हिम्मत नहीं है।” 

उसके मुँह से निकलता हुआ धुआँ, रेलगाड़ी के इंजन से उगलता हुआ धुआँ और सीने में सुलगता हुआ धुआँ! मानो उस रात कोहरा पसरा ही नहीं था। हर तरफ़ सिर्फ़ धुआँ फैला हुआ था। उस धुएँ के एक छोर में जीने की इच्छा मर चुकी थी और दूसरे छोर में मरने की हिम्मत जुटाने की नाकाम कोशिश हो रही थी।
उस धुएँ में कई सवाल थे॰॰॰ 
कितने लोग होंगे दुनिया में जिन्हें जीने की इच्छा नहीं होगी और मरने की हिम्मत नहीं होगी? कितने लोग होंगे जिन्हें 100 रुपए की देशी घी से बनी जलेबी नसीब हुई होगी? जेट विमान उड़ाने के सपने देखने वाला आज साइकल से उड़ने पर मजबूर है। वही साइकल जिसे ना पाने की खीज में वो अपने पापा की ग़रीबी को कोस रहा था। मेरी सुकून की नींद में कई बार हमला हुआ है, लेकिन शायद उस रात वो पहला हमला था, जिस दिन मेरा बचपन मर गया था। किसी रोज़ बड़े होने के सपने देखने वाले बचपन को इसका बोध बहुत देर में होता है, कि बड़े होने की शर्त ही यही होती है। बचपन को मार दिया जाए।