J Rajaram

इश्क़ ही तो है

"हर रिश्ते की ज़र्दी में है रूमानियत? न कहो!
इश्क़ है ब-कद्र-ए-जर्फ़-ओ-आलिम? न कहो!” क्या नाम है आपका?” 
“कलश!” उसने कहा “और आपका?” पूछ भी लिया
“अमन” मैंने कहा अजनबी को दूर से घूर के देखा जा सकता है, लेकिन अजनबी से बातें होने लगे तो फिर बातों के दौरान देखना भी मुहाल हो जाता है। कलश जितनी ख़ूबसूरत है, अमन को यही लग रहा होगा कि इससे तो अच्छा था, के अजनबी ही रहते। कम से कम निहार तो सकते थे। 
अभी रात नौ बजे ही कनाट प्लेस में अमन और कलश की मुलाक़ात हुई है। अमन बैंगलोर से आया था, वो पिछले तीन साल से बैंगलोर की एक कम्पनी में कन्सल्टंट है। कोई कम्प्यूटर है, जो अंतरिक्ष में भेजे गए किसी विशेष यान की संचार व्यवस्था के दुरुस्त रहने की जानकारी धरती पर भेजता है।

इश्क़ ही तो है
“क्या नाम है आपका?” 
“कलश!” उसने कहा “और आपका?” पूछ भी लिया
“अमन” मैंने कहा अजनबी को दूर से घूर के देखा जा सकता है, लेकिन अजनबी से बातें होने लगे तो फिर बातों के दौरान देखना भी मुहाल हो जाता है। कलश जितनी ख़ूबसूरत है, अमन को यही लग रहा होगा कि इससे तो अच्छा था, के अजनबी ही रहते। कम से कम निहार तो सकते थे। 
अभी रात नौ बजे ही कनाट प्लेस में अमन और कलश की मुलाक़ात हुई है। अमन बैंगलोर से आया था, वो पिछले तीन साल से बैंगलोर की एक कम्पनी में कन्सल्टंट है। कोई कम्प्यूटर है, जो अंतरिक्ष में भेजे गए किसी विशेष यान की संचार व्यवस्था के दुरुस्त रहने की जानकारी धरती पर भेजता है। अमन की कम्पनी उस कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर के लिए सिम्यूलेशंस तैयार कर रही है। उसका दोस्त आरिफ़ एनिमेशन विडियो में माहिर है। उसने ही अमन को प्रेरित किया था दिल्ली आकर इस स्टार्टअप से मिलने के लिए। अमन विज्ञान के इतिहास का विद्यार्थी है, उसने फ़्रान्स से हिस्ट्री ऑफ़ साइन्स में डिग्री ली है। अभी नासा के डिस्कव्री यान की दुर्घटना पर पीएचडी कर रहा है। हर महीने दो महीने में अमन अमेरिका और भारत के बीच एक बार सफ़र कर ही लेता है। हालाँकि दिल्ली आना बिलकुल अचानक हुआ है। आरिफ़ का एक और दोस्त है, जो स्कूल के बच्चों के लिए अंतरिक्ष के रहस्य पर एक ऐनिमेटेड पाठ्यक्रम बनाना चाहता है। आरिफ़ और अमन दोनो उसी दोस्त से मिलने आए हैं।
दिल्ली पहुँचते ही एयरपोर्ट से लेकर इस को-वर्किंग ऑफ़िस तक में सत्यार्थ अपने स्टार्टअप के बारे में ही बताता रहा। अमन और आरिफ़ उसकी बातें ही सुनते रहे। ग़ज़ब का मोह होता है, अपने आइडिया से तब जा के इतना बड़ा जोखिम कोई ले पाता है। उसकी टीम के कुछ लोग आरिफ़ और अमन को प्रोडक्ट की वायर फ़्रेम समझा रहे थे। समर चाहता है, पूरा पाठ्यक्रम एक दिलचस्प कहानी से गुथा हो। उसका विश्वास है, ज्ञान को मनोरंजन के केंद्र में रखना चाहिए। इस पाठ्यक्रम में छात्र एक किरदार होंगे, वर्चूअल रीएलिटी की मदद से ये पाठ्यक्रम स्कूली बच्चों को अंतरिक्ष के दूसरे सौर्य मंडल, ग्रह और उपग्रह की सैर कराएगा। कहानी में किरदार हक़ीक़त के होंगे। कथानक रची जाएगी और अंतरिक्ष बिलकुल वैसा ही होगा जैसा विज्ञान ने अभी तक ज्ञात किया है। उत्सर्जन, विभाजन, जीवन की सम्भावना, विलोपन और मौसम सम्बन्धी कई जानकारी इस वी॰आर॰ एनिमेशन के माध्यम से बच्चों को पढ़ाया जाएगा। इस पाठ्यक्रम में पढ़ाई से लेकर परीक्षा तक सब कुछ बड़े कमाल के अन्दाज़ में नियोजित किया गया है।
सत्यार्थ कभी स्कूल नहीं गया, उसका बचपन कॉमिक्स और फ़िल्मों में ही बीता है। सत्यार्थ दुनिया को ये बताना चाहता है कि उसने फ़ॉर्मल एजुकेशन से किनारा क्यूँ कर लिया। आरिफ़ को सत्यार्थ की बात सही लगी, अमन फिर भी इस बात से सहमत नहीं था। उसके मुताबिक़ ये सर्वथा ग़लत है कि मौजूदा विधिवत शिक्षा देने वाले स्कूल नकारा हो चुके हैं। अमन मानता है कि भारत में हर बिकने वाली चीज़ के इतने ख़रीदार हैं कि कोई भी विक्रेता प्रतिस्पर्धा के असली मूल को समझता ही नहीं है। सकारात्मक प्रतिस्पर्धा बाज़ार में लगातार नए उपक्रम लाती है। प्रतिस्पर्धा से पूरी ही उत्पादन का और लोगों का विकास होता है। लेकिन भारत में लोग पुरानी चीज़ों को ख़रीदने में इतने व्यस्त हैं कि विक्रेता कोई नयी चीज़ लाना ही नहीं चाहते। इसलिए भारत में स्कूली शिक्षा इतनी पिछड़ी हुई है।
अमन के मुताबिक़, भारत के लोगों को दुनिया भर में कम जनसंख्या वाले देशों में भेज देना चाहिए, ताकि जनसंख्या का विन्यास संतुलित हो जाए। विकास की सबसे समुचित परिभाषा है, संसाधन और उपभोक्ता का संतुलन। हालाँकि अमन के इस विचार को उसके साथी ही ख़ारिज करते रहते हैं। ये एक ऐसा विषय है, जिसकी बहस जीतने की अमन को कोई जल्दी नहीं है। उसे अच्छा लगता है कि उसके साथी उसकी बात को नकार देते हैं। और वो नए सिरे से अपने विचार को गठित करने लगता है। 
पूरा दिन उस मीटिंग में ऐसी ही गुत्थम-गुत्थी होती रही। सत्यार्थ ने इस थकान भरी मीटिंग के बाद आज रात की मस्ती-की-पाठशाला में ऐश करने की गुज़ारिश की है। अमन को यहाँ से आगे का सफ़र दिल्ली से ही करना है, अभी अमेरिका वापिस जाने में समय है। इसलिए वो ये न्योता स्वीकार कर लेता है।
अमन इस बार गंगा उद्गम तक सफ़र करने की तैयारी से भारत आया है। दो दिन के बाद वो ऋषिक़ेश के लिए रवाना होगा, वहाँ से गोमुख तक अकेले ही सफ़र करना है। लेकिन अभी वो कनाट प्लेस पर है, आरिफ़ और सत्यार्थ के दूसरे साथी भी आए हुए हैं। कलश भी उनमें से एक है। 

*** 

"इंडिया में कोई नहीं रहता?” कलश ने पूछा
दोनो में आपसी परिचय का दौर जारी है, लेकिन धड़कनों का राग पढ़े तो तीरगी-ए-शब का होना अभी मुमकिन ही नहीं है।
“नहीं, मॉम फ़्रान्स में हैं और डैडी की फ़ैमिली मानचेस्टर में॰॰॰ नो वन फ़्रम डैडस साइड हैव एवर कॉंटैक्टेड अस आफ़्टर डैड लेफ़्ट अस इन पेरिस!” 
“ओह, आई एम सारी” कलश के माथे की शिकन शायद उसके पूरे बदन में एक मात्र सलवट बनी होगी। चमकदार आँखें और इतनी संजीदगी भरी फ़िक्र मानों कोई फ़रेब कसा जा रहा हो।     
कलश और सत्यार्थ बचपन के दोस्त हैं। दोनों ने आपस में इश्क़ होने की गुंजाइश रद्द कर दी है। सत्यार्थ के मुताबिक़ कलश विचार शून्य है, उसे अतीत से इतना प्यार है कि वो भविष्य की ओर झाँकना ही नहीं चाहती। कलश को सत्यार्थ की बहस ना करने की बहानेबाज़ी से परेशानी है। वो सब कुछ अपने मुताबिक़ चाहता है।
कलश की माने तो, अतीत ने भविष्य के होने को तय किया है। हम कहाँ जा रहे हैं, इसका पूर्व अनुमान लगाने के लिए ये जानना ज़रूरी है कि हम आए कहाँ से हैं। उसके मुताबिक़, मानवजाति किसी रिले रेस की तरह आगे बढ़ रही है। बीती हुई पीढ़ी ने मौजूदा पीढ़ी को बैटन थमाई है, ताकि मौजूदा पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को ये बैटन दे सके। इस तरह पूरे सफ़र का लेखा-जोखा धाराप्रवाह होता रहेगा। कलश का विचार है कि पूरी दुनिया के मानवों का मस्तिष्क एक ही है, लोग जीते-मरते रहेंगे। आपस में लड़ेंगे, नफ़रत करेंगे, इश्क़ करेंगे लेकिन अपनी जिज्ञासा को कभी ख़त्म नहीं होने देंगे। कलश कहती है कि ये तो तय है कि मानव जाती के मरने के बाद भी चेतना जीवित रहेगी, लेकिन क्या ये चेतना ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति के पहले का इतिहास जान पाएगी? इस सवाल का हल भी अतीत में ही मिलेगा, बिलकुल ऐसी जगह जहाँ इस हल के होने की कल्पना भी न की गयी हो।  
"किसी ने तुम्हें बताया की तुम्हारा नाम तुम पर बिल्कुल सूट करता है?” कलश ने अमन से कहा! 
“पूरा कहो॰॰॰” अमन ने रिक्वेस्ट किया, 
“यू आर सो साइलेंट॰॰॰” कह कर कलश हंसने लगी 
“ऐक्चूअली, नाम तो तुम्हारा मेल खाता है” ये वो क्षण था, जब अमन कलश की आँखों में देख रहा था “हर शुभ काम तुम्हारे साथ ही हो सकते हैं कलश” 
दोनो में शून्य काल गुज़रने लगा, कई सेकंड बाद दोनो झेंप कर एक दूसरे से अपनी नज़र हटा पाए। 
कलश वास्तव में अपने नाम के उलट थी। उसने धर्म को सभ्यता के प्रौढ़ काल की अनर्गल उपज की संज्ञा दी है। उसके मुताबिक़, जब समुदाय खेती करना और झोपड़ी बनाना सीख रहे थे तब धरती पर ऐसी हज़ारों मौसमी गतिविधियाँ हो रही थी, जो वैज्ञानिक मिमांशा के अभाव में समझी ही नहीं जा सकती थी। इसलिए सभ्यताओं ने ईश्वर और ईश्वर की सत्ता जैसी कल्पना का सृजन किया था। आरम्भिक दौर में धर्म, समुदाय के भीतर मानवीय सद्भाव को बनाए रखने के लिए आवश्यक थे। लेकिन विज्ञान काल में धर्म केवल संसाधन-प्रबंधन की कूटनीति से ज़्यादा कुछ भी नहीं है। कलश अपने नाम से बहुत प्यार करती है, लेकिन उसे किसी भी धार्मिक विचार से जोड़ना उसे बचकानी सी हरकत लगती है। हालाँकि अभी जो अमन ने कहा है, उसके कई और मायने हैं, सिवाय इसके कि उसे पूजन की सामग्री मात्र माना जाए। 
कलश धर्म को ख़राब नहीं मानती, लेकिन अतीत के साम्राज्यों ने धर्म की आड़ में जो बर्बरताएँ की हैं और जो विलासिता भोगी है, उससे वो खिन्न है। उसके मुताबिक़, आदिवासियों में प्रचलित प्रकृति की पूजा का भाव ही धर्म की श्रेष्ठतम ख़ूबी है। दुनिया के सारे आदिवासी समुदाय किसी पहाड़, किसी नदी या किसी पेड़ को अपना देवता मानते हैं। वो जंगली जानवरों को देवता का दूत मानते हैं। आज मात्र कोई तीन हज़ार आदिवासी समुदाय ही दुनिया भर में बचे हैं। उनमें से कोई सौ ही ऐसे आदिवासी समूह हैं, जो आज भी मुख्य धारा की मानव जाती से दूर बिना किसी सम्पर्क के रह रही हैं। कलश के शोध के मुताबिक़ ये सौ समुदाय भी प्रकृति की पूजा एक जैसे रिवाजों में करते हैं। 
कलश मानती है कि अतीत में कुछ समुदाय विज्ञान की खोज और भौतिक सुख की दिशा में चल पड़े होंगे। कुछ समुदाय ने तय किया होगा कि वो प्रकृति का अतिशय दोहन नहीं करेंगे। और कालांतर में प्रकृति की पूजा करने वाले विलुप्त होते गए होंगे और प्रकृति का भक्षण करने वाले, यानी की हम लोग, आज धरती पर एकाधिकार कर लिए हैं। हम लोग विकास के नाम पर धरती को ही नष्ट कर रहे हैं। अपने इस अपराध को ढकने के लिए ही हमने धर्म-सत्ता और सम्पदा की चकाचौंध ओढ़ रखी है।
कलश की ऐसी बातें सुनकर अमन बेहद विस्मय में हैं। वो कलश से कई मरतबे सहमत नहीं है। लेकिन फिर भी वो कलश की बातें सुनने का दीवाना होता जा रहा है। बाकी लोग शुरूर लेकर घर चले गए। आरिफ़ भी होटल चला गया है। अमन कलश के घर आया है, दोनो अभी भी स्कॉच और स्टफ़ में रमे जा रहें हैं। ऊपर से बातें हैं कि जैसे अभी तक दोनो को सुनने वाला ही कोई ना मिला हो। 
*** 
“मुझे नहीं पता धर्म और सत्ता और जाने क्या-क्या जो तुम कह रही हो उसका कोई ख़ास प्रभाव हुआ होगा” अमन एक ज़ोर का कश लेने के बाद फिर आगे बोला “जब तक हम सवाल करते रहेंगे, सृजन होते रहेंगे। और विज्ञान हमें हमारी कल्पनाओं के छोर तक ले जाएगा। फिर चाहे हमें इस ग्रह को छोड़ना पड़े या फिर सारे सौर्य मंडल को।” 
दोनो अलग-अलग विषय के विशेषज्ञ थे। दोनों अपनी-अपनी समझ से बात कर रहे थे। दोनो के बीच एक बात बिल्कुल मेल खा रही थी। कलश सभ्यताओं के इतिहास की शोधकर्ता थी और अमन विज्ञान के इतिहास का। वैसे दोनो के बीच में जो केमिस्ट्री बन रही थी, उसका इन दोनो के इतिहास से कोई लेना देना नहीं था। या था भी तो क्या पता?
फ़िलहाल जो जान पड़ता है, वो ये कि दोनो को अपनी जैसी बातें करने के लिए बहुत कम लोग मिलते हैं। अमन अपने शोध को लेकर व्यस्त रहता है, और उसके साथ काम करने वाले लोग मशीनी संवेदना से रचे हुए लगते हैं। ऐसा नहीं भी हो तो भी कभी वो वक़्त आया ही नहीं कि किसी से इतनी तिशनगी से बात की जाए। कुछ एक सम्बंध हुए भी तो कोई रात के या दो रात के। लेकिन कलश से हो रही एक-एक बात कई-कई ख़याल से घुल के आ रही है। 
विज्ञान और सभ्यता दोनो का जन्म एक साथ हुआ लेकिन जब तक विज्ञान सभ्यता पर निर्भर रहा, किसी एक व्यक्ति के मन में उमड़ रही हज़ार उत्सुकताओं और जिज्ञासाओं को पनपने ही नहीं दिया गया। सत्ता के चरमराने का डर विज्ञान को सूली पर ही लटकाए रखने पर आतुर था। कई हज़ार युद्ध हो जाने के उन्माद में विज्ञान हथियारों की होड़ में लगे सत्ताधीशों की वजह से आज़ाद हो पाया। विज्ञान हज़ारों हज़ार जंगों में दी गयी इंसानों की आहुतियों के बाद गिरिजाघरों और मंदिरों की कालजयी दीवारों से आज़ाद हो पाया।
तोप के दहानों से लेकर बंदूक़ की नलियों से सुलगता हुआ, बारूद कब इंजन के अंदर की धधकती आग और मिसाइलों को अंतरिक्ष में भेद गया, पता ही नहीं चला। आज चाँद से धरती को देख पाना और पृथ्वी के सबसे ऊपरी दालान में स्पेस स्टेशन बना लेने के बाद जब अमन जैसे खगोल शास्त्री सौर्य मंडल के बाहर जीवन तलाश रहें हैं, कलश जैसी विद्युषी आदिवासी समुदाय से धरती में जीवन बचाए रखने का जतन सीख रही है। क्या मिलन है। जैसे धरती और आकाश किसी दूर क्षितिज के आँचल में आ बसे हों। 

*** 
“गंगा उद्गम देखने जा रहा हूँ॰॰॰” अमन ने अब कलश को देर तक देखते रहने का साहस जुटा लिया था। वैसे अब दोनो इतने सहज हो गए थे कि आँखें खुल के बात कर रहीं थी। 
“क्यूँ, कोई ख़ास बात?” कलश ने पूछा 
“नानी ने बहुत क़िस्से सुनाए हैं॰॰॰ वो हमेशा कहती थी, मुझे एक बार गंगोत्री जाना चाहिए” अमन अपनी बात को समझाने में असहज हो रहा था। 
“ओ! रेलिजियस इशू?” कलश ने असहजता को खींच निकाला।
“नाह, मॉम से अक्सर नानी के बारे में बात करो तो वो भी गंगा का ज़िक्र ज़रूर करती हैं।” अमन इस तरह की बात के लिए बिलकुल तैयार नहीं था। “मुझे लगा कि अगर गंगोत्री जाया जाए तो मॉम को अच्छा लगेगा।” 
“लेट्स हुक अप देन!” और कलश ने ही वो बात कह दी, जिसके लिए अमन ने गंगोत्री का ज़िक्र छेड़ा था। अमन की असहजता अब उत्सुकता में बदल गयी। उसकी शक्ल देख के इंसान का अतीत में बंदर होने वाली बात सच लग रही थी। 
***   
अमन
ऋषिक़ेष तक सत्यार्थ, आरिफ़ और कुछ और दोस्त भी साथ आए थे। वहाँ देर रात पहुँचे थे। मैंने और कलश ने ट्रेकिंग का सारा इंतजाम कर लिया था। टीम बीएचपी के साथियों का शुक्रिया, ट्रेवेलोग लिखना शायद सबसे इल्म दार विधा है। हज़ारों हज़ार लोगों के ट्रैवल की दास्तान जोहे यह वेबसाइट एडवेंचर लवर्ज़ के लिए ग्रंथ है। तड़के सुबह से रिवर राफ़्टिंग में लग गए, सभी साथियों ने मुझे और कलश को अलग जगह ही दे दी थी। बिज़नेस की कहीं कोई बात नहीं हुई, पूरा दिन धमाचौकड़ी में गुज़रा। नदी की लहरों ने हमारे लिए अपनी बाहें खोल दी थी।हमारे राफ़्ट जिस तरह से गोते लगा रहे थे, जैसे प्रकृति अपनी गोद में पालना झूला रही हो। टैनिंग और घुटनों की खरोंच दिन भर तो पता नहीं चली लेकिन शाम को स्किन सूखने के बाद पेन किलर का सहारा लेना ही पड़ा। कलश और अमन एक ही टेंट में रुके, रम के साथ-साथ चटखारे दार बातें। 
कलश बिलकुल कलश की तरह गढ़ी हुई है। उसकी कमर का घुमाव बिलकुल पीतल की सुराही की तरह है। गोरे रंग में सोने की चमक, दूर बहती गंगा की कल-कल जैसी नशीली उसकी बातें। कलश की अंग्रेज़ी से सनी ज़ुबान में शुद्ध दिल्ली वाली हिंदी, फिर रह-रह कर किसी अंग्रेज़ी शब्द का हिंदी अनुवाद ढूँढना। मैंने कई बार कहा कि आई एम ओके विद इंग्लिश लेकिन कलश स्वभाव से अल्हड़ थी। उसने मुझसे हिंदी में ही बतियाने की ठान रखी थी, खुद को चैलेंज करने के उसके अपने ही दाँव-पेंच हैं। उसके होंठ दिनभर से पानी में रह कर और रसीले हो गए हैं। संतरे की फाँकों की तरह, रह-रह कर मेरा ध्यान उसकी बातों से हट कर उसकी ख़ूबसूरती की ओर झुक जाता। नम और खुली ज़ुल्फ़ें मुझे शायर बना डालेंगी शायद॰॰॰  

"किस मी इफ़ यू वॉंट टू” कलश अचानक अपनी बात रोक कर बोली। और मैं जैसे किसी नींद से अचानक जाग उठा। 
क़रीबन आधे मिनट तक हम दोनो ख़ामोश रहे। मन में हज़ारों ख़याल रवाइसें फूट रही थीं लेकिन फिर भी हम शांत एक दूसरे को घूरे जा रहे। मैंने कई बार चाहा कि कलश का इंविटेशन एक्सेप्ट कर लूँ। लेकिन वो इंविटेशन नहीं था। 
“वैसे तुम कैसे कह सकती हो कि आदिवासियों का तरीक़ा सही है? इसपर कैसे विश्वास हो कि धरती केवल उन ही के तरीक़ों से महफ़ूज़ रह सकती है?” मैं उसकी बातों का दीवाना था, मेरे विचार उससे बिलकुल अलग थे, लेकिन उसका पहलू मेरे लिए बिलकुल नया था। और मैं सच में जानना चाहता था। और ये भी कि कलश के उस किस वाले इंविटेशन से बस इस ख़ामोशी से भाग जाना ही जीत जाना है। मैंने बात को आगे बढ़ाया “आदिवासी इस ब्रम्हाण्ड के बारे में कुछ नहीं जानते, धरती कब तक टिकेगी? अगर इससे बाहर जाने का प्रयास ना हुआ तो मानव चेतना कैसे बच पाएगी?” 
“आदिवासी अज्ञान हैं ये मान लेना भी ख़ुद को बेवकूफ़ समझना हैं” उसने तुरंत जवाब दिया 
“मैंने ऐसा नहीं कहा, उनके पास अंतरिक्ष में जाने की कोई विधा है? क्या तुम्हें लगता है धरती अगले हज़ार साल भी टिक पाएगी? क्या अगले हज़ार सालों में आदिवासी कोई तरीक़ा निकाल पाएँगे?” मैं अब ये बहस जीतना चाहता था। 
“जल्दीबाज़ी में नतीजे तक मत जाओ अमन” जाने कहाँ से उसे मेरी मॉम का फ़ेवरेट डायलॉग मिल गया “अगर हम सभ्यता के सूरमा इतनी गंदगी नहीं कर रहे होते और डीएनए प्रिंट को डिस्टर्ब नहीं करते तो धरती शायद अभी लाखों वर्ष और जीवित रहती। सौर्य मंडल अभी पाँच अरब वर्षों तक रहेगा, धरती में जीवन एक हजार वर्ष में नष्ट होगा, तो वो सिर्फ़ मुख्य धारा की सभ्यता के कुकर्म से ही होगा। और फिर, अंतरिक्ष और चाँद तक जाने का सिर्फ़ ये एक तरीक़ा ही नहीं है। युद्ध के हथियार विकसित करने की होड़ में चाँद तक पहुँच जाना कोई करिश्माई काम नहीं है। इसके कई विकल्प हो सकते थे।” 
“भविष्य की धार, अतीत के आवेग से पनपती है। सभ्यता ने कई बार ख़ुद को संशोधित किया है। यूरोप में स्थापित युद्ध-विराम को देखो, हिटलर के बाद, हिरोशिमा और नागासाकी के बाद, शीत युद्ध के बाद, हमने विज्ञान का रूख भी मोड़ दिया है। सूचना क्रांति और दुनिया को एक नेटवर्क में पिरो देना, किसी युद्ध उन्मादी मानसिकता का आविष्कार नहीं हैं। अतीत में जो कुछ भी हुआ उसका होना, आज की प्रगति को सम्भव करने की दिशा में ही था। सहज शब्दों में इसे कोलेट्रल डैमेज कह लो, लेकिन इसका कोई विकल्प नहीं था”। मैं अपने ख़यालों के आवेग में बोलता ही जा रहा था। लेकिन कलश मुझे देखे जा रही थी।
बहुत देर बाद उसके मुस्कुराने के अन्दाज़ को समझ पाया। इससे पहले कि अपनी बातों को रोक कर पूछता कि क्यों हंस रही हो॰॰॰ उसके होठों ने मेरे होठों को ज़ब्त कर लिया। 
***      
कलश
मैं और अमन गंगोत्री पहुँच गए, रास्ते भर ढेरों बातें हुई। इतनी बातें मैंने अभी तक किसी के साथ नहीं की। अगले महीने तस्मानिया जाना हैं, वहाँ के जंगलों में अभी भी सात आदिवासी समुदाय हैं, जो मुख्य सभ्यता के लोगों से सम्पर्क में नहीं है। उनके मुताबिक़ ईश्वर सपनों में आकर हमें भविष्य में आने वाली विपदाओं से बचने का रास्ता बताते हैं। मेरी जिज्ञासा ये है कि कैसे दुनिया भर के सभी आदिवासी समुदाय एक जैसे तरीक़ों से प्रकृति की पूजा करते हैं? जो पिछले नब्बे हज़ार सालों में एक दूसरे से कभी सम्पर्क में नहीं आए, उनके जंगलों में रहने का तरीक़ा एक जैसा क्यूँ है? वनवासी जलवायु और मौसम की वजह से, ये सभी बेहद भिन्न हैं। लेकिन अपने अस्तित्व को बचाए रखने और प्राकृतिक आपदा से निपटने के तरीक़ों में ये सब बिल्कुल एक जैसे हैं। ये आत्मरक्षा में इतने कुशल हैं कि जब सुनामी में पूरा अंडमान निकोबार डूब गया था, तब भी निकोबारी समुदाय बचा रहा। ये कैसे सम्भव है? एक और बात जो आदिवासियों में सबसे उम्दा है, वो ये कि दुनिया के सभी आदिवासी समुदाय स्त्री को बराबर का दर्जा देते हैं। कई समुदाय तो स्त्री प्रधान हैं। मुख्य-धारा की मानव सभ्यता चाहे यूएस हो या अमीरात, ब्रिटेन हो या मिश्र कहीं भी स्त्री स्वावलंबी नहीं है। दुनिया के किसी भी धर्म में स्त्री को प्रधान नहीं माना गया है। बस प्रतीकवादी शक्तियाँ दी गयी हैं, जीसस क्राइस्ट को जन्म देने वाली कहीं मैरी तो कहीं मरियम, कहीं यशोदा तो कहीं कुंती, काली, दुर्गा, सती सब कुछ एक नियोजित प्रतीकवादी शक्ति जैसा है। लेकिन सत्ता की कमान हमेशा ही पुरुषों के पास रही है। 
नारी वादी नहीं हूँ। मुझे सुंदर दिखना और गेजेट्स रखना दोनों पसंद हैं। कोई क्रांतिकारी तो क़तई नहीं हूँ, लेकिन इतिहास पढ़ना मुझे बचपन से पसंद था। हर घटना की तह तक जाना ही विवेचना करने का सिद्धांत है। इतिहास से यही सीखा है कि सतही ज्ञान किसी भी क्षण आपको किबदंतियों या ईश्वरीय परम-सत्ता का अनुयायी बना देगा। हमेशा सवाल करते रहना चाहिए। मेरे इसी विश्वास ने मुझे सत्यार्थ से अलग कर दिया। सत्यार्थ मेरी बातों को मूढ़ समझता है। वो कभी स्कूल नहीं गया, वो समस्याओं से भागता है। मैंने कई बार उसे कहा है कि एक दिन किसी ना किसी समस्या का सामना तो करना पड़ेगा। वो दिन मजबूरी का दिन होगा या चुनौती का ये तय करने का समय आज है। लेकिन उसे मेरी बात बचकानी लगती हैं। बचपन से आज तक मैं और सत्यार्थ सिर्फ़ दूर होते आयें हैं। कभी बहुत क़रीब हुआ करते थे लेकिन फिर उसका मेरे सवाल करने से चिढ़ जाना मुझे अजीब लगता गया।
अमन मेरी बातों को तरजीह देता है, मुझसे सवाल करता है। मेरे जवाब पर विचार करता है, और फिर उन्हें ख़ारिज भी करता है। मुझे लगता है, किसी की बात को सही या ग़लत कहने से पहले उसे सुन लेना चाहिए। अमन से पहले मुझे कोई ऐसा इंसान नहीं मिला जो अपना पक्ष रखने की मोहलत देता हो। सत्यार्थ ये बात नहीं सीख पाया, ख़ैर क्या फ़र्क़ पड़ता है। 
“तुम सत्यार्थ से मिलने आए थे? या गंगोत्री का प्लान था?” मैंने अमन से पूछा 
“गंगोत्री कभी तो आना था, इस बार ही आना होगा ऐसा तय नहीं था। फिर सत्यार्थ से मिलने के लिए आरिफ़ ने बहुत समय से प्लान कर रखा था, सो इस बार थोड़ा एक्स्टेंडेड वेकेशन पे आ गया” अमन भारी साँसों में इतनी लम्बी बात कह गया। 
हम लोग गंगोत्री से भोज-बासा के लिए निकल चुके हैं। सीधी चढ़ाई है, ट्रेकिंग 14 किलोमीटर की है, मैंने पहले इतनी लम्बी ट्रैकिंग नहीं की है। अमन पिछले एक महीने से हाई आयरन और कैल्शियम डायट पर है। अचानक आयी हूँ, हालाँकि फिर भी चुस्ती में कोई कमी नहीं है। 
“क्या कर रहे हो तुम लोग? आई मीन, इफ़ आई केन आस्क?” सच में जानना चाहती थी। 
“सत्यार्थ एक वर्चूअल रीऐलिटी प्लेटफार्म बनाना चाहता है, जिसे स्कूल स्टूडेंट्स यूज कर सके सटीक और मनोरंजन भरी लर्निंग के लिए” अमन ने फिर कम शब्दों में पूरी बात कही। 
“सैंटी (सत्यार्थ) और स्कूल एजुकेशन?” अचरज में पड़ गयी। 
“हाँ, उसने बताया कि उसने पाँचवी में स्कूल छोड़ दिया था, कॉमिक्स और किताबें उसकी दुनिया थी। जब से उसने वर्चूअल रीऐलिटी को समझा है तब से वो स्कूल के थकाऊ पाठ्यक्रम को बच्चों की नज़र से दूर कर देना चाहता है” अमन ने सत्यार्थ के बारे में एक रहस्य खोल दिया। 
“मुझे लगा तुम और सैंटी दोस्त हो?” अमन ने मुझसे अचरज में पूछा
“हाँ दोस्त हैं, पर उसके स्कूल छोड़ने की बात पर हमारी अक्सर बहस हो जाती है” मैंने शायद खीज कर कह दिया।
पूरे रास्ते हम दोनो सैंटी के प्रोजेक्ट पर बात करते रहे। ये तो ग़ज़ब का आइडिया है। अगर ऐसी ही किसी टेक सिस्टम से हिस्ट्री एजुकेशन दी जाए तो? ये जान कर और ख़ुशी हुई कि सैंटी विचारशून्य नहीं है।   
अमन मुझसे लम्बा है, और ये बात मुझे नहीं पसंद। उसका आत्म-विश्वास मुझे बहुत प्रभावित करता है। वो मुझे बिल्कुल कमतर नहीं मानता। पूरी ट्रैकिंग में उसने एक बार भी मुझे सहारा देने या किसी तरह से ये जताने की कोशिश नहीं की कि मैं लड़की हूँ और वो लड़का है। इस बात ने मुझे अमन का दीवाना बना दिया है। 
रात दस बजे हम लोग भोज-वासा पहुँचे, अगली सुबह पौ फटने से पहले गोमुख के लिए निकलना है। हम लोग सूप पीकर एक ही स्लीपिंग बैग में सो गए। जिस्म की गरमी रूह तक गर्म कर देती है। आज अमन को समेट लेने का मन कर रहा है। इतनी थकान में देर तक लिप लॉक जैसे सोल रिजूविनेशन हो रहा हो। 
***
अमन
दोपहर 12 बजे तक भी गोमुख नहीं पहुँचे थे। ऊँची बर्फ़ीली पहाड़ियों से निकलती फुहार और सीधी चढ़ाई के बीच इतने संकरे रास्ते, चलना बेहद जोखिम भरा लग रहा था। पाँव के नीचे बर्फ़ है या पत्थर कह पाना मुश्किल है। सर में लगातार ऊँचाई नापने से आयी गर्मी और हलकी धूप का पसीना है और पैरों में बर्फ़ की सिहरन। धूप ने बर्फ़ की रोशनी को दूधिया कर दिया है। नज़ारा इतना ग़ज़ब है, जैसे सीने में साँस के साथ ये वादियाँ समा जाएँगी। हवा इतनी झीनी है कि ख़ूब साँस भरने के बाद भी ऑक्सिजन कम ही मिल पा रही है। लेकिन इतनी साफ़ हवा, शहर में तो मानों ज़हर घोला जा रहा हो। चाल बेहद धीमी और सांसें बेहद बेसुध होती जा रहीं थी। जितने लोग साथ में ट्रेकिंग कर रहे थे वो भी छोटी-छोटी टोलियों में बँटकर आगे पीछे हो गए थे। गोमुख की बर्फीली पहाड़ी दिखाई तो दे रही थी, ऐसे मानो दो पहाड़ी कूद के पहुँच जाएँगे, लेकिन सुबह से चलते-चलते मंज़िल अभी भी बिलकुल उतनी ही दूर लग रही थी।
मैं और कलश लगातार गोमुख को टक-टकि लगाए देख रहे थे। कुछ देर बाद कलश के होंठ खुले। शाम हो रही थी, गोमुख तक पहुँच पाना असम्भव था, टोली के गाइड ने वापिस जाने का निर्णय लिया, बेहद मायूसी हुई। कुछ रास्ते बड़े हसीन होते हैं पर शायद उनकी कोई मंज़िल नहीं होती। या शायद मंज़िल ही कुछ और होती है। कलश अभी भी गोमुख की तरफ़ पहाड़ियों को घूरे जा रही थी।
“तुमको पता है, अनंत तक फैले इस ब्रम्हाण्ड को जिसमें असंख्य तत्व और ऊर्जा मौजूद है, उस पूरे ब्रम्हाण्ड को अपनी जिज्ञासा में संजोने के लिए हम इंसानों के पास सिर्फ़ पाँच इंद्रियाँ हैं”। फिर कलश ने मेरी तरफ़ देखा और आगे कहा “जानते हो विज्ञान कहाँ भटक गया? इतनी अरबों-अरब चीज़ों को परखने के लिए सिर्फ़ पाँच इंद्रियाँ ही कैसे हो सकती है? विज्ञान को इस सवाल को तलाशना चाहिए। क्या पता ये नदी, ये पेड़ ये वादियाँ इन सबके पास कई लाख-करोड़ और इंद्रियाँ हों? इस ब्रम्हाण्ड से सम्पर्क करने के लिए, क्या पता आदिवासियों के पास कुछ अतिरिक्त इंद्रियाँ हों?” 
वो फिर गो मुख की तरफ़ देखने लगी 
“ब्रम्हाण्ड को देखने का तरीक़ा शायद मौजूदा विज्ञान से कहीं अधिक विकसित हैं। हम मुख्य-सभ्यता के लोग ये मानने को तैयार क्यों नहीं हैं कि हम भटक गए हैं?” 
कलश बोलती रही हम भटक गए हैं और मुझे लग रहा था कि हम हौसला हार चुके हैं। नहीं तो मंज़िल सामने है, बिलकुल सामने।
“भटक गए हैं या पस्त हो गए हैं?” मैंने सवाल किया, लेकिन कलश ने मेरा सवाल सुना ही नहीं। सो कुछ अपना ही बोलती गयी।
“ये पेड़, पेट भरने के लिए नहीं भटकते। हम स्तनधारी भटकते हैं। ये धरती पौधों का भरण पोषण करती है। क्या ये अचंभित नहीं करता? जिस पापी पेट के लिए हमने दुनिया को इतना बदल दिया है, पेड़ों ने तो कुछ भी नहीं किया।हम बोलने बात करने के लिए अरबों के संयंत्र बना रहे हैं, क्या पता इन पेड़ों की अभिव्यक्ति ही किसी विशेष इंद्री से होती हो? क्या पता इन पौधों की इंद्रियाँ हमसे अधिक विकसित हों? ” *** 
अमन
कलश की ये बातें आज भी याद आती हैं, उसके साथ बिताया हर पल याद आता है लेकिन धीरे धीरे उससे बातें करने का समय कम होता गया। मैं उस यात्रा के बाद यूएस वापिस आ गया। शुरू में ढेर सारी बातें होती थी, फ़ेसटाइम में सिर्फ़ हम दोनो के ही कॉल लॉग्ज़ होते थे।
लेकिन अब कई महीने हो गए, कलश से बात नहीं होती, पिछले कई महीनों से तो चैट भी नहीं हुई है। जब इंडिया से वापिस यूएस आया था तो मॉम को ढेर सारी पिक्स भेजीं थी। वो आज भी पूछती हैं कलश के बारे में। मुझे पता है, कलश से बात चीत धीरे-धीरे क्यूँ बंद हो गयी थी। वो हमारे रिश्ते को लेकर लगातार असहज हो रही थी।
मैंने सत्यार्थ के प्रोजेक्ट के लिए दूसरे विशेषज्ञों को पार्टनर के तौर पे पेश कर दिया, और अपनी पीएचडी पे काम करने लगा। 
कलश को ये बताना चाहिए था कि सत्यार्थ उसका सिर्फ़ बचपन का दोस्त ही नहीं था। हालाँकि मैंने भी उसे कब मौक़ा दिया? सत्यार्थ ही उसकी पसंद थी, बस ये जान पाना कि सैंटी भी जिज्ञासु चेतना रखता है, उस ख़याल को उकेर पाया जो उन दोनों ने एक दूसरे के लिए ख़ारिज कर दिया था।
आज लगभग एक साल बाद कलश का मेसेज आया है “सत्यार्थ और कलश अपने नए वेंचर को लॉंच करने वाले हैं।” इंडिया के सभी अख़बारों और स्टार्ट-अप न्यूज़ में ये ख़बर बनी हुई है। 
एक प्रमुख न्यूज़ वेबसाइट ने लिखा है “शिक्षा क्षेत्र में क्रांति॰॰॰ वर्चूअल रीएलिटी से जानेंगे मानव जाती के उदय से लेकर ब्रम्हाण्ड के क्षोर तक सब कुछ” 
इतिहास और भविष्य एक ही ऐप में? कलश और सत्यार्थ ही ऐसा कर सकते हैं।