J Rajaram

ग़लती किसकी है?

मुट्ठी भर सपने साथ लिए इस दुनिया में आए थे।
क्या कुछ देकर जाएँगे, जब खुली हथेली जाएँगे? विकासशील भारत को यदि आसमान से देखा जाए तो लगेगा कि यहाँ के शहर किसी मोटापे के मरीज की तरह फैलते जा रहे हैं, और गाँव किसी भूखे नंगे की तरह बिलबिलाते हुए सिकुड़ते जा रहे हैं| बाजार ने दोनों को बीमार कर दिया है| डाइबिटीज़ की तरह... शहरों में शुगर बेहद बढ़ गई है, गाँवों में इन्सुलिन बढ़ता ही जा रहा है|
इंदौर शहर भी बाकी सभी स्मार्ट शहरों जैसा ही बढ़ता जा रहा है| सड़कों को देख कर लगता है कि सबसे स्वस्थ शहर है| पिछली बार तो प्रतिस्पर्धा में अव्वल आया था, लेकिन भ्रष्टाचार भी किसी बैड कोलेस्ट्रोल की तरह चिपका ही जा रहा है|

ग़लती किसकी है?
“विकासशील भारत को यदि आसमान से देखा जाए तो लगेगा कि यहाँ के शहर किसी मोटापे के मरीज की तरह फैलते जा रहे हैं, और गाँव किसी भूखे नंगे की तरह बिलबिलाते हुए सिकुड़ते जा रहे हैं| बाजार ने दोनों को बीमार कर दिया है| डाइबिटीज़ की तरह... शहरों में शुगर बेहद बढ़ गई है, गाँवों में इन्सुलिन बढ़ता ही जा रहा है|
इंदौर शहर भी बाकी सभी स्मार्ट शहरों जैसा ही बढ़ता जा रहा है| सड़कों को देख कर लगता है कि सबसे स्वस्थ शहर है| पिछली बार तो प्रतिस्पर्धा में अव्वल आया था, लेकिन भ्रष्टाचार भी किसी बैड कोलेस्ट्रोल की तरह चिपका ही जा रहा है|
हाल ही में, इंदौर के आस-पास के लगभग ५० गांवों को शहर के नगर निगम ने निगल लिया है| अब ये गाँव भी शहर में समा चुके हैं| जिन गाँव में खेती कर के जीवन जीना भी मुहाल था, आज वहां ज़मीन बेच के महंगी कार और मोबाइल की खरीदी की जा रही है| बीते तीन दशकों से इसी प्रक्रिया को असली विकास का मॉडल बताया जाता रहा है|
ऐसे ही शहर में निगले जा चुके एक गाँव में एक बहुत ही बड़ी इमारत बनाई जा रही है| वो बिल्डिंग कोई शॉपिंग मॉल का रूप लेने वाली है| इतने बड़े शॉपिंग मॉल की शायद 1000 गाँवों के बाज़ार में जितना साल भर में धंधा नहीं हो पाता होगा उतना व्यापार तो वहां एक हफ्ते में हो जाएगा| मॉल के नीचे दबी जा रही उस ज़मीन ने, आज तक उतना अनाज नहीं उगला होगा, जितना सोना वो अगले दो चार साल में ही उगल देगी|
इस इमारत को बनाने के लिए बहुत से मजदूरों की ज़रूरत है| कंस्ट्रक्शन कंपनी रोज मजदूरों की भर्ती करने वाले ठेकेदार को धमकाती है कि अगर मजदूरों की आपूर्ति नहीं हुई तो ठेका रद्द कर दिया जाएगा| उत्तर प्रदेश का रहने वाला एक ठेकेदार, घर से अपनी पत्नी और तीन बच्चों को लेकर इंदौर भाग आया था| माँ-बाप को उसने चैलेंज दिया था कि जितना वो साल भर की खेती-बाड़ी से नहीं कमाते, उतना शहर में महीनों में कमा लेगा| एक मोबाइल और एक पुरानी मोटरसाइकिल लिए वो दिनभर अध बनी इमारतों के चक्कर काटता रहता है| कहीं से दो पैसे का धंधा मिल जाए तो वाह, नहीं तो उस दिन के पेट्रोल का पैसा भी बीवी को गुल्लक से निकाल के देना पड़ता है|
एक सीमेंट बेचने वाले दोस्त का एहसान है कि उसे इतने बड़े कंस्ट्रक्शन कंपनी ने मजदूरों की भर्ती का ठेका दिया है| उस एहसान के बदले हर भर्ती पे सीमेंट बेचने वाला कमीशन भी खायेगा| हालाँकि दलाली खाना भ्रष्टाचार नहीं है। इसलिए सीमेंट फ़ैक्टरी वाले की मेहनत की कमाई को कोसा नहीं जाना चाहिए| शाम को कांट्रेक्टर साहब घर पहुंचे तो बीवी ने बताया कि गाँव में विक्रम पुर वाली बुआ का देहांत हो गया है। उनके लड़के दुबई कमाते हैं, इसलिए समय पर नहीं आ पाएंगे। अंतिम संस्कार में कांट्रेक्टर साहब का पहुंचना ज़रूरी है|
कांट्रेक्टर साहेब परेशान हो उठे... कान और गर्दन पे पसीना आने लगा| बुआ जी ने ही उन्हें बारहवीं तक पढ़ाया है, उनके बड़े एहसान है कांट्रेक्टर साहब के परिवार पर| तैस खाकर जब घर से भागे थे, तो बुआ ने ही पैसों की मदद की थी, वो भी फूफाजी से छुपा के| लेकिन फ़िलहाल का दुःख ये है कि कॉन्ट्रैक्ट हाथ से निकल गया तो परिवार सड़क पे आ जाएगा। और किसी को मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे| साहब की पत्नी ने पहचान लिया कि पति को बुआ के देहांत के अलावा भी कोई दुःख है| शायद सात जनम तक साथ वाली बात सिर्फ़ कल्पना नहीं है| कांट्रेक्टर को भी अपनी पत्नी की सलाह पर पूरा भरोसा है| उसने डील रद्द होने वाली बात अपनी पत्नी को बताई|
बड़े गहन विचार के बाद पत्नी ने कमाल का जुगाड़ लगाया| अगर जुगाड़ के बारे में शोध किया जाए तो, यहाँ भी महिलाएँ पुरुषों से इक्कीस गिरेंगी|

कांट्रेक्टर ने तुरंत कंपनी के अफ़सर को फोन लगाया...
“अरविन्द सर!” फोन उठाते ही उसने बोला
“हाँ बोलो दिनेश भाई!” उधर से बड़ी इज़्ज़त से बात होती है|
“सर, कल ११ मजदूर नौकरी पे आ जाएंगे, मैं ने मनोज जी को नाम लिखा दिया है, और आज शाम को कानपुर निकल रहा हूँ, गाँव में अभी खेती का समय तो है नहीं, सो बहुत से मजदूर मिल जाएंगे!”

“हम्म, कब तक लौटोगे?”

“डेढ़ दिन तो जाने में लग जाएगा बाकी दो रोज लोगों को निकालने में लगेगा सर, पांच रोज की बात है| बाकी यहाँ के मजदूर सप्लाई करता रहूँगा सर!”
“ठीक है, फ़ोन चालू रखना|”

“फोन तो चालुए रहेगा ना सर, अब पूरा बिन्नस फोने पे तो होता है न!” दिनेश बाबू की ख़ुशी लौट आई थी|

फोन काटने के बाद ही बुआ के निधन का दुःख ठीक से हो पाया था, दिनेश बाबू को।
दिनेश कानपुर पहुँचते इससे पहले ही उन्होंने कम से कम बीस लड़कों को मज़दूरी के लिए फ़ोन लगा दिया था| बड़ा रसूख है उनका गाँव में| हर कोई कांट्रेक्टर थोड़े बन पता है| वो किसी की भी नौकरी एक फ़ोन पे लगा देते हैं, और ज़्यादा कोई उड़ा तो नौकरी से निकलवा भी देते हैं| हालाँकि कई लोग हैं जो उनको दलाल भी बोलते हैं। १२-१२ घंटे की नौकरी में सड़ी सी पगार मिलती है, बीच में इनका कमीशन तो कटता ही होगा| लेकिन भागती भूत की लंगोट भली| भूखे मरने से तो बेहतर कि कोई रोजगारी ही करे... फिर, दिनेश बाबू के संगे शहर जाओ, दो चार महिना साथे काम करो और फिर दूसरी नौकरी पकड़ लो| शहर में कौन सी कमी है नौकरी की...
विक्रम पुर में बुआ जी का अंतिम संस्कार होने के बाद गाँव के सारे लड़के दिनेश बाबू को घेर के बैठे थे|
“पाए लागी चाचा!” एक नौजवान उनकी टोली में आ के बैठ गया|
“कस बे, रमना कितना बड़ा आदमी बन गए बे!” दिनेश बाबू भी आशीर्वाद देते हुए बोले|
“चाचा, अब तो बियाओ भी हो गया है लड़के का।” दूसरे साथियों ने बताया|
“हाँ चाचा, अब रोज़ी-रोटी की चिंता रहती है... एक टुकड़ा खेती में तीनों भाई लगे रहते हैं रोज खट-पट होती है” निराशा में रामकरण बड़े आस में दिनेश बाबू से बतिया रहा था। “चाचा यहाँ रहेंगे तो दुखिया जाएंगे.. कुछो हो सके इंदौर में तो बताओ|”
“रमकरना, देर कर दिए भाई... 15 लोगन की ज़रूरत रही, हम वैसे ही 17 लोगन को कह दिए हैं।” दिनेश बाबू को बाजार का नियम पता है, भले अन्दर से कितने भी खाली रहो, बाहर बिलकुल ढोल की तरह बजना चाहिए। मोल-भाव तो हर क्रेता का अधिकार है भला।
“चचा देख लो बड़ी आस है आपसे।” रामकरण बड़ा जरूरतमंद लग रहा था|
“ह्म्म्म, कल बताते हैं... फ़ोन कर लेना हमको।” दिनेश बाबू बड़े दयालु हैं|
रामकरण पढ़ने में होशियार था| दिखने में भी किसी बाम्हन के घर का लगता था| गोरा, लम्बा, हृष्ट पुष्ट... लेकिन ग़रीबी ने पढ़ाई कब के छीन ली थी| हाँ, उस पढ़ाई से ये हुआ कि वो बाकी गाँव वालों की तरह नशाखोरी नहीं करता था| दाँत भी सुपारी न खाने से साफ़ और सुन्दर बचे हुए थे| नयी-नयी शादी हुई है| पत्नी का नाम कुसुम है, मोबाइल में देख-देख दोनों बड़ा रोमांटिक रहते है| दोनों के चर्चे बड़े फ़ेमस हैं| लेकिन रामकरण के आगे उसकी बीवी का कोई मज़ाक़ नहीं उड़ा सकता है| बहुत चाहता है अपनी बीवी को...
आज रामकरण परेशान है... दिनेश चाचा से शहर जाने की बात कर आया है, और बीवी को अभी संग में ले जाना भी ठीक नहीं लग रहा| बीवी को कैसे मनाएगा, इसी उधेड़-बुन में रोटी गले नहीं उतर रही|
कुसुम ने इशारे में कहा कि जल्दी खाओ, आज कुछ नया ज्ञान मिला है उसको मोबाइल से। कुसुम का रोमांटिक होना रामकरण को और दुखी कर रहा था|
गाँव में नए जोड़ो का बिछौना उसी छप्पर के नीचे होता है जहाँ गाय-बैल या भैंस बकरी बांधी जाती है| प्राईवेसी के लिए कोई अलग बेडरूम नहीं होता|
ऐसे में स्मार्टफ़ोन ने तो मनोरंजन के कई रास्ते खोल दिए हैं, नहीं तो अभी तक सारा रोमांस मवेशियों की आवाजों के माथे ही होता था| कुसुम ने रामकरण को बताया कि यूट्यूब में उसने वो तरीके देखे हैं जिससे गर्भ नहीं ठहरता| अमूमन ऐसी जानकारी से रामकरण उछल पड़ता है, लेकिन आज उसके मन में कुछ और चल रहा था| कुसुम को उसका ठंडा रिएक्शन बिलकुल अच्छा नहीं लगा... वो अपने नखरों पे आ गई। चुपचाप लेट के सोने का बहाना करने लगी। उसको अपनी इस ट्रिक पर पूरा भरोसा है। रमना अभी उससे लिपट के मनाने लगेगा| हुआ भी वैसा...
रमना पास आया और गंभीर स्वर में बोलते हुए कुसुम से लिपट गया|
“सुनो, एक ज़रूरी बात है!”
“रखे रहो अपनी ज़रूरी बात, हमें नींद आ रही है।” रमना के मन से बेख़बर कुसुम ने उसे पीछे धकेल दिया।
“अरे... ये क्या है?” रमना सच में गुस्सा हो गया है| लेकिन फिर भी बात करना ज़रूरी है| “सुनो, वो खाग़ा वाले दिनेश चाचा हैं ना इंदौर से?”
कुसुम को अब लगा कि कोई जरुरी बात है| वो रमना की तरफ पलटते हुए बोली... “नहीं जानती, कौन हैं?”
“वो छोड़ो, तुम कहती थी ना कि कमाई के लिए खेती के अलावा भी कुछ करना पड़ेगा?” रमना की तकलीफ़ कुछ हल्की हो रही थी लेकिन दिल अभी भी कोसों भागने जितना धड़क रहा था|
“शहर नहीं जाना है ना....” ये कह के कुसुम रमना से लिपट के रोने लगी| कुसुम अभी भी यही समझ रही थी कि उसको भी रमना के साथ इंदौर जाना पड़ेगा| असली धमक तो अभी बाकी थी|
“वही सोच रहा हूँ। पहले चला जाता हूँ, फिर कुछ महीने बाद सारा इंतज़ाम कर के तुमको भी ले जाऊंगा।” सब कुछ संभल जाए इस उम्मीद में रमना ने अपनी बात रखी|
“खेत छोड़ के जाओगे तो यहाँ कुछ नहीं बचेगा। जेठ जी सब बेच के दारू पी लेंगे ।और बप्पा को बस तुम्हारा ही सहारा है, ऐसे में गाँव छोड़ने की सोचोगे तो सब लुट जाएगा और हाथ कुछ नहीं आएगा।” कुसुम इतना संजीदगी से सोचती है देख कर रमना आश्चर्य में पड़ गया|
“तो का करें, लड़का बच्चा होंगे तो उनको भी यहीं दड़बे में भर देंगे... मोबाइल में देख के तो बड़ा फ़ैमिली प्लानिंग का बात करती हो| पैसा कहाँ से कमाएंगे? नहर सूख गई है, बिजली महंगी हो गयी, सिंचाई का पानी महंगा हो गया है| मंडी में लूट मार मची है ऊपर से दुई बीघा में तीन फ़ैमिली पलेगा का...?” रमना सब भरभरा के बोल डाला| शादी के बाद ये पहली रात थी जब उनके बीच रोमांटिक बाते नहीं हो रही थी|
“तो क्या अभिये जाना है?” कुसुम ने हार मान ली, और रमना ने भी सोचा कि काश कल दिनेश चाचा मना कर दें कि अभी कोई जगह नहीं बची है|
***
“चाची आज नाराज थी क्या?” रमना ने पूछा..
दिनेश बाबू ने सिगरेट खींचते हुए बोला “नहीं, उसको भी बहुत काम हो जाता है| इतने लोग हैं गाँव से, बच्चे भी हैं...”
“चाचा हम सोच रहे थे कि हम सब लोग साईट पे रहने का इंतज़ाम कर लेते हैं| कुछ खाना बनाने का इंतज़ाम भी कर लेंगे..”
“सालों! वहां रहोगे तो २४ घंटे की ग़ुलामी हो जाएगी... सेठों की कमीनगी से वाक़िफ़ नहीं हो तुम लोग| सिक्योरिटी गार्ड भी बन जाओगे और दारू के लिए चखना बर्फ़ का इंतज़ाम भी करते फिरोगे।” चाचा ने तजुर्बा बता के दिल जीत लिया|
“लेकिन चाची...”
“इस महीने की पगार से पास के गाँव में रहने का इंतज़ाम कर लेना।” चाचा की सिगरेट ख़त्म हो गई और वो फूंकते हुए बोले “खाना पकाना तो आता हैं ना?”
“वो सब तो सीख लेंगे चाचा... ई ससुरी मशीन चलाना भी कहाँ आती थी...” दोनों हंसने लगे। फिर रमना गंभीर होकर पूछा “चाचा, ये सोना बहुते महंगा होता है का?”
“तुम साले, मजदूर की पूँछ.... सोना का क्या करोगे बे?” चाचा और रमना घर लौट रहे थे|
“कुसुम के लिए मंगलसूत्र लेना है, चाचा दिवाली में जाने से पहले... यही वादे पे आने को मिला है इंदौर!” शरमाते हुए रमना ने कहा|
दोनों ने एक दुसरे को देखा और मुस्कुराते हुए घर के अन्दर चले गए|
रमना ने पहले खाना कभी नहीं बनाया था| खेती की मज़दूरी और सीमेंट ट्रॉली को ऑपरेट करने में बहुत फर्क था| खाने पीने का कोई ठिकाना नहीं, गाँव में आमदनी कहाँ थी लेकिन रोटी का सुकून था। यहाँ बस एक ही ख़ुशी थी कि महीने के आखिर में वेतन बढ़िया मिल जाता था| मोबाइल से पैसे कुसुम के पास भेजना भी आसान था| लेकिन इश्क की जुदाई और खाली पेट रात को सोने नहीं देते थे| दिनभर कि थकान के बाद छाँव भरा कोई आँचल नहीं था| तिस पर भी रामकरण बड़ी मेहनत से काम करता और इसी आस पे टिका रहता कि पगार मिलेगी और वो दिवाली में घर जाएगा। फिर कुसुम को लेकर आएगा और मज़दूरी छोड़ के कोई चाय-समोसे का ठेला लगा लेगा| सारे पैसे घर भेज देता था| थोड़े से राशन और कमरे के किराए भर के लिए पास रखता था पैसे| साईट और कमरे के अलावा वो कहीं भी नहीं जाता था| साथ के लोग सिनेमा भी जाते थे लेकिन उसके लिए कुसुम के बिना कहीं जाना बेकार ही लगता था|
एक रात जब सीमेंट की बोरियाँ ट्रक से खाली कराई जा रहीं थी, तो कुछ पुलिस वाले आए थे| साईट मैनेजर से भारी बहस हुई थी, उस दिन पुलिस वालों की| यूँ तो पालिका की जीप अक्सर साईट पे आती थी लेकिन वो लोग साईट मैनेजर के साथ दारू पीते थे और बोटी खाते हुए पत्ते खेला करते थे| पर उस दिन सभी मजदूरों को पुलिस वालों का वो रवैया बहुत अजीब लगा था| सुगबुगाहट में ये खबर भी कान में पड़ी की साईट पर कोई मुकदमा चल रहा है| कुछ मजदूर जो आस पास के गाँव के थे वो काम छोड़ कर चले गए थे| बचे हुए मजदूरों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा था| कांट्रेक्टर साहब से पूछने पर यही आश्वासन मिलता कि सब ठीक हो जाएगा| मजदूरों के बीच बड़ी इज़्ज़त थी उनकी, उनके कहे पर ही सभी को भरोसा होता था|
एक दिन साईट मैनेजर और कांट्रेक्टर साहब के बीच भी बहुत बहस हुई थी| उस दिन तो उत्तर प्रदेश से आये सभी मजदूर रात भर चिंता में जागते रहे थे| कांट्रेक्टर साहब के चेहरे में भी तनाव बना रहता था। लेकिन कुछ भी पूछने पर वो गर्मजोशी से आश्वासन देते थे| और सब मजदूर जान लगा के काम में भिड़ जाते थे| इस बार वेतन का दिन निकले एक सप्ताह हो गया था|
कुसुम ने भी एक दो बार पूछ लिया था कि सब ख़ैरियत तो है| दिनेश चाचा ने बताया है कि सब ठीक है चिंता की कोई बात नहीं है| जो मजदूर बीच में काम छोड़ कर गए है न, वो पूरा वेतन मांग रहे है इसलिए वेतन में देरी हो रही है| ये बात किसी के गले नहीं उतर रही थी लेकिन चाचा जी कभी लड़कों का बुरा नहीं चाहेंगे इस बात में सबको भरोसा था|
वेतन का समय एक महीने से ज्यादा गुज़र गया था| किराने वाला भी उधार देने में नखरे कर रहा था, और कमरे का किराया भी चढ़ा हुआ था| इस बार सीमेंट की नयी खेप नहीं आई थी। काम लगभग बंद ही हो रहा था| अब सबको किसी बुरी खबर के आने का अंदेशा पुख़्ता हो चला था|
नवरात आ गयी थी, इंदौर में गरबा खेलने का रिवाज पूरे देश में मशहूर है| सो दिनेश चाचा सबको गरबा दिखाने के लिए एक साथ इंदौर शहर ले गए थे| हर चौराहों पर सजी-धजी लड़कियां डांडिया खेल रही थी| बेहद भव्य नज़ारा था| लेकिन बिना वेतन जी रहे लोगों का जी किसी भी भव्यता पे नहीं टिक रहा था|
रमना अपनी कुसुम के सामने खाली हाथ जाने की बात सोच भी नहीं पा रहा था| लेकिन उसके साथी जो डांडिया खेल रहीं लड़कियों को भी टेढ़ी निगाह से देख के आहें भरने लगते थे, उनसे रमना ने अपनी मन की बात कभी नहीं बताई थी| मजदूर था लेकिन अपनी कुसुम की शान में गुस्ताखी उसे बिलकुल नागवार थी|
उस रात दिनेश चाचा ने मजदूरों के मकान में रुक कर शराब पी थी और बड़ी देर रात घर गए थे| उनकी परेशानी देख कर सब और परेशान हो गए थे| लेकिन सब एक दुसरे को यही कह रहे थे कि सब ठीक हो जाएगा|
देर रात कांट्रेक्टर साहब घर पहुँचे तो बच्चे सो गए थे। और वो अपनी पत्नी की गोद में सर छुपा के रोने लगे| माँ के आँचल के बाद बीवी के आँचल में ही जी भर रो पाने की हिम्मत हो पाती है| बहुत देर रोने के बाद, कांट्रेक्टर साहेब ने बताया कि अदालत ने साईट पर स्टे लगा दिया है| दलील ये है कि इमारत गैर कानूनी है| कंपनी के मालिक ने सभी मजदूरों की एक महीने की कमाई कांट्रेक्टर को दी है और कहा है कि सब को घर जाने का कह दो| दिवाली के बाद काम होगा तभी बुलाया जाएगा|
“मेरी क्या इज़्ज़त रह जाएगी गाँव में?” कह कर दिनेश बाबू फिर रोने लगे|
“दशहरे तक रुक जाओ, कुछ मजदूर परेशान हो कर चले जाएँगे| फिर अपने गाँव वालों को यहाँ घर बुला कर, जितना भी बंदोबस्त कर सको कर के सब को गाँव भेज देना|” इतना कह कर दिनेश की पत्नी रोने लगी|
“अपने घर में भी तो दिवाली है, इस बार बच्चों के लिए क्या करेंगे?” दिनेश को खबर थी कि अगला कोई काम मिलने कि सम्भावना अभी बेहद कम है| ऐसे में कुछ पैसे अभी से दबा के रखना ज़रूरी है|
लाचारी ने लालच को जन्म दे दिया था| दिनेश उस रात यही सोचते हुए सो गए कि पैसों का बंदोबस्त होते ही गाँव वालों का हक ज़रूर पटाएंगे| आज रात नींद में खर्राटों से ज्यादा सिसकियाँ गूँज रही थी|
अगले दिन दिनेश बाबू साईट पहुंचे तो नज़ारा गंभीर था| मजदूरों ने साईट मैनेजर और कुछ स्टाफ को आफिस के अन्दर बंद कर दिया था| और धमकी दे डाली थी कि अगर पगार नहीं मिली तो सबकी बहुत पिटाई की जाएगी| अन्दर बंद सभी लोगों के मोबाइल मजदूरों ने छीन लिए थे और टेलीफ़ोन की लाइन काट दी थी| नज़ारा देख कर दिनेश बेहद घबरा गया| उसकी चिंता ये भी थी के ये गाँव के लड़के कहीं उल्टा सीधा कर बैठे तो ये गाँव सही सलामत नहीं जा पाएँगे|
उसने सीधे कंपनी के बड़े मैनेजर अरविन्द जी को फ़ोन लगाया और गुजारिश की कि कुछ और पैसों का इंतज़ाम हो जाये ताकि मजदूरों को कुछ और पैसे देकर मामला निपटाया जाये| फ़ोन रखते ही, दिनेश मजदूरों के पास गए और घोषणा कर दी कि सेठ ने पूरी पगार की मंज़ूरी दे दी है और थोड़े ही देर में सबको पूरा वेतन दे दिया जाएगा|
एक मजदूर ने अन्दर बंद लोगों के लिए चाय पानी का इंतज़ाम कर दिया और इस बात पे सुलह हो गयी कि पैसे आते ही वो सबको छोड़ देंगे| सब कुछ राजी ख़ुशी से ही निपट रहा था कि अचानक पुलिस फ़ोर्स की वेन साईट की तरफ आती हुई दिखाई दी| मजदूरों में अफरा तफ़री मच गयी... कुछ लोग आफिस के अन्दर पत्थर बरसाने लगे और साईट के भीतर भाग कर छुपने लगे| पुलिस ने आते ही लाठी भांजना शुरू कर दिया| सबको ढूंढ -ढूँढ के निकाल रहे थे और निर्दयी होकर पीट रहे थे| दिनेश बाबू की भी पिटाई हो गयी लेकिन फिर वो आफिस वालों के साथ अन्दर चले गए|
रमना ने कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया था, उसका कभी भी किसी से भी कोई झगड़ा नहीं हुआ था| घर में कभी पिताजी ने एक थप्पड़ भी नहीं मारा था| घर में सबसे छोटा था रमना, सबका दुलारा था| पुलिस उसे क्यूँ मार रही थी इसका उसे भी कोई भान नहीं था| जैसे तैसे वो भागते हुए बाईपास रोड तक आ गया था| उसने भागने में पूरी जान झोंक दी थी| दो दिन से भूखा रामकरण, किसी चीते की तरह भाग रहा था| पीछे पलट के देखने की हिम्मत नहीं थी| बहुत देर तक भागते हुए जब उसे यकीन हो गया कि पीछे कोई नहीं है तब जा के उसकी साँसें उखड़ने लगी|
दौड़ने जैसे अंदाज में चलते हुए रामकरण अपने आंसू पोंछ रहा था और अपनी किस्मत को कोस रहा था| इस पूरी आपा-धापी में कुसुम उसके ज़हन में लगातार उसकी चिंता में रोये जा रही थी| पागलों की तरह वो अपने आंसू पोंछता हुआ बड़बडाए जा रहा था “कुसुम चुप हो जाओ, कुसुम मत रो”|
डर और भूख से उसका बदन काँप रहा था, और वो बाईपास रोड पे चले जा रहा था| ना उसे दिशा का होश था ना कहीं जाने का ठिकाना| जेब में एक रूपया भी नहीं था, एक कमीज जो फट गई थी और एक पेंट जिसमें लाठियों के निशान अभी भी झलक रहे थे| उसकी हालत किसी भटकते पागल से कम नहीं थी|
जैसे-जैसे रामकरण का डर घट रहा था वो आस पास के लोगों को देख रहा था| लोग उसे देख रहे थे| अपनी महँगी-महँगी कारों से उतर कर लोग जैसे स्वर्ग से उतर कर आयें हों| ये भुट्टे की दुकानें जैसे स्वर्ग लोक का बाजार हो| इतने सुन्दर, इतने खुश लोग जैसे ईश्वर ने सिर्फ इनके लिए ही दुनिया को बनाया होगा। रामकरण जैसे लोग गलती से इस दुनिया में पैदा हो गए होंगे|
नव-विवाहित जोड़ों को देख कर रमना को कुसुम फिर याद आने लगी, फिर याद आया वो वादा कि कुसुम के लिए मंगलसूत्र लेकर जाना है| इतनी बेइज़्ज़ती के बाद रमना कुसुम के सामने शर्मिंदा नहीं होना चाहता था| वो धीरे-धीरे एक कार की तरफ बढ़ने लगा| कार के अन्दर एक सुन्दर सी लड़की मशगूल सी बैठी थी, उसके गले में मंगलसूत्र था|
एक झटके मे उसने लड़की के गले का मंगलसूत्र खींच लिया| खींचते वक़्त रमना को दो बार झटका लगाना पड़ा लेकिन मंगलसूत्र हाथ में आ गया| एक बार फिर, रमना भागने के लिए जी जान लगा चुका था| इस बार भागने का इरादा जान बचाना नहीं था| इस बार वो सिर्फ इस मंगलसूत्र को लेकर अपने गाँव जाना चाहता था| उसे रास्ते का कोई होश नहीं था| बस इतना पता था की स्टेशन शहर की तरफ है और उसे स्टेशन तक भागते हुए जाना है| हाथ में मंगलसूत्र दबाये, रमना सिर्फ भाग रहा था| चप्पल टूट गयी थी, वो सिर्फ भागता जा रहा था| इस बार फिर वो रोने लगा, इस बार उसके ज़हन में कुसुम नहीं थी, इस बार वो लड़की ख्याल में थी जो दर्द से चीख़ रही थी| रमना भी चीख़-चीख़ के रोने लगा| वो इसलिए चीख़ रहा था ताकि वो उस लड़की की चीख़ों की आवाज को भुला सके| हर कदम पे शहर नज़दीक आ रहा था, लोगों की नजरों में उसे एक चोर दिखाई देने लगा| अब उसे अपने कुकर्म पे रोना आ रहा था| क्या इसी दिन के लिए उसके माँ बाप ने उसका नाम राम-करण रखा था| जिस इन्सान ने आज तक बाग से आम का फल नहीं चुराया था, वो आज इतना घोर पाप कर बैठा था?
क्या इसीलिए शहर में इंसानियत नहीं है? गाँव में कभी किसी के दो पैसे लेने का भी ख्याल नहीं आया, यहाँ इतनी बड़ी लूट? रमना अब शांत हो गया था, वो लोगों से स्टेशन का रास्ता पूछ रहा था| गाड़ी का समय हो चला है| जेब खाली थी वो टिकट लिए बिना सीधे थर्ड क्लास में गया और बाथरूम में घुस कर अन्दर से दरवाजा बंद कर लिया| ट्रेन धीरे-धीरे पूरी रफ़्तार में चलने लगी| रमना अब भी शीशे से दूर अपने से नफरत करने की कोशिश में आँखें मूंदे दरवाजे से सट के खड़ा था| अब तो उसे रोना भी नहीं आ रहा था| उसने धीरे से अपनी जेब से उस मंगलसूत्र को निकाला और देखा की उस सोने की चैन में उस लड़की के गले का खून लगा हुआ है| उसी खून से उसके हाथ भी लाल हो गए है| रमना चकरा के बाथरूम में ही गिर पड़ा... इतना घोर पाप? वो कुसुम को क्या मुह दिखाएगा? तभी दरवाजे पर कुछ लोग दस्तक देने लगे| रमना एक बार फिर डर गया| वो उस मंगलसूत्र से भी डर गया था| अब उसे निर्णय करना था, उस डोरे को संडास में फेंक दूँ, या जेब में रख के हाथ धो लूँ? या दरवाजा ही ना खोलूं? कौन होगा दरवाजे के उस पार? हाथ में मंगलसूत्र लिए वो एक बार नल को देखता फिर संडास को और फिर दरवाजे को... भय और भूख से काँपते हुए उस इंसान ने अपने आप को इतना मजबूर कभी नहीं पाया।
शीशे के सामने खुद को देखते हुए, भय से कांपते हुए अब वो रोए जा रहा था। यही दोहराए जा रहा था... “मेरा दोष नहीं है.... मेरा दोष नहीं है!”
उस वक्त भागती ट्रेन से खनकती पटरियां बस यही सवाल पूछ रही थी “तो फिर किसका कसूर है? कौन दोषी है? ग़लती किसकी है?”